सुप्रीम कोर्ट ने देश में न्यायिक कामकाज का सहयोग करने वाले ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली और लंबे समय से खाली पड़े पदों को लेकर गहरी चिंता और कड़ी नाराजगी जताई है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की तीन जजों की पीठ ने कहा कि ट्रिब्यूनल अब सरकार के लिए सिरदर्द और सुप्रीम कोर्ट के लिए बोझ बन चुके हैं.
सीजेआई ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से कहा कि ये ट्रिब्यूनल केंद्र सरकार की ओर से बनाए गए हैं, लेकिन इनके फैसलों और आदेशों की वजह से न्यायिक प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. उन्होंने यह भी बताया कि ये ट्रिब्यूनल न तो सरकार के प्रति पूरी तरह जवाबदेह हैं और न ही न्यायपालिका के प्रति, जिससे ये एक तरह से ‘नो मैन्स लैंड’ बन गए हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने खासतौर से आर्थिक मामलों से जुड़े ट्रिब्यूनलों में तकनीकी सदस्यों द्वारा फैसलों को बाहर से लिखवाए जाने के आरोपों पर गंभीर चिंता जताई और चेतावनी दी कि यदि ऐसा पाया गया तो संबंधित सदस्यों और अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.
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पीठ ने सरकार से आग्रह किया कि खाली पड़े पदों को तुरंत भरा जाए और भर्ती प्रक्रिया को तेज और सरल बनाया जाए. साथ ही ट्रिब्यूनलों के चेयरपर्सनों का कार्यकाल अंतरिम रूप से बढ़ाने के निर्देश भी दिए गए. जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने यह साफ किया कि टीडीसैट में चेयरपर्सन के अभाव में कोई भी तकनीकी सदस्य अकेले आदेश पारित नहीं कर सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को याद दिलाया कि पहले भी एक समान सुधार प्रस्ताव चार सप्ताह में लाने के लिए कहा गया था, और यह साफ किया कि ट्रिब्यूनलों को निष्क्रिय नहीं होने दिया जाएगा. न्यायिक प्रणाली को प्रभावी और जिम्मेदार बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाना सरकार की जिम्मेदारी है.
संजय शर्मा