संघ के 100 साल: पूर्व हॉकी खिलाड़ी ने असम में बिछाया शाखाओं का जाल, पूर्वोत्तर क्यों था संघ के लिए कठिन

ठाकुर राम सिंह सुबह 3 बजे उठकर 4 बजे शाखा के लिए निकल जाते थे. उनकी दिनचर्या भी अजीब थी. एक कार्यकर्ता के यहां जलपान तो दूसरे के यहां भोजन, ये उनकी आदत बन गई थी. यूं भी असम आसान प्रदेश नहीं था, राम सिंह की कोशिश रहती थी कि हर शाखा पर बराबर समय अंतराल के साथ प्रवास कर सकें. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है पूर्वोत्तर में संघ के पैर जमाने की कहानी.

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पूर्वोत्तर में संघ के विस्तार की कहानी. (Photo: AI generated) पूर्वोत्तर में संघ के विस्तार की कहानी. (Photo: AI generated)

विष्णु शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 27 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:20 PM IST

उनका नाम था ठाकुर राम सिंह, पंजाब के रहने वाले थे. किशोरावस्था में बेहतरीन हॉकी खिलाड़ी थे, खेलते खेलते ही उनकी एक आंख एक दिन फूट गई, फिर घुटने भी खराब हो गए थे. यानी कम से कम हॉकी खेलना तो आगे सम्भव नहीं था. संघ ने उन्हें जीवन की दूसरी राह दिखाई. संघ से जुड़े तो सबसे पहले बाकी पंजाबी स्वयंसेवकों के साथ उनको भी विभाजन से पहले के दंगों का सामना करना पड़ा, बचाव में लगीं संघ टीमों को उनका योगदान हमेशा याद रहा. मुस्लिम बाहुल्य इलाके जो बाद में पाकिस्तान का हिस्सा बन गए, वहां से पीड़ितों को सुरक्षित इलाकों में सुरक्षा से लाने में उनकी अहम भूमिका रही. 1942 में तीसरा संघ शिक्षा वर्ग करने के बाद वो लगभग 2 साल पंजाब में ही बतौर प्रचारक काम करते रहे. लेकिन 1944 में उन्हें असम भेज दिया गया, पहले संघ प्रचारक जो असम की धरती पर संगठन खड़ा करने आए.

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यूं तो 2 साल बाद ही 1946 में दादाराव परमार्थ, श्रीकृष्ण परांजपे, और साथ में दिल्ली में संघ को खड़ा करने वाले वसंतराव ओक भी थे. लेकिन ठाकुर राम सिंह का अपना जलवा था, दूर से राम सिंह अंग्रेज अधिकारी जैसे लगते थे, कड़क आवाज में जब किसी से बात करते थे, तो वो उन्हें अधिकारी ही समझ लेता था. उनको तब असमिया आती नहीं थी, वहां कोई परिचय भी नहीं था. ऐसे में उनका सहायता की गुवाहाटी के कामाख्याराम बरुवा ने, जो पहले मणिपुर में जज रह चुके थे. दोनों ने मिलकर पूरे असम का प्रवास किया. असम के रसूखदार लोगों से परिचय बढ़ाना और जमीन पर संघ की ज्यादा से ज्यादा शाखाएं खड़ी करना आसान नहीं था, सो उन्होंने पहले ज्यादा जोर असमिया सीखने में ही दिया.

सुबह 3 बजे उठकर शाखा के लिए 4 बजे ही निकल जाना ठाकुर राम सिंह की आदत बन गया था, उसके बाद सम्पर्क पर निकलना, एक कार्यकर्ता के यहां जलपान तो दूसरे के यहां भोजन, ये उनकी आदत बन गई थी. यूं भी असम आसान प्रदेश नहीं था, राम सिंह की कोशिश रहती थी कि हर शाखा पर बराबर समय अंतराल के साथ प्रवास कर सकें. बाद में उन्होंने मोटर साइकिल ले ली थी, सो गुवाहाटी से पूर्व में डिब्रूगढ़, जिसकी दूरी 500 किमी के आसपास थी, पश्चिम में धुबड़ी तक और मेघालय का 250 किमी पहाड़ लांघकर सिलचर तो वो मोटरसाइकिल से ही जाते थे.  ठाकुर राम सिंह ने असम का मोर्चा 1971 तक संभाला. तब तक हर जिले में शाखा स्थापित करने का उनका संकल्प भी पूरा हो गया था.  

