काले झंडे, जलती बसें, सड़कों पर आंदोलन... 1965 की कहानी जब मद्रास में गणतंत्र दिवस पर मना शोक दिवस

1964 से ही माहौल गर्म था. डीएमके और छात्र संगठनों ने विरोध तेज कर दिया. मुख्यमंत्री की चेतावनी के बाद डीएमके ने गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले ही शोक दिवस मनाने का फैसला किया ताकि सीधे टकराव से बचा जा सके. मदुरै में छात्र सड़कों पर उतरे. उनके हाथों में तख्तियां थीं, 'हिंदी नेवर, इंग्ल‍िश एवर!' वे संविधान की उन प्रतियों को जलाने जा रहे थे जिनमें हिंदी को लेकर प्रावधान थे.

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1965 का आंदोलन सिर्फ भाषा का नहीं, ये पहचान, सम्मान और बराबरी की लड़ाई थी 1965 का आंदोलन सिर्फ भाषा का नहीं, ये पहचान, सम्मान और बराबरी की लड़ाई थी

संदीपन शर्मा

  • नई दिल्ली ,
  • 26 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 4:30 PM IST

26 जनवरी 1965 की सुबह मद्रास (आज का तमिलनाडु) में जश्न का माहौल नहीं था. न तिरंगे की खुशियां थीं, न परेड का उत्साह. आसमान में बादल थे और सड़कों पर काले झंडे लहरा रहे थे. दिल्ली में जहां गणतंत्र दिवस की तैयारियां चल रही थीं, वहीं मद्रास में डीएमके ने इस दिन को 'शोक दिवस' घोषित किया था. वजह थी, हिंदी थोपे जाने का विरोध.

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तत्कालीन मुख्यमंत्री भक्तवत्सलम ने सख्त चेतावनी दी. उन्होंने कहा, 'जो कोई गणतंत्र दिवस को शोक दिवस की तरह मनाएगा, वह देशद्रोही माना जाएगा.' 

डीएमके नेता सीएन अन्नादुरई और कई कार्यकर्ताओं को एहतियातन हिरासत में ले लिया गया. सरकार को लगा कि ये सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी का विरोध है. लेकिन सरकार एक बड़ी बात समझ नहीं पाई कि ये आंदोलन छात्रों का था.

विवाद की जड़ कहां थी?

भाषा को लेकर विवाद आजादी से पहले ही शुरू हो गया था. 1937 में, मद्रास प्रेसिडेंसी में कांग्रेस सरकार ने स्कूलों में हिंदी अनिवार्य कर दी थी. इसका जोरदार विरोध हुआ और सरकार को फैसला वापस लेना पड़ा.

संविधान बनते समय भी इस मुद्दे पर बहस हुई. टी.टी. कृष्णमाचारी ने चेतावनी दी थी कि अगर हिंदी को ज़बरदस्ती थोपा गया तो देश की एकता को नुकसान पहुंचेगा.

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1949 में मुंशी-अय्यंगर फॉर्मूला आया. इसके तहत हिंदी को संघ की आधिकारिक भाषा बनाया गया. अंग्रेजी को 15 साल तक सहायक भाषा रहने दिया गया. ये अवधि 26 जनवरी 1965 को खत्म होनी थी. यही तारीख आगे चलकर टाइम बम साबित हुई.

दो सोच आमने-सामने

हिंदी भाषी इलाकों के नेताओं, खासकर मोरारजी देसाई जैसे नेताओं का मानना था कि अब पूरे देश में हिंदी लागू होनी चाहिए. वहीं तमिल नेताओं और छात्रों को यह फैसला भाषाई वर्चस्व लगा, उन्हें डर था कि इससे भारत की विविधता खत्म हो जाएगी. सबसे बड़ा डर ये था कि सरकारी नौकरियों की परीक्षाएं, सिविल सेवा जैसी परीक्षाएं हिंदी में हो जाएंगी और गैर-हिंदी भाषी छात्र पीछे रह जाएंगे.

