किसानों को राहत, घटिया बीज से आजादी... नियम तोड़ा तो लाखों का जुर्माना, जानें सीड्स एक्ट 2025 क्या है

सीड्स एक्ट 2025 भारत में कृषि बीजों की गुणवत्ता, उत्पादन और बिक्री को नियंत्रित करने के लिए लाया गया नया कानून है, जो 1966 के पुराने कानून की जगह लेगा. इसका उद्देश्य किसानों को बेहतर और शुद्ध बीज उपलब्ध कराना, नकली और घटिया बीजों पर रोक लगाना और बीज व्यवस्था में पारदर्शिता लाना है. इसके तहत केंद्रीय बीज समिति और राष्ट्रीय बीज किस्म रजिस्टर बनाया जाएगा, सभी व्यावसायिक बीज उत्पादकों और विक्रेताओं का पंजीकरण अनिवार्य होगा और बीजों की पहचान के लिए डिजिटल ट्रैकिंग व्यवस्था लागू की जाएगी.

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नया सीड्स एक्ट 2025 पुराने 1966 के कानून की जगह लेगा. (File Photo: ITG) नया सीड्स एक्ट 2025 पुराने 1966 के कानून की जगह लेगा. (File Photo: ITG)

नलिनी शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 03 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:51 PM IST

केंद्र सरकार भारत की कृषि व्यवस्था में बड़े बदलाव की दिशा में काम कर रही है. इसी कड़ी में सीड्स एक्ट 2025 लाया गया है, जो भारत में कृषि बीजों के उत्पादन, वितरण और गुणवत्ता को नियंत्रित करने के लिए एक कानून है. यह नया कानून लगभग छह दशक पुराने सीड्स एक्ट 1966 की जगह लेगा. इसका मकसद आधुनिक तकनीक और प्रशासनिक जरूरतों के हिसाब से नियमों को मजबूत करना, पारदर्शिता बढ़ाना और पारंपरिक खेती की पद्धतियों की सुरक्षा करना है.

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इस प्रस्तावित कानून का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बिक्री और आयात के लिए उच्च गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध हों. साथ ही बीज उत्पादन की प्रक्रिया को सरल बनाना और नकली व घटिया बीजों की समस्या पर लगाम लगाना है, जो लंबे समय से किसानों के लिए चिंता का विषय रही है.

नए कानून के तहत एक मजबूत प्रशासनिक ढांचा तैयार किया गया है. इसके अंतर्गत नई दिल्ली में केंद्रीय बीज समिति का गठन किया जाएगा, जिसे राज्यों में बनी समितियों का सहयोग मिलेगा. केंद्रीय समिति सरकार को बीज नीति, योजना और अंकुरण क्षमता, आनुवंशिक शुद्धता और बीज स्वास्थ्य जैसे राष्ट्रीय मानक तय करने पर सलाह देगी. इसके अलावा, स्वीकृत बीज किस्मों की निगरानी के लिए एक राष्ट्रीय बीज किस्म रजिस्टर भी तैयार किया जाएगा.

अनिवार्य पंजीकरण और तकनीकी निगरानी

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नए कानून के तहत सभी व्यावसायिक बीज उत्पादकों, विक्रेताओं, प्रोसेसिंग इकाइयों, वितरकों और पौध नर्सरियों के लिए राज्य सरकार के पास पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा. इसके साथ ही बीज किस्मों का पंजीकरण भी जरूरी किया गया है. इसका मतलब यह है कि कोई भी बीज किस्म, जब तक राष्ट्रीय रजिस्टर में दर्ज नहीं होगी, तब तक उसे बेचा नहीं जा सकेगा, सिवाय उन किस्मों के जिन्हें छूट दी गई हो.

नकली और घटिया बीजों की बिक्री रोकने के लिए कानून में सेंट्रलाइज्ड सीड ट्रेसबिलिटी पोर्टल ‘SATHI’ का प्रावधान किया गया है. इस पोर्टल के जरिए बीज पैकेट पर यूनिक क्यूआर कोड लगाए जाएंगे, जिससे बीज के स्रोत और उसकी पहचान आसानी से की जा सकेगी.

