सुप्रीम कोर्ट ने साल 2027 में होने वाली जाति जनगणना की योजना और प्रक्रिया को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बागची की बेंच ने याचिकाकर्ता से अपनी आपत्तियां और सुझाव सरकार के समुचित मंच पर रखने को कहा है. याचिका में मांग की गई थी कि जाति जनगणना केवल 'स्व-घोषणा' (सेल्फ डिक्लेरेशन) पर आधारित न होकर 'सत्यापन योग्य सामग्री' पर आधारित होनी चाहिए.
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इस जनगणना पर 13,500 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत आएगी और इसके डेटा का उपयोग अगले चार दशकों तक सभी सामाजिक कल्याण नीतियों और सरकारी परियोजनाओं के लिए किया जाएगा.
कोर्ट ने मामले को निपटाते हुए अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुद्दों और सुझावों पर विचार करें.
'विशेषज्ञों पर छोड़ दें जनगणना का काम'
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि जनगणना की कवायद प्रशिक्षित और इस क्षेत्र के दिग्गज विशेषज्ञों द्वारा तैयार की जाती है. अदालत का मानना है कि यह काम उन पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि उनके पास इस क्षेत्र का अनुभव होता है. बेंच ने कहा कि जनगणना अधिनियम 1958 और 1990 के नियमों के तहत अधिकारियों को जनगणना के संचालन का तरीका निर्धारित करने का अधिकार है. बेंच ने भरोसा जताया कि अधिकारियों ने विशेषज्ञों की मदद से एक मजबूत तंत्र विकसित किया होगा, जिससे गलतियों की गुंजाइश न रहे.
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी है कि मौजूदा मानदंड सिर्फ 'स्व-घोषणा' है, जो सटीक डेटा के लिए अपर्याप्त हो सकता है. उन्होंने चिंता जताई कि इस बार एससी और एसटी के अलावा पहली बार ओबीसी वर्ग को भी जनगणना में शामिल किया जा रहा है, लेकिन जातिगत पहचान दर्ज करने के लिए कोई पारदर्शी ढांचा या दिशानिर्देश पब्लिक डोमेन में नहीं रखा गया है. याचिका में यह भी कहा गया कि दिल्ली में लिस्ट नहीं ली जा रही है, जो डेटा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करती है.
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करोड़ों का खर्च और नीतियों पर दीर्घकालिक असर
कोर्ट के सामने यह बात रखी गई कि इस पूरी प्रक्रिया पर 13,500 करोड़ रुपये का भारी-भरकम खर्च आएगा. चूंकि यह डेटा अगले 40 सालों तक देश की सभी सामाजिक कल्याण नीतियों को प्रभावित करेगा, इसलिए डेटा का सटीक होना बेहद जरूरी है. याचिकाकर्ता, जो एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, ने 9 जुलाई 2025 को रजिस्ट्रार जनरल को कानूनी नोटिस भी भेजा था. चीफ जस्टिस ने कहा कि यह एक विशेष विशेषज्ञ निकाय का अभ्यास है, इसलिए याचिकाकर्ता अपनी पूरक प्रस्तुति सरकार को सौंप सकते हैं.
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सुप्रीम कोर्ट का आखिरी फैसला...
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को यह कहते हुए निपटा दिया कि सरकार याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए प्रासंगिक मुद्दों पर गौर करे. अदालत ने याचिकाकर्ता को इस याचिका की एक कॉपी अधिकारियों को भेजने की अनुमति दी, जिससे वे अपने सुझावों को सरकार तक पहुंचा सकें. कोर्ट ने कहा कि न्यायिक हस्तक्षेप के बजाय विशेषज्ञ संस्थाओं को अपनी प्रक्रिया तय करने देना अधिक उचित है, लेकिन नागरिकों की जायज चिंताओं को प्रशासन द्वारा सुना जाना चाहिए.
अनीषा माथुर / संजय शर्मा