नसुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि फर्जी या गैर-मौजूद AI फैसलों के आधार पर दिए गए आदेशों को केवल निर्णय की गलती नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे गंभीर 'न्यायिक कदाचार' (Misconduct) की श्रेणी में रखा जाएगा. साथ ही कोर्ट ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे की बेंच ने सोमवार को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका के दौरान सामने आए मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि वह मामले की विस्तार से जांच करेगा और ऐसे काल्पनिक फैसलों का इस्तेमाल केवल मानवीय भूल नहीं, बल्कि न्यायिक कदाचार माना जाएगा. शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. अदालत ने स्पष्ट किया कि वह एआई द्वारा निर्मित कृत्रिम और गैर-मौजूद फैसलों के परिणामों और जवाबदेही की विस्तार से जांच करेगी.
पीठ ने कहा, 'हम ट्रायल कोर्ट द्वारा एआई द्वारा उत्पन्न गैर-मौजूद, फर्जी या कृत्रिम कथित निर्णयों का संज्ञान लेते हैं और इसके परिणामों और जवाबदेही की जांच करना चाहते हैं. क्योंकि इसका न्यायिक प्रक्रिया की अखंडता पर सीधा असर पड़ता है.'
बेंच ने 27 फरवरी के अपने आदेश में कहा कि सबसे पहले, हमें यह स्पष्ट करना होगा कि इस प्रकार के निराधार और फर्जी कथित निर्णयों पर आधारित निर्णय लेना निर्णय लेने में त्रुटि नहीं है. ये कदाचार होगा और इसके कानूनी परिणाम भुगतने होंगे. ये आवश्यक है कि हम इस मुद्दे की अधिक विस्तार से जांच करें.
ट्रायल कोर्ट की बड़ी लापरवाही
ये पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब आंध्र प्रदेश की एक निचली अदालत ने संपत्ति विवाद के मामले में एडवोकैट-कमिश्नर की रिपोर्ट पर आपत्तियों को खारिज कर दिया. पिछले साल अगस्त में दिए गए इस आदेश में ट्रायल कोर्ट ने कुछ ऐसे पिछले फैसलों का हवाला दिया जो असल में अस्तित्व में ही नहीं थे. जब याचिकाकर्ताओं ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी तो पता चला कि वो सभी फैसले एआई द्वारा तैयार किए गए फर्जी (Synthetic) दस्तावेज थे. हाईकोर्ट ने चेतावनी तो दी, लेकिन मामले को मेरिट पर तय कर दिया. अब सुप्रीम कोर्ट इस पूरी प्रक्रिया की ईमानदारी और पवित्रता की जांच कर रहा है.
AI का अधिकृत इस्तेमाल में बना सिरदर्द
सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त की है कि जहां एआई का उपयोग आधिकारिक तौर पर अधिकृत नहीं है, वहां भी इसका चलन बढ़ रहा है. कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान को इस मामले में सहायता के लिए नियुक्त किया है. बेंच ने कहा कि ये मामला केवल किसी एक केस के फैसले से जुड़ा नहीं है, बल्कि पूरी न्याय वितरण प्रणाली की साख पर सवाल उठाता है. सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल ट्रायल कोर्ट को एडवोकेट-कमिश्नर की उस विवादित रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ने से रोक दिया है और अगली सुनवाई 10 मार्च के लिए तय की है.
सिर्फ निचली अदालतें ही नहीं, बल्कि वकीलों द्वारा एआई का उपयोग करके याचिकाएं ड्राफ्ट करने पर भी शीर्ष अदालत नाराज है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने 17 फरवरी को एक अलग मामले की सुनवाई के दौरान 'मर्सी बनाम मैनकाइंड' जैसे फर्जी केसों का हवाला देने पर चिंता जताई थी.
वकीलों द्वारा राजनीतिक भाषणों पर दिशा-निर्देश मांगने वाली एक जनहित याचिका में एआई टूल्स का सहारा लिया गया था.
कानूनी प्रक्रिया को नुकसान
कोर्ट का मानना है कि इस तरह की प्रवृत्ति कानूनी प्रक्रिया की गरिमा को नुकसान पहुंचा रही है और इस पर लगाम लगाना बेहद जरूरी है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के कारण उत्पन्न होने वाली कानूनी समस्याओं के लिए जवाबदेही तय की जाएगी.
कोर्ट ने कहा कि अगर कोई न्यायाधीश या वकील जानबूझकर या लापरवाही से ऐसे स्रोतों का इस्तेमाल करता है जो मौजूद ही नहीं हैं, तो उन्हें कानूनी परिणामों का सामना करना होगा. न्यायपालिका की सत्यनिष्ठा को बनाए रखने के लिए ये सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि निर्णय केवल प्रमाणित और वास्तविक कानूनी नजीरों के आधार पर ही लिए जाएं. अब 10 मार्च को होने वाली सुनवाई में एआई के उपयोग को लेकर बड़े दिशा-निर्देश सामने आ सकते हैं.
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