मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था इस वक्त ऐसे दोराहे पर खड़ी है, जहां एक तरफ नियमों की सख्ती है तो दूसरी तरफ सालों का अनुभव लिए खड़े शिक्षक. जिन हाथों ने पीढ़ियों को अक्षर ज्ञान दिया आज वही हाथ अपनी योग्यता साबित करने के लिए परीक्षा की कॉपियां पलट रहे हैं.
प्रदेश के करीब डेढ़ लाख शिक्षकों के सामने एक ही सवाल खड़ा है, क्या अब अनुभव से बड़ी परीक्षा हो गई है? सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर खुद को मजबूर बता रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि TET अब सिर्फ परीक्षा नहीं, बल्कि सियासी विस्फोट बन चुकी है.
ब्लैकबोर्ड पर बच्चों का भविष्य लिखने वाले शिक्षक अब अपनी ही नौकरी बचाने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं. मध्य प्रदेश में TET की अनिवार्यता ने ऐसा भूचाल पैदा किया है जिसने डेढ़ लाख परिवारों की नींद उड़ा दी है. जिनकी सुबह स्कूल की घंटी से शुरू होती थी, उनकी रातें अब किताबों और चिंता के बीच गुजर रही हैं.
दिन में बच्चों को पढ़ाने वाले ये शिक्षक अब घर लौटकर खुद छात्र बन जाते हैं. भोपाल की कविता तिवारी इसकी सबसे मार्मिक तस्वीर हैं. 25 साल की सेवा, दर्जनों सम्मान, लेकिन आज वही शिक्षिका अपने 12वीं में पढ़ने वाले बेटे के साथ बैठकर पढ़ाई कर रही हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि बेटा अपना भविष्य बनाने के लिए पढ़ रहा है और मां अपना भविष्य बचाने के लिए.
सवाल सीधा है, जब विभाग ने खुद काबिलियत के लिए सम्मानित किया, तो अब उसी काबिलियत पर शक क्यों? कहानी सिर्फ कविता तिवारी की नहीं है. भोपाल की ही सुनीता तोमर, जो 28 साल से पढ़ा रही हैं, आज रिटायरमेंट से ठीक पहले खुद परीक्षा देने को मजबूर हैं. उनके पढ़ाए छात्र आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर और इंजीनियर बन चुके हैं, लेकिन आज उन्हीं से पूछा जा रहा है कि वो पढ़ाने के लायक हैं या नहीं. गुस्सा साफ है, जब तय नियमों के तहत नौकरी मिली, तो दशकों बाद ये नई शर्त क्यों?
शिक्षकों की मांग
शिक्षकों की मांगें भी साफ हैं. TET की अनिवार्यता खत्म हो, अनुभव और वरिष्ठता को आधार बनाया जाए और सरकार सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से उनका पक्ष रखे. लेकिन सरकार के शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह का रुख साफ है, उनका कहना है कि ये फैसला सरकार का नहीं, अदालत का है, इसलिए सड़कों पर प्रदर्शन से कुछ नहीं बदलेगा.
दरअसल TET यानी शिक्षक पात्रता परीक्षा, जिसे 2009 के शिक्षा का अधिकार कानून के तहत लाया गया था, उसका मकसद शिक्षण की गुणवत्ता सुधारना था. सिद्धांत साफ था, जो तय मानकों पर खरे उतरे, वह शिक्षक बनें. लेकिन अब यही नियम उन शिक्षकों पर लागू हो रहा है जो वर्षों से सिस्टम का हिस्सा हैं, और यही टकराव पूरे विवाद की जड़ बन गया है.
राजनीति भी इस मुद्दे पर पूरी तरह सक्रिय हो चुकी है. कांग्रेस सरकार से सवाल कर रही है कि जब रास्ता है तो पुनर्विचार याचिका क्यों नहीं? उदाहरण भी दिया जा रहा है कि पहले ऐसी स्थिति में अदालत का दरवाजा खटखटाकर शिक्षकों की नौकरियां बचाई गई थीं. अब मामला सिर्फ परीक्षा का नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है.
शिक्षक आर-पार के मूड में हैं और 18 अप्रैल को भोपाल में ‘मुख्यमंत्री अनुरोध यात्रा’ निकालने की तैयारी है. निगाहें मुख्यमंत्री मोहन यादव पर टिकी हैं क्या वो शिक्षकों को राहत देंगे या नियमों की सख्ती जारी रहेगी? तब तक हर गुजरता दिन इन शिक्षकों के लिए एक नई परीक्षा बन चुका है.
रवीश पाल सिंह