जानें- शाहीन बाग को कैसे मिला वो नाम जो देशभर में CAA प्रोटेस्ट की बन गया है पहचान

शाहीन बाग इलाका 1980 के दशक में बसा और इस इलाके को कभी मशहूर शायर अल्लामा इकबाल के नाम पर रखा जा रहा था. यह नहीं हो सका तो इकबाल के शेर के शाहीन शब्द को लेकर शाहीन बाग रखा गया.

दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए-एनआरसी के खिलाफ धरने पर महिलाएं
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली,
  • 22 जनवरी 2020,
  • अपडेटेड 5:33 PM IST

  • सीएए के खिलाफ 38 दिनों से धरने पर बैठी महिलाएं
  • शाहीन बाग की तर्ज पर देश के कई शहरों में धरने
  • पहले अल्लामा इकबाल कॉलोनी रखा जा रहा था नाम

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (एनआरसी) के खिलाफ दिल्ली के शाहीन बाग में जाड़े की सर्द रातों में महिलाएं, बच्चे और बूढ़ी औरतें बीच सड़क पर और खुले आसमान के नीचे धरने पर बैठी हैं. पिछले 38 दिनों से ये महिलाएं मुट्ठी भींचे इंकलाब और हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे बुलंद कर रही हैं. सीएए-एनआरसी के खिलाफ शाहीन बाग का प्रोटेस्ट एक मॉडल बन गया है और इस आंदोलन की चिंगारी देश भर में फैल गई है.

शाहीन बाग की तर्ज पर देश के दो दर्जन से ज्यादा शहरों में सीएए-एनआरसी के खिलाफ महिलाओं और बच्चों ने मोर्चा खोल दिया है. 15 दिसंबर से शुरू हुआ यह आंदोलन कम होने की बजाय बढ़ता जा रहा है. हालांकि एक दौर था कि शाहीन बाग से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर भी इस इलाके के नाम को कोई नहीं जानता था और आज देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में चर्चा का केंद्र बना हुआ है. ऐसे में हम बताते हैं कि शाहीन बाग इलाके का नाम कब और कैसे वजूद में आया है.

कब बसा ये इलाका?

बता दें कि यमुना नदी के किनारे बसे शाहीन बाग के पूरे इलाके में बरसात के दिनों में पानी लबालब भरा रहता था. यहां न तो खेती हुआ करती थी और न ही किसी तरह की कोई फैक्ट्री थी. इस पूरे इलाके में फटेरा (जंगली घास) पानी में लहलहाया करती थी. डीडीए ने यहां की मिट्टी का परीक्षण कर मना कर दिया था कि यहां न तो किसी तरह का कोई फ्लैट और न ही सरकारी इमारत बनाई जा सकती है.

1980 से उस इलाके में रह रहे 65 साल के शब्बीर अहमद सैफी बताते हैं कि इस इलाके की जमीन गुर्जर समुदाय के लोगों की थी. इनमें सबसे ज्यादा जसोला गांव के चौधरी जग्गन गुर्जर की थी. इसी जसोला के ही जगवीर गुर्जर की भी कुछ जमीन थी. इसके अलावा मदनपुर खादर के सत्येंद्र गुर्जर और ओमी चौहान की थी. गुर्जरों से उस समय कोई जमीन लेने को तैयार नहीं था.

उन्होंने बताया कि सत्तर के दशक के आखिरी और 1980 के शुरुआती दौर में गुर्जरों ने मुस्लिम समुदाय के लोगों को प्लाटिंग कर बेचने की जिम्मेदारी सौंपी थी. शाहीन बाग कॉलोनी काटने वाले लोगों में प्रमुख रूप से शारिक उल्ला, हबीबुल्ला, रहीम और मोईन खान के नाम शामिल थे. शारिक उल्ला ने अपने साथ बदायूं के रहने वाले सलीम खान को लगाया था जबकि हबीबुल्ला और रहीम पार्टनर थे. इन्हीं लोगों ने पूरे इलाके की जमीन पर प्लाटिंग कर बेचा था.

मुजफ्फर अली खान 1981 में बरेली से दिल्ली आए थे और उन्होंने अपना आशियाना इसी शाहीन बाग इलाके में बनाया था. वो बताते हैं कि 1985 के आसपास का ही समय था जब इस इलाके का नाम रखने को लेकर कवायद शुरू हुई. इस कड़ी में हबीबुल्ला अपनी बेटी निशात के नाम पर इस इलाके का नाम निशात बाग रखने चाहते थे, लेकिन इस पर कई लोग सहमत नहीं हुए. इसके चलते इस नाम पर मुहर नहीं लग सकी.

कैसे पड़ा नाम?

वहीं, सलीम खान ने इस इलाके को मशहूर शायर अल्लामा इकबाल के नाम पर अल्लामा इकबाल कॉलोनी रखने की इच्छा जाहिर की. लेकिन वहां के रहने वाले लोगों में संदेह था कि अल्लामा इकबाल ने पाकिस्तान बनने का समर्थन किया था, ऐसे में हो सकता है कि यह कॉलोनी पास न हो सके. इसी के चलते अल्लामा इकबाल के नाम पर रखने के विचार को टाल दिया गया.

