चुनाव प्रचार के दौरान नकदी के इस्तेमाल पर नज़र रखने के लिए मोदी सरकार की ओर से लाए गए इलेक्टोरल बॉन्ड्स को अनूठे तरीके के तौर पर प्रचारित किया गया. लेकिन बॉन्ड्स सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए छप्परफाड़ चंदा जुटाने वाले साबित हुए. आधिकारिक दस्तावेज ऐसा ही बता रहे हैं.
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बीते साल जनवरी में इन इलेक्टरोल बॉन्ड्स को अधिसूचित करते वक्त संसद में कहा- “अस्वच्छ पैसे और बिना पारदर्शिता वाले मौजूदा सिस्टम की तुलना में नई व्यवस्था में साफ़ पैसे के साथ कहीं अधिक पारदर्शिता होगी.”
अब 2019 की बात करते हैं. भारतीय स्टेट बैंक (SBI) से मिले आंकड़ों के मुताबिक इस व्यवस्था का सबसे अधिक लाभ बीजेपी को मिला है. बता दें कि SBI इलेक्टोरल बॉन्ड्स का इकलौता सप्लायर है.
सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिले जवाब के मुताबिक बीते एक साल में इलेक्टोरल बॉन्ड्स की बिक्री में 62% का उछाल आया है. 2018 में जहां 1,056 करोड़ रुपये के बॉन्ड्स बिके, वहीं इस साल जनवरी से मार्च तक ही 1,716 करोड़ रुपए के बॉन्ड्स बिक गए.
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने विभिन्न पार्टियों की ओर से चुनाव आयोग को सौंपे गए टैक्स के विवरण का विश्लेषण किया. ADR गैर मुनाफ़े के आधार पर काम करने वाला इलेक्शन रिसर्च ग्रुप है.
रिपोर्ट बताती है कि इलेक्टोरल बॉन्ड्स का पलड़ा मोटे तौर पर राष्ट्रीय पार्टियों की ओर ही झुका है, उनमें से भी सबसे बड़ा हिस्सा बीजेपी की झोली में गया है.
2017-18 में इलेक्टोरल बॉन्ड्स के जरिए पार्टियों को कुल मिले 215 करोड़ रुपये में से 210 करोड़ बीजेपी को ही मिले. एडीआर रिपोर्ट के मुताबिक बाकी 5 करोड़ विपक्षी पार्टी कांग्रेस के खाते में गए.
इलेक्टोरल बॉन्ड्स के जरिए फंडिंग ने क्षेत्रीय राजनीतिक समूहों के माथे पर बल ला दिए हैं. जनता दल यूनाइटेड (JD-U) के प्रवक्ता पवन वर्मा कहते हैं- ‘भारत में भ्रष्टाचार की जड़ बिना हिसाब वाले धन और राजनीति का गठजोड़ है.’ वर्मा के मुताबिक “इलेक्टोरल बॉन्ड्स को इस गठजोड़ को तोड़ने के उद्देश्य से सुधार के तौर पर लाने की बात कही गई लेकिन इससे सबसे अधिक लाभ सत्तारूढ़ पार्टी को मिल रहा है. अगर सबको समानता का मौका देने का सवाल है तो हम जैसे क्षेत्रीय दलों के साथ क्या होगा?”
अज्ञात दानकर्ता (डोनर्स) स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से एक करोड़ रुपए तक मूल्य के इलेक्टोरल बॉन्ड्स खरीद कर अपनी पसंद के राजनीतिक दलों के बैंक खातों में जमा कर सकते हैं. ये व्यवस्था दानकर्ताओं की पहचान नहीं खोलती और इसे टैक्स से भी छूट प्राप्त है.
एडीआर के संस्थापक त्रिलोचन शास्त्री कहते हैं, सवाल ये कि कौन फाइनेंस कर रहा है. समस्या ये है कि सिर्फ चंद पूंजीपति और कॉरपोरेट हाउस की फंडिंग में शामिल हैं. फिर सरकार लोगों की जगह उनके फायदे के लिए काम करती है जो उन्हें फंड मुहैया कराते हैं. ये लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.
एडीआर ने सुप्रीम कोर्ट में इलेक्टोरल बॉन्ड व्यवस्था को दे रखी है चुनौती
चुनाव आयोग ने भी अपनी टिप्पणियों में इलेक्टोरल बॉन्ड जैसी अज्ञात बैंकिंग व्यवस्था के जरिए राजनीतिक फंडिंग को लेकर संदेह जाहिर किए हैं. लेकिन केंद्र सरकार का ज़ोर देकर कहना है कि इलेक्टोरल बॉन्ड लाने का उद्देश्य ज्यादा पारदर्शिता सुनिश्चित करना है और देश की राजनीतिक रगों में बेहिसाबी पैसे के बहाव को रोकना है. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में 5 अप्रैल को सुनवाई होनी है.
खुशदीप सहगल / आनंद पटेल