'बेट‍ियो, ये तुम्हारी गलती नहीं है...' सुप्रीम कोर्ट ने सभी स्कूलों को दिया फ्री सेनेटरी नैपकिन देने का आदेश

कोर्ट ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता तक पहुंच न होना लड़कियों की गरिमा और निजता के अधिकारों को प्रभावित करता है और उनकी पढ़ाई में बाधा डालता है. न्यायालय ने शिक्षा को एक ‘मल्टीप्लायर राइट’ बताया जो अन्य मानवाधिकारों के उपयोग की कुंजी है.

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पीरियड्स के कारण स्कूल छोड़ने को मजबूर लड़कियां, सुप्रीम कोर्ट ने बदली सोच (File Photo: PTI) पीरियड्स के कारण स्कूल छोड़ने को मजबूर लड़कियां, सुप्रीम कोर्ट ने बदली सोच (File Photo: PTI)

अनीषा माथुर

  • नई दिल्ली ,
  • 30 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 3:41 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े एक बेहद अहम मुद्दे पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कहा है कि स्कूलों में शौचालय, साफ-सफाई और सेनेटरी नैपकिन की कमी सीधे तौर पर लड़कियों के शिक्षा के अधिकार, समानता के अधिकार और स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन है.

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता तक पहुंच न होना न सिर्फ गरिमा और निजता के अधिकार को छीनता है, बल्कि इसकी वजह से लड़कियां स्कूल छोड़ने या बार-बार अनुपस्थित रहने को मजबूर होती हैं.

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शिक्षा ‘मल्टीप्लायर राइट’, बाकी अधिकारों की कुंजी: कोर्ट

फैसला सुनाते हुए जस्टिस पारदीवाला ने कहा, 'शिक्षा का अधिकार एक ‘मल्टीप्लायर राइट’ है, जो दूसरे सभी मानवाधिकारों के इस्तेमाल को संभव बनाता है. यह जीवन और मानवीय गरिमा के अधिकार के व्यापक ढांचे का हिस्सा है.'

कोर्ट ने माना कि संस्थागत और सामाजिक बाधाएं जैसे शौचालयों की कमी, मासिक धर्म को लेकर चुप्पी और संसाधनों का अभाव लड़कियों की पढ़ाई में सबसे बड़ी रुकावट बनती हैं. ऐसे में राज्य की जिम्मेदारी है कि वह इन बाधाओं को दूर करे.

मासिक धर्म स्वास्थ्य भी जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार का हिस्सा

सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता तक पहुंच, जीवन के अधिकार और स्वास्थ्य के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है. लड़कियों को स्वस्थ प्रजनन जीवन और सुरक्षित मासिक धर्म प्रबंधन का पूरा अधिकार है.

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कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अगर मासिक धर्म से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो यह शिक्षा के अधिकार को बाधित करता है और जब शिक्षा बाधित होती है तो बाकी अधिकार भी कमजोर पड़ जाते हैं.

सरकारी ही नहीं, निजी स्कूलों पर भी जिम्मेदारी

अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करना सिर्फ सरकार का नहीं, बल्कि सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूलों का दायित्व है.

कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दिया निर्देश

हर स्कूल (ग्रामीण-शहरी, सरकारी-निजी) में जेंडर-सेग्रिगेटेड शौचालय हों, 
पर्याप्त पानी की व्यवस्था हो, साबुन और पानी के साथ कार्यशील हैंडवॉश सुविधा हो. 

इसके अलावा सभी स्कूलों में मानकों के अनुरूप ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी नैपकिन मुफ्त में उपलब्ध कराए जाएं. ये नैपकिन स्कूल टॉयलेट या तय जगह पर आसानी से मिलें. 

स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (MHM) कॉर्नर बनाए जाएं. साथ ही अतिरिक्त यूनिफॉर्म, इनरवियर और डिस्पोजेबल बैग उपलब्ध हों. 

छात्राओं, शिक्षकों और स्टाफ को मासिक धर्म और स्वच्छता को लेकर प्रशिक्षण और जागरूकता दी जाए. 

'यह तुम्हारी गलती नहीं है' सुप्रीम कोर्ट का संदेश

कोर्ट ने अपने फैसले में बेहद संवेदनशील टिप्पणी करते हुए कहा कि यह आदेश सिर्फ कानूनी तंत्र के लिए नहीं, बल्कि उन लड़कियों के लिए है जो मदद मांगने से झिझकती हैं. उन शिक्षकों के लिए, जो मदद करना चाहते हैं लेकिन सामाजिक चुप्पी से बंधे रहते हैं और उन माता-पिता के लिए, जो इस विषय पर खामोशी चुन लेते हैं. 

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कोर्ट ने कहा, 'हम हर उस लड़की से कहना चाहते हैं जो मासिक धर्म के कारण स्कूल से अनुपस्थित रही, जिसे यह कहकर शिक्षा से दूर कर दिया गया कि उसका शरीर ‘अशुद्ध’ है, यह तुम्हारी गलती नहीं है.' 

याचिका का बैकग्राउंड

यह फैसला मध्य प्रदेश महिला कांग्रेस की नेता जया ठाकुर द्वारा दायर जनहित याचिका पर आया है, जिसमें खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में सेनेटरी नैपकिन और मासिक धर्म सुविधाओं की भारी कमी का मुद्दा उठाया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाएं देना अब नीति या सुविधा का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है.

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