12 साल से कोमा में! गाजियाबाद के हरीश की कहानी, जिसे इच्छामृत्यु देने पर अब SC करेगा फैसला

Harish Euthanasia Case: चंडीगढ़ में बीटेक की पढ़ाई के दौरान साल 2013 में हरीश चौथी मंजिल से गिर गया था. कुछ लोगों ने हादसे के पीछे साजिश की आशंका जताई थी. उस हादसे में उसके सिर में गंभीर चोट लगी थी.

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इच्छामृत्यु को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई इच्छामृत्यु को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 14 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:04 PM IST

पिछले 12 वर्षों से कोमा में पड़े 31 साल के हरीष को  इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनिशिया) देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार (15 जनवरी) को अहम सुनवाई होने जा रही है.

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने मंगलवार को गाजियाबाद के हरीश राणा के माता-पिता से कोर्ट के कमेटी रूम में मिलकर बातचीत की थी.

पिछली सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा था कि इस मामले में निर्णय तक पहुंचने से पहले वो परिजनों से मिलकर वस्तुस्थिति जानना चाहेंगे. पीठ ने विशेषज्ञ डॉक्टर्स की दो-दो मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को भी ध्यान में रखा है. 

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बिस्तर पर ही सांसें ले रहा हरीश
सूत्रों के मुताबिक, कोर्ट के रिकॉर्ड में मौजूद उन रिपोर्ट्स में भी हरीश के ठीक होने की उम्मीद बहुत कम बताई है.

राणा परिवार के वकील मनीष जैन के मुताबिक, हरीश पिछले करीब साढ़े 12 साल से बिस्तर पर ही सांसें ले रहा है. उसे विशेष तरल भोजन ट्यूब के जरिए दिया जा रहा है. न वो बोल पाता है, न कुछ जता पाता है.

आंख अगर खुल भी जाए तो उनमें कोई हरकत नहीं दिखती, यानी जड़ की तरह हो चुका है. उसकी पीठ में बिस्तर पर लेटे रहने की वजह से गहरे घाव भी हो चुके हैं.

मस्तिष्क में गंभीर चोट
चंडीगढ़ में बीटेक की पढ़ाई के दौरान 20 अगस्त, 2013 को चौथी मंजिल से गिरने या गिराए जाने के बाद से हरीश के सिर में गंभीर चोट लगी. मस्तिष्क में स्थाई नुकसान होने की वजह से उसकी यह दशा है.

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उसके माता-पिता ने तीन साल पहले सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि उसे गरिमापूर्ण जीवन तो नहीं मिल पाया कम से कम गरिमापूर्ण मौत तो मिल जाए.

इच्छामृत्यु मतलब क्या है...?
इच्छामृत्यु का मतलब है किसी शख्स को उसकी इच्छा से मृत्यु दे देना. इसमें डॉक्टर की मदद से उसके जीवन का अंत किया जाता है, ताकि उसे दर्द से छुटकारा दिलाया जा सके.

इच्छामृत्यु दो तरह से दी जाती है. पहली- एक्टिव यूथेनेशिया यानी सक्रिय इच्छामृत्यु और दूसरी- पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु. 

एक्टिव यूथेनेशिया में बीमार व्यक्ति को डॉक्टर जहरीली दवा या इंजेक्शन देते हैं, ताकि उसकी मौत हो जाए. वहीं, पैसिव  में मरीज को इलाज रोक दिया जाता है, अगर वो वेंटिलेटर पर है तो वहां से हटा दिया जाता है, उसकी दवाएं बंद कर दी जाती हैं. साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को अपनी मंजूरी दी थी.

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