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1946 में जब दादाराव परमार्थ, वसंत राव ओक और कृष्ण परांजपे आदि पहुंचे थे, उस दिन तारीख थी 27 अक्तूबर और अविभाजित असम की राजधानी थी शिलोंग. उन्होंने तीन शहरों में शाखाएं स्थापित की थीं गुवाहाटी, शिलोंग और डिब्रूगढ़ में. लेकिन पहले बिभाजन की वजह से और फिर संघ पर प्रतिबंध की वजह से जमीन पर खड़ा किया सारा काम फिर से बाधित हो गया तो प्रतिबंध हटने के बाद एकनाथ रानडे को बंगाल, असम समेत पूरे पूर्वोत्तर भारत की प्रभारी बनाकर भेजा गया, उन्होंने कलकत्ता (आज कोलकाता) को अपना केन्द्र बनाकर काम करना शुरू किया.

उन्होंने आरएसएस के ‘सांस्कृतिक विस्तार’ के लिए इस क्षेत्र में कई विवेकानंद केंद्र स्थापित किए, साथ ही अरुणाचल प्रदेश में सात आवासीय विद्यालय भी खोले. आज यह नेटवर्क शाखाओं, विवेकानंद विद्यालयों, बालवाड़ियों, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों, शिक्षण केंद्रों, अध्ययन मंडलों, व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों और एक अस्पताल के साथ विस्तारित हो चुका है. आदिवासी लोगों के बीच कार्यरत वनवासी कल्याण आश्रम (वीकेए) आठ छात्रावास, 42 नर्सरी स्कूल और कोचिंग सेंटर चलाता है, चिकित्सा शिविर आयोजित करता है और आदिवासी टीमों को राज्य से बाहर के खेल आयोजनों में भेजता है.
 
केशवदेव बावरी ने लिखा था वो पहला पत्र, दिया था कार्यालय के लिए अपना मकान

केशवदेव बावरी का योगदान भी कम नहीं, रहने वाले तो राजस्थान के थे, लेकिन कम उम्र में ही असम में आ गए थे, अच्छी असमिया बोलने लगे थे. जब असम में संघ ने पैर नहीं जमाए थे, वो युवावस्था में हनुमान संघ नाम की संस्था चलाते थे, इस संघ के एक सदस्य शंकरलाल शर्मा राजस्था में संघ के स्वयंसेवक रहे थे. उन्होंने केशवदेव को संघ के बारे में बताया, तब केशवदेव ने दिल्ली में संघ के अधिकारियों को पत्र लिखा था. माना जाता है कि वसंतराव ओक को ही उनका पत्र मिला था. केशवदव ने संघ कार्यालय के लिए अपना एक मकान भी दे दिया था. 1961 में असम का पहला संघ शिक्षा वर्ग गुवाहाटी के निकट नारंगी में केशवदेव के ही एक घर में सम्पन्न हुआ था.

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केशवदेव संघ के सम्पर्क में आकर इतना प्रभावित थे कि संघ विचारों की एक पत्रिका ‘आलोक’ जब शुरू हुई तो उनका घर ही सालों तक प्रकाशन कार्यालय रहा. बाद में आलोक के लिए एक स्वतंत्र कार्यालय की व्यवस्था भी केशवदेव ने ही करवाई थी. आज उस स्थान पर भव्य भवन खड़ा है. आज वो नहीं हैं, लेकिन उनके निधन के पूर्व स्थापित राम नारायण बावरी धर्मार्थ न्यास के माध्यम से आज भी समाज हितकारी तमाम कार्य सम्पन्न हो रहे हैं.
 