आंदोलन की चिंगारी

1964 से ही माहौल गर्म था. डीएमके और छात्र संगठनों ने विरोध तेज कर दिया. मुख्यमंत्री की चेतावनी के बाद डीएमके ने गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले ही शोक दिवस मनाने का फैसला किया ताकि सीधे टकराव से बचा जा सके.

मदुरै में छात्र सड़कों पर उतरे. उनके हाथों में तख्तियां थीं, 'हिंदी नेवर, इंग्ल‍िश एवर!' वे संविधान की उन प्रतियों को जलाने जा रहे थे जिनमें हिंदी को लेकर प्रावधान थे. यहीं से हालात बिगड़ गए. कांग्रेस कार्यकर्ताओं से झड़प हुई. देखते ही देखते पत्थरबाज़ी शुरू हो गई, बसें पलट दी गईं, आगजनी हुई. मदुरै ही नहीं, पूरे राज्य में हिंसा फैल गई.

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जब तमिलनाडु जल उठा

शांतिपूर्ण आंदोलन फरवरी तक पहुंचते-पहुंचते हिंसक हो गया. छात्रों ने रेल पटरियां जाम कीं, ट्रेनों और बसों को रोक दिया. सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया. सरकारी आंकड़ों में करीब 70 लोगों की मौत दर्ज हुई जबकि आंदोलन से जुड़े लोग मरने वालों की संख्या 200 से ज्यादा बताते हैं.

तमिलनाडु से केंद्र सरकार में शामिल दो वरिष्ठ मंत्री सी. सुब्रमण्यम और ओ.वी. अलागेसन ने इस्तीफा दे दिया. उन्होंने कहा कि वे ऐसी सरकार में नहीं रह सकते जो अपने ही लोगों के खिलाफ खड़ी हो.

दिल्ली की हिचक और इंदिरा गांधी की एंट्री

प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और गृह मंत्री गुलज़ारीलाल नंदा दिल्ली में बैठकर कानूनी पहलुओं पर चर्चा कर रहे थे. लेकिन हालात को राजनीतिक फैसला चाहिए था. तभी सूचना और प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी ने बड़ा कदम उठाया.

सुरक्षा सलाह के बावजूद वे खुद मद्रास पहुंचीं. उन्होंने प्रदर्शनकारियों से बात की और भरोसा दिलाया कि हिंदी जबरन नहीं थोपी जाएगी. उनकी जीवनीकार कैथरीन फ्रैंक लिखती हैं कि इंदिरा गांधी के इस कदम से शास्त्री नाराज़ हो गए थे, लेकिन हालात काबू में आ गए.

समझौता और नतीजा

फरवरी 1965 में प्रधानमंत्री शास्त्री ने संसद में भरोसा दिलाया कि अंग्रेजी अनिश्चित काल तक सहायक आधिकारिक भाषा बनी रहेगी. इस भरोसे को 1967 में कानून का रूप दिया गया.तय हुआ कि जब तक सभी गैर-हिंदी राज्य सहमत नहीं होंगे, अंग्रेजी बनी रहेगी यानी व्यावहारिक रूप से हमेशा. यह फैसला भारत की बहुभाषी पहचान की स्वीकारोक्ति थी.

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राजनीति पर असर

1967 में डीएमके ने तमिलनाडु में सत्ता हासिल कर ली. इसके बाद कांग्रेस कभी अकेले सरकार नहीं बना पाई. आज भी राज्य की राजनीति डीएमके और एआईएडीएमके के बीच ही घूमती है. दिलचस्प बात यह है कि बाद में इंदिरा गांधी पर तानाशाही के आरोप लगे, लेकिन तमिलनाडु और दक्षिण भारत में उन्हें आज भी उस फैसले के लिए याद किया जाता है. 1965 का यह आंदोलन सिर्फ भाषा का नहीं था, यह पहचान, सम्मान और बराबरी की लड़ाई थी.

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