किसानों के अधिकारों की सुरक्षा

जहां एक ओर यह कानून व्यावसायिक संस्थाओं पर सख्त नियम लागू करता है, वहीं किसानों के अधिकारों और आजीविका की सुरक्षा के लिए स्पष्ट छूट भी देता है. कानून में किसान की परिभाषा ऐसे व्यक्ति के रूप में दी गई है, जो खुद या निगरानी में खेती करता हो. इसमें व्यावसायिक कंपनियों और व्यापारियों को शामिल नहीं किया गया है.

कानून साफ तौर पर कहता है कि कोई भी प्रावधान किसान के इस अधिकार को सीमित नहीं करेगा कि वह किसी भी पंजीकृत किस्म के बीज को बचा सके, इस्तेमाल कर सके, अदला-बदली कर सके, शेयर कर सके या बेच सके. शर्त सिर्फ यह है कि किसान बीज को किसी व्यावसायिक ब्रांड नाम से न बेचे. इसके अलावा, किसानों को अपने खेत में पैदा किए गए बीजों की बिक्री या अदला-बदली पर आपराधिक सजा से भी छूट दी गई है, ताकि सामुदायिक बीज साझा करने की परंपरा को अपराध न बनाया जाए.

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नए कानून में अपराध और सजा का प्रावधान

सीड्स बिल 2025 में अपराधों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है. मामूली अपराध, छोटे अपराध और गंभीर अपराध. 

मामूली अपराधों में पंजीकरण प्रमाणपत्र न दिखाना या सही रिकॉर्ड न रखना शामिल है. ऐसे मामलों में पहली बार लिखित चेतावनी दी जाएगी और दोबारा गलती करने पर 50 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.

छोटे अपराधों में घटिया बीजों की बिक्री, केंद्रीय पोर्टल पर जानकारी अपलोड न करना, गलत ब्रांडिंग या सरकार की ओर से तय कीमत से ज्यादा वसूली शामिल है. इन मामलों में पहली बार 1 लाख रुपये और दोबारा गलती पर 2 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.

गंभीर अपराधों में नकली बीजों की आपूर्ति या बिना पंजीकरण के कारोबार करना शामिल है. ऐसे मामलों में पहली बार 10 लाख रुपये तक और दोबारा अपराध पर 30 लाख रुपये तक का जुर्माना, पंजीकरण रद्द करने और तीन साल तक की जेल का प्रावधान है.

ये सख्त सजा किसान पर लागू नहीं होंगी, अगर वह अपने खेत में पैदा किए गए बीज बेचता या बांटता है. अगर कोई कंपनी अपराध करती है, तो कंपनी के साथ-साथ जिम्मेदार व्यक्ति भी दोषी माने जाएंगे, जब तक कि वह यह साबित न कर दे कि पूरी सावधानी बरतने के बावजूद यह कृत्य उसकी जानकारी के बिना हुआ.

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1966 के कानून से कैसे अलग है 2025 का कानून

सीड्स एक्ट 1966 की तुलना में नया कानून परिभाषाओं का दायरा बढ़ाता है और निगरानी व्यवस्था को ज्यादा सख्त बनाता है. इसमें ‘बीज’ की परिभाषा को विस्तृत करते हुए जीवित भ्रूण, प्रोपेग्यूल, टिशू कल्चर पौधे और सिंथेटिक बीजों को भी शामिल किया गया है, ताकि जैव प्रौद्योगिकी में हुए विकास को ध्यान में रखा जा सके.

नया कानून अनिवार्य बीज स्वास्थ्य मानकों को लागू करता है और डिजिटल व्यवस्था को अपनाता है, जिसके तहत सभी उत्पादकों, विक्रेताओं और वितरकों को ‘SATHI’ पोर्टल पर पंजीकरण करना होगा. हालांकि इससे निगरानी मजबूत होगी, लेकिन उद्योग से जुड़े लोगों पर डिजिटल अनुपालन का अतिरिक्त बोझ भी पड़ेगा. सबसे बड़ा बदलाव यह है कि नए कानून में अपराधों पर लगने वाले जुर्माने और सजाओं को पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ा दिया गया है.

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