इसके बाद सलीम खान ने अल्लामा इकबाल के ही शेर 'नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर, तू शाहीन है बसेरा कर पहाड़ों की चट्टानों पर.' से शाहीन शब्द को लिया. शाहीन का मतलब बाज की तरह का एक पक्षी होता है जो पहाड़ों पर ठहरता है. इस तरह से इस इलाके का नाम शाहीन बाग पड़ा. हालांकि, राजस्व विभाग में आज भी यह इलाका अबुफजल पार्ट-2 के नाम से दर्ज है.

मुजफ्फर अली ने बताया कि सलीम खान ही पुरानी दिल्ली से मोहम्मद अख्तर को बुलाकर लाए, जिनकी जमात-ए-इस्लामी हिंद की बाउंड्री से लगे हुए मकान नंबर E-1 की दीवार पर 1985 में शाहीन बाग लिखा गया और तीर का निशान बनाकर कॉलोनी की दिशा को निर्देशित किया गया. सलीम खान इसी मकान में किराए पर रहा करते थे.

सलीम खान, अतहर किदवई, मोईन खान, अंजुम नईम, परवेज अख्तर, मुजफ्फर अली, शब्बीर अहमद सैफी और मुर्तुजा खान ने मिलकर 1988 में शाहीन बाग आरडब्लूए का गठन किया. इसमें सलीम खान को आरडब्लूए का अध्यक्ष चुना गया. उन्होंने यहां दीवारों पर शाहीन बाग लिखवाकर इसे इलाके में पहचान दी, लेकिन अब सीएए-एनआरसी के खिलाफ धरने पर बैठी महिलाओं ने देश और दुनिया में शाहीन बाग को एक नई पहचान दिलाई है.

जानें कैसे शुरू हुआ शाहीन बाग में प्रोटेस्ट

बता दें कि सीएए कानून संसद के दोनों सदनों से 12 दिसंबर को पास हो चुका था और राष्ट्रपति ने भी अपनी इसे मंजूरी दे दी थी. इसके विरोध में दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्विद्यालय के छात्र लगातार सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे थे. कानून आने के बाद पहला शुक्रवार 15 दिसंबर 2019 को पड़ा था.

शुक्रवार की नमाज खत्म होने के बाद जामिया नगर के लोग सीएए के खिलाफ सड़क पर उतर आए थे. ऐसे में जामिया नगर में ओखला और बटला हाउस के लोग जामिया मिल्लिया के छात्रों के साथ विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए तो दूसरे अबु फजल और शाहीन बाग के लोग नोएडा से कालिंदी मार्ग की तरफ बढ़ गए.

जामिया से प्रोटेस्ट शिफ्ट हुआ शाहीन बाग

जामिया मिल्लिया के छात्रों का आंदोलन मथुरा रोड की तरफ बढ़ ही रहा था कि अचानक इस प्रदर्शन ने हिसंक रूप अख्तियार कर लिया. प्रदर्शनकारी बसों में तोड़फोड़ औऱ उसे जलाने लगे. पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच पथराव शुरू हो गया, जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले भी छोड़े. इतना ही नहीं पुलिस ने जामिया की लाइब्रेरी में घुसकर प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, जिसमें कई छात्र भी घायल हुए. 

जामिया का प्रोटेस्ट हिंसक रूप अख्तियार करने के बाद प्रशासन ने इलाके को चारों तरफ से बंद कर दिया था. इसी बीच नोएडा-कालिंदी कुंज मार्ग को पुलिस ने बैरिकेड से बंद कर दिया था. शाम के करीब आठ बजे का वक्त था जामिया के कुछ छात्र और शाहीन बाग इलाके की कुछ महिलाएं जाकर रोड पर बैठ गईं. दिल्ली पुलिस बैकफुट पर थी और कोई दूसरी कार्रवाई नहीं करना चाहती थी.

शाहीन बाग में ऐसे जुटे लोग

जामिया इलाके के आसपास के लोग 15 दिंसबर की रात शाहीन बाग में जुटना शुरू हो गए थे. 16 दिसंबर की शाम में करीब पांच से 100 महिलाएं इस प्रोटेस्ट में शामिल हो चुकी थीं. इसी बीच जेएनयू और जामिया के छात्र-छात्राएं शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए. इसके बाद इस प्रोटेस्ट की कमान महिलाओं ने अपने हाथों में ले ली और क्षेत्र के लोग वॉलिंटियर के रूप में लग गए. शाहीन बाग के आंदोलन में 29 दिन की बच्ची को मां गोद में लेकर धरने पर बैठी नजर आई तो 80 साल की दादी इस प्रोटेस्ट का हिस्सा बनी. इतना ही नहीं शाम होते ही आसपास की महिलाएं आंदोलन स्थल पर पहुंच जाती हैं.

शाहीन बाग बना सीएए प्रोटेस्ट का मॉडल

शाहीन बाग का प्रोटेस्ट ऐसा है, जिसका न तो एक चेहरा है और न ही इसके पीछे कोई धार्मिक और राजनीतिक पार्टी का नेता नजर आता है. शाहीन बाग के आंदोलन की चिंगारी देश भर में फैलने लगी. इसकी का नतीजा है कि लखनऊ, प्रयागराज से लेकर पटना, गया, जयपुर, जबलपुर, रांची सहित देश के करीब तीन दर्जन शहरों में महिलाएं रात-दिन इस कड़ाके की ठंड में खुले आसामन के नीचे बैठी हैं और सीएए-एनआरसी को खत्म करने की मांग कर रही हैं.

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