बात 24 साल पुरानी है. 1994 में असम बुरी तरह से उग्रवाद की चपेट में था. इस दौरान उल्फा उग्रवादियों ने असम फ्रंटियर टी लिमिटेड के जनरल मैनेजर रामेश्वर सिंह की हत्या कर दी थी. इस वारदात को तालप टी एस्टेट में अंजाम दिया गया था. इसके बाद उल्फा उग्रवादियों पर कार्रवाई के लिए आर्मी पर दबाव था.
आर्मी ने आतंकियों का सफाया करने की बजाय जो किया वो कहीं से भी ठीक नहीं था. धौला स्थित 18 पंजाब रेजिमेंट के जवानों और अफसरों ने 17 से लेकर 19 फरवरी 1994 के बीच असम के तिनसुनकिया जिले में अलग- अलग ठिकानों से नौ बेगुनाह युवकों को उठा लिया. इनके नाम थे प्रबीन सोनोवाल, प्रदीप दत्ता, देबजीत विश्वास, अखिल सोनोवाल, भाबेन मोरन, मटेश्वर मोरन, गुनिन हजारिका, प्रकाश शर्मा और मनोरंजन दास. आर्मी ने धौला कैंप में इन्हें हिरासत में रखा. सेना को शक था कि इन्होंने ही रामेश्वर सिंह की हत्या की थी.
ये एक ऐसा वाकया है जिसने भारतीय सेना के गौरवपूर्ण अतीत पर बदनामी के दाग लगा दिए. आर्मी कोर्ट ने इस घटना के दोषी सेना के सात अफसरों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. अदालत ने जिन्हें दोषी माना है उनमें पूर्व मेजर जनरल ए के लाल, कर्नल थॉमस मैथ्यू, कर्नल आर एस सिबिरेन, कैप्टन दिलीप सिंह, कैप्टन जगदेव सिंह, नायक अलबिंदर सिंह और नायक शिवेन्दर सिंह शामिल है.
23 फरवरी को एनकाउंटर
सेना के अफसर कथित रूप से ऑल स्टूडेंट असम यूनियन के कार्यकर्ता प्रबीन सोनोवाल, प्रदीप दत्ता, देबजीत विश्वास, अखिल सोनोवाल, भाबेन मोरन को दो नावों में भरकर डांगरी नदी के पार डिब्रू-साइखोवा नेशनल पार्क ले गये. यहां पर इन पांचों की हत्या कर दी गई और इन्हें उल्फा का उग्रवादी करार दे दिया गया. जबकि चार अन्य को अलग-अलग जगहों पर छोड़ दिया गया. इस मामले को अंजाम तक पहुंचाने के लिए AASU के तत्कालीन उपाध्यक्ष और बीजेपी के वर्तमान नेता जगदीश भूइयां ने अकेले लड़ाई लड़ी. इन्हीं की कोशिशों की वजह से मामले की सीबीआई जांच भी हुई. खास बात यह है कि असम के मौजूदा मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल भी AASU के अध्यक्ष रह चुके हैं.
पन्ना लाल