 लेकिन ये रास्ता आसान नहीं था

लेकिन संघ का काम पूर्वोत्तर में काफी मुश्किल भरा रहा है और उसकी वजह वहां भारत की जमीन के बजाय विदेशी जमीन पर उपजी संस्कृतियों का बाहुल्य होना. 2011 की जनगणना के अनुसार, असम में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत चौंका देने वाला 34 है, जबकि उत्तर-पूर्वी राज्यों में से पांच अन्य राज्यों में आधी से अधिक आबादी ईसाई है — नागालैंड (87.93 प्रतिशत), मिजोरम (87.16 प्रतिशत), मेघालय (74.59 प्रतिशत), मणिपुर (41.29 प्रतिशत) और अरुणाचल प्रदेश (30.26 प्रतिशत). इस सबकी वजह से संघ की राह वहां काफी मुश्किल रही. लेकिन दशकों बाद की छात्र राजनीति ने सब कुछ बदल दिया.

यह स्थिति अखिल असम छात्र संघ (AASU) के आंदोलन के दौरान देखने को मिली. आरएसएस से सम्बद्ध छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने कथित तौर पर कट्टरपंथी राजनीतिक समूहों को आंदोलन को स्वतंत्र राज्य की मांग का विरोध किया. जहां एक ओर एएएसयू ने बांग्लादेशी प्रवासियों के नाम मतदाता सूची से हटाने की मांग की, वहीं संघ का मानना था कि जब हिंदू पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में भी पीड़ित है और यहां भी हम उसे सहारा ना दें, तो उसकी कौन सहारा देगा. सो उनकी मांग केवल घुसपैठिए मुसलमानों को ही मतदाता सूची से बाहर रखने की थी. बाद में सीएए कानून भी इसीलिए बना. हालांकि शुरूआत में एबीवीपी के छात्रों ने आसू के छात्रों को प्रशिक्षण से लेकर बाकी तरह की सहायता भी दी. लेकिन बाद में हिंसा का एक बुरा दौर भी दो दशकों तक रहा.

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1965 में संघ ने चार प्रचारक और भेजे गए. जिनके नाम थे विनायक राव कानितकर, भास्कर राव कुलकर्णी, हरि मिराथर औऱ दंत सागनोलिका थे. विनायक राव कानितकर 1984 से 1996 तक असम प्रांत के सह बौद्धिक प्रमुख रहे, फिर 2002 तक इतिहास संकलन समिति का कार्य किया. फिर असम में ही 2007 तक भारतीय शिक्षण मंडल के लिए काम किया. 2016 तक वो शिक्षण मंडल सहित विभिन्न संगठनों के लिए काम करते रहे. कुल 51 साल तक वो असम में संघ कार्य विस्तार में लगे रहे. 2022 को विनायक राव गोलोक चले गए.  
 
बनवासी कल्याण आश्रम का काम असम में 1977-8 में शुरू हुआ. इसकी पूरे पूर्वोत्तर की जिम्मेदारी वसंतराव भट्ट को मिली, जिन्हें ‘पूर्वोत्तर का भागीरथ’ के तौर पर जाना जाता है. ग्वालियर के रहने वाले वसंत राव ने कोलकाता में कल्याण भवन बनवाया जो पूर्वोत्तर की गतिविधियों का केन्द्र बना. विश्व हिंदू परिषद भी असम में 70 के दशक में ही आई और बांसवारा परियोजना के तहत पूर्वोत्तर के बच्चों को यूपी और राजस्थान के आवासीय विद्यालयों में पढ़ने के लिए भेजा. 1998 में सेवा भारती का का काम भी शुरू हो गया था.
 
ईसाई मिशनरियों के षडयंत्रों के विशेषज्ञ कृष्णराव

इनका नम था कृष्णराव सप्रे. एक बार मध्यप्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल का ही जब वनवासी क्षेत्र में ईसाई मिशनरियों के बहकावे पर विरोध हुआ तो वो गम्भीर हो गए, मिशनरियों की गतिविधियों का पता लगाने के लिए एक नियोगी आयोग गठित कर दिया. संघ ने भी अपने सदस्यों को जोड़ा. उन्हीं में से एक थे कृष्णराव सप्रे. चूंकि जबलपुर के आदिवासी इलाके में पलने की वजह से उन्हें ईसाई मिशनरियों की कार्यशैली की गहरी समझ हो गई थी. उनके पिता संघ में तो मां राष्ट्र सेविका संमिति में सक्रिय रहती थीं, उनके चारों बेटे स्वयंसेवक थे, दो प्रचारक बन गए. कम्युनिस्ट प्रभावों के मुकाबले के लिए चार द्सतों ने एक एक विचार टोली बनाई, बाद में सुदर्शन जी (पांचवे सरसंघचालक) भी उससे जुड़ गए. नियोगी आयोग के साथ जो काम उन्होंने किया, संघ के अधिकारी काफी प्रसन्न थे. इसलिए उनको पूर्वोत्तर भारत में भेजा गया.

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कृष्णराव ने यहां भारतीय जनजातीय सांस्कृतिक मंच की स्थापना की. जो लोग धर्मांतरित हो चुके थे, वो भी वापस आने लगे. कार्यकर्ताओं को जागरूक करने के लिए उन्होंने कई किताबें लिखीं. पूरी जिंदगी वो ईसाई मिशनरियों के षडयंत्रों को उजागर करते रहे कि वो कैसे जनजातियों को बीच धर्मान्तरण का अभियान चला रही हैं. 1999 में जबलपुर के संघ कार्य़ालय में उन्होंने देह त्यागी.
 
83 प्रतिशत हिंदू आबादी, फिर भी त्रिपुरा को भेदना आसान नहीं था

त्रिपुरा की छोटी रियासत में 83 प्रतिशत से अधिक हिंदू आबादी है, राज्य में बड़ी संख्या में आदिवासी आबादी है और आरएसएस ने त्रिपुरा में अपनी पैठ इसी समुदाय की सेवा करके शुरू की. त्रिपुरा में आरएसएस ने 1952 में अपनी गतिविधियाँ शुरू कीं, लेकिन उसे अपनी जड़ें जमाना मुश्किल लगा, संघ ने शुरुआत में त्रिपुरा में "उदबस्तु सहायता समिति" के माध्यम से अपनी गतिविधियाँ शुरू कीं और बाद में शाखाएँ स्थापित करना इतना आसान नहीं था. संघ ने ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के माध्यम से आदिवासियों के लिए कल्याणकारी कार्य भी शुरू किए, जिसने 1979 में राज्य में अपना कार्य शुरू किया. वर्तमान में, वनवासी कल्याण आश्रम राज्य के आदिवासी लोगों के लिए 8 छात्रावास और 6 ‘खेलकूद केंद्र’ चलाता है. 1980 और 1990 के दशक में, त्रिपुरा नेशनल वॉलंटियर्स और नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा जैसे चरमपंथी संगठनों से संघ कार्यकर्ताओं को लगातार खतरा बना रहा.

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यह मामला 1998 में तब और भी गंभीर हो गया जब एनएलएफटी द्वारा आरएसएस के चार प्रचारकों का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी गई. उनके नाम थे, श्यामल सेनगुप्ता, दिनेंद्रनाथ डे (या दिनेन डे), सुधामय दत्ता, और शुभंकर चक्रवर्ती,  हालांकि त्रिपुरा एक बहुसंख्यक हिंदू राज्य है, लेकिन सीपीआई (एम) सरकारों ने संघ के लिए राज्य में राष्ट्रवाद की अपनी विचारधारा का विस्तार करना मुश्किल बना दिया. त्रिपुरा में 83.40 प्रतिशत सनातनी अनुयायी हैं और यहाँ कई दशकों तक कम्युनिस्ट पार्टी का शासन रहा. संघ प्रचारकों और कार्यकर्ताओं को लगभग हर दिन वामपंथी गुंडों द्वारा खड़ी की गई बाधाओं का सामना करना पड़ता था. राज्य में राष्ट्र निर्माण की राह को आगे बढ़ाने के लिए कई अथक संघ कार्यकर्ताओं ने अपने प्राणों की आहुति दी. 1956 से अस्तित्व में होने के बावजूद, स्थिति में धीरे-धीरे बदलाव 2014 के बाद ही आया। अब त्रिपुरा में लगभग 150 शाखाएँ, लगभग 60 मिलन और लगभग 60 मंडली हैं. इसके अतिरिक्त, राज्य में आरएसएस से संबद्ध संगठनों जैसे 'संस्कार केंद्रों' द्वारा 200-250 विद्यालय संचालित किए जाते हैं. गरीब और जरूरतमंद छात्रों के लिए छात्रावास भी उपलब्ध हैं.

असम समेत पूर्वोत्तर भारत में इतने संघ स्वयंसेवकों व प्रचारकों ने अपना पूरा जीवन झोंक दिया और उनमें से ज्यादातर संघ समर्थित सरकार देखने के लिए जीवित भी नहीं रहे. ऐसे कई प्रचारकों, स्वयंसेवकों में मधुकर लिमये, सतीश एंव सुनील त्रिवेदी, अतुल जोग, गजानन बापट, डॉ रामगोपाल गुप्त आदि थे. शायद ही देश का कोई राज्य हो, जहां से संघ ने पूर्वोत्तर में प्रचारक ना भेजें हों. अरसे तक वर्तमान सह सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल भी असम में संघ कार्य देखते रहे हैं.
 
असम में विनाशकारी भूकंप और फिर गुरु गोलवलकर का पत्र

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संघ के कार्यकर्ता समिति के काम में व्यस्त थे, 8 फरवरी 1950 को ही तो वास्तुहारा समिति स्थापित की गई थी कि तभी प्रकृति ने उनके लिए एक और चुनौती खड़ी कर दी. 15 अगस्त 1950 को असम में भीषण भूकंप आया. जिसने ब्रह्मपुत्र नदी का मार्ग ही बदल दिया. हजारों घर बह गए, जमीन में 10 से 15 फीट चौड़ी दरारें पड़ गईं, नदी पर बने पुल ढह गए और करोड़ों रुपये की संपत्ति नष्ट हो गई.

एक बार फिर, संघ के कार्यकर्ता बचाव कार्य में जुट गए. गुवाहाटी में एक ‘भूकंप पीड़ित राहत समिति’ का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष न्यायमूर्ति कामाख्याराम बरुआ थे. गुरु गोलवलकर ने स्वयंसेवकों को आपदा पीड़ितों की सेवा में अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए प्रेरित करते हुए एक पत्र लिखा. सितंबर में उन्होंने समिति के काम की समीक्षा करने के लिए असम का दौरा भी किया और असम के भाइयों को आत्मनिर्भरता का संदेश दिया. वे हर आपदा के समय केवल सरकार या बाहरी मदद पर निर्भर रहने की मानसिकता के खिलाफ थे. साथ ही, वे एक अलग समूह के रूप में काम करने के भी खिलाफ थे. वे चाहते थे कि स्वयंसेवक समाज में घुलमिलकर लोगों के साथ मिलकर काम करें.

गुरु गोलवलकर ने राहत समिति द्वारा किए गए कार्यों की हार्दिक सराहना की. उन्होंने उन स्वयंसेवकों की विशेष प्रशंसा की जो बाढ़ में फंसे लोगों तक तैरकर पहुंचे और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया. वे स्वयंसेवकों के साहस और समर्पण से बहुत प्रभावित हुए, जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर भी राहत कार्यों को अंजाम दिया, और विभिन्न प्रकार के राहत कार्यों को व्यवस्थित करने में उनके अनुशासन की भी सराहना की.
 
पूर्वोत्तर

पूर्वोत्तर आज भी एक विस्फोटक मुद्दा बना हुआ है। ईसाई मेघालय, मिजोरम और नागालैंड राज्यों पर नियंत्रण रखते हैं. असम में बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए बहुसंख्यक बनने के लिए पुरजोर प्रयास करते रहे हैं, त्रिपुरा और मणिपुर कभी भी गंभीर अशांति की चपेट में आते रहे हैं, अभी भले ही शांति हो. अरुणाचल की आबादी को भी ईसाई मिशनरियों द्वारा धीरे-धीरे धर्म परिवर्तन कराया जाता रहा है. इन सभी मुद्दों पर गुरु गोलवलकर समय-समय पर लोगों और सरकार को आगाह करते रहे. 1951 में संघ के मकर संक्रांति समारोह के अवसर पर अपने भाषण में, गुरु गोलवलकर ने इन समस्या ग्रस्त क्षेत्रों का उल्लेख किया. अपने देशव्यापी दौरों के दौरान, उन्होंने मिशनरियों की राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों और वहां की जनजातियों की पारंपरिक धार्मिक आस्थाओं को कमजोर करने की उनकी साजिशों से खुद को पूरी तरह अवगत रखने का पूरा प्रयास किया.

उन्हें विशेष रूप से परेशान करने वाला एक प्रश्न यह था: गोमांस खाने के आदी होने के बावजूद, जबकि हिंदू गाय को अपनी माता मानते हैं, उन्हें हिंदू कैसे माना जा सकता है? वास्तव में, यह संदेह उनके मन में ईसाई मिशनरियों के प्रचार के कारण उत्पन्न हुआ था. गुरु गोलवलकर ने गुवाहाटी में आयोजित सर्व-हिंदू सम्मेलन में उपस्थित द्वारका पीठ के शंकराचार्य और असम के विभिन्न वैष्णव क्षेत्रों के अन्य प्रमुख सत्राधिकारियों से बात की और उन्हें समझाया कि, “जनजातियां, जो मूल रूप से हमेशा से हिंदू रही हैं, समाज और उसकी संस्कृति के शेष भाग से संवाद और संपर्क की कमी के कारण लंबे समय से उचित हिंदू धार्मिक ज्ञान से वंचित रही हैं. इसलिए, अगर वे गो-भक्ति जैसी हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक अवधारणाओं से विमुख रहे हों तो इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी. अतः जनजातियों को बिना किसी संकोच के हिंदू समाज का हिस्सा मानना ​​हमारा पवित्र कर्तव्य था.”
 
गोमांस भक्षण पर बड़ा निर्णय

शाम को हुई सार्वजनिक सभा में द्वारका पीठाधीश ने घोषणा की कि जनजातियाँ हिंदू हैं और उनका गोमांस खाना विशुद्ध आर्थिक विवशता थी, क्योंकि उन पहाड़ी क्षेत्रों के भीतरी इलाकों में उनके लिए कोई अन्य सस्ता भोजन उपलब्ध नहीं था. आचार्य ने आगे कहा कि यह तथाकथित सांस्कृतिक रूप से उन्नत अन्य क्षेत्रों के लोगों की गलती थी कि उन्होंने इतने वर्षों तक उन पहाड़ी क्षेत्रों में जाकर लोगों को हिंदू संस्कृति और विरासत के बारे में शिक्षित करने की परवाह नहीं की. इस प्रामाणिक घोषणा को सुनकर जनजाति नेताओं और प्रतिनिधियों को अत्यंत राहत और गर्व का अनुभव हुआ, जिससे उनकी हिंदू पहचान के बारे में संदेह दूर हो गया. सम्मेलन में, गुरु गोलवलकर का जनजाति नेता के साथ भोजन करना उनके लिए हिंदू एकता की भावना को अपने वास्तविक जीवन में अनुभव करने का एक और मार्मिक अवसर था.

बाद में विश्व हिंदू परिषद के मंच के माध्यम से उत्तर-पूर्व में कई सम्मेलन आयोजित किए गए और इन सम्मेलनों का एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि वहां बचे हुए हिंदू, हिंदू ही बने रहें. गुरु गोलवलकर ने ऐसे सभी अवसरों पर उपस्थित रहना और इस एकता के दृष्टिकोण को दृढ़तापूर्वक प्रस्तुत करना अनिवार्य बना लिया. लेकिन सत्ता में बैठे लोगों के पास ऐसी कोई धारणा या योजना नहीं थी. परिणामस्वरूप, यह समस्या आज तक अनसुलझी बनी हुई है। गुरु गोलवलकर पूछते थे, “यदि नागालैंड भारत का अभिन्न अंग है, तो प्रशासनिक रूप से यह विदेश मंत्रालय के अधीन क्यों है, गृह मंत्रालय के अधीन क्यों नहीं?” यह सब दर्शाता है कि गुरु गोलवलकर देश के जिस भी कोने में राष्ट्रीय हित प्रभावित होता था, उसके प्रति कितने गहरे रूप से चिंतित थे. लोग अक्सर उनसे पूछते थे, “यदि आरएसएस एक राजनीतिक संस्था नहीं है, तो आप राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी क्यों करते हैं?” इसके जवाब में वे कहते थे: “संघ को सत्ता हथियाने में कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन देश की सुरक्षा, सांस्कृतिक एकता और आत्मसम्मान को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने वाली नीतियों पर अपनी राय व्यक्त करना हमारा पवित्र कर्तव्य है.”
 
चीनी आक्रमण

जब चीनियों ने अरुणाचल प्रदेश के बोमडिला तक हमारे क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया और चारद्वार और मिसामारी की ओर नीचे की ओर बढ़ने लगे, तो पूरी सरकारी मशीनरी का मनोबल गिर गया. उपायुक्त समेत कुछ शीर्ष अधिकारी जनता को भी ऐसा ही करने की सलाह देने के बाद सुरक्षित स्थानों पर भाग गए. जेल और पागलखाने के दरवाज़े पास के एक तालाब में फेंक दिए गए. तत्कालीन असम के राजस्व मंत्री श्री फखरुद्दीन अली अहमद ने एनसीसी कैडेटों के सामने अपनी बेबसी ज़ाहिर की और ऊर्जा संयंत्र को डायनामाइट से उड़ाने का आदेश दिया. उसी रात भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने वे दुर्भाग्यपूर्ण शब्द कहे, “मेरा दिल असम की जनता के साथ है” संदेश स्पष्ट था. दिल्ली सरकार ने किसी भी कीमत पर असम को बचाने की अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया था और उसे दुश्मनों के रहमो-करम पर छोड़ दिया था. आज भी, असम के लोग पंडित नेहरू के उस कुख्यात वाक्य को नहीं भूले हैं और महसूस करते हैं कि भविष्य में ऐसी ही किसी घटना के होने पर भारत सरकार उन्हें बुरी तरह निराश करेगी.

कानू डेका, पद्म प्रसाद दास और पद्मजा कांत सेनापति जैसे कुछ स्वयंसेवकों और उनके मित्रों को इसका श्रेय जाता है, जिन्होंने युवाओं का एक समूह बनाकर सैन्य अधिकारियों से संपर्क किया और उनकी मदद से खाली पड़े घरों को बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा लूटे जाने से बचाने के लिए दिन-रात निगरानी रखी. उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि तालाब में फेंका गया पैसा उन राष्ट्र-विरोधी तत्वों के हाथों में न जाए जो बैलगाड़ियों से उस स्थान की ओर बढ़ रहे थे. दूसरी ओर, पूर्णा नारायण सिंह, डॉ. दास, हरकांत दास, विश्व देव शर्मा और नगर पालिका अध्यक्ष श्री दुलल भट्टाचार्य जैसे आम लोगों और कुछ अन्य लोगों ने एक अंतरिम समिति का गठन किया और निर्णय लिया कि वे हार स्वीकार नहीं करेंगे और एक समानांतर सरकार के माध्यम से नेतृत्व प्रदान करेंगे.
 
चीन की आक्रामकता ने दिल्ली सरकार को व्याकुल कर दिया था और उसे भय से भर दिया था लेकिन कुछ ही समय बाद, चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर दी. इस दौरान, गुरु गोलवलकर ने देश भर में दिए गए अपने प्रत्येक भाषण में, आत्मघाती नीति और एक मजबूत और आत्मनिर्भर राष्ट्र के निर्माण की अत्यावश्यक और सर्वोपरि आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने तर्क दिया कि हमें न केवल आक्रामकता का प्रतिरोध करने में सक्षम होना चाहिए, बल्कि हमें तिब्बत को मुक्त कराने के लिए भी खुद को तैयार करना चाहिए,  ताकि हिमालय पर्वतमाला की रक्षा की जा सके, जो हमेशा से हमारी प्राकृतिक रक्षा रही है.
 
प्रयाग में सफल सम्मेलन के बाद, विश्व हिंदू परिषद के प्रांतीय सम्मेलन गुजरात, महाराष्ट्र, असम आदि में आयोजित किए गए और गुरु गोलवलकर उन सभी में उपस्थित रहे. 1970 में असम के जोराहाट में आयोजित सम्मेलन में महिलाओं के लिए एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया था. नागा क्षेत्र की रानी इदेलेउ उस अवसर पर विशेष अतिथि थीं। गुरु गोलवलकर ने माताओं से आग्रह किया कि. “लोगों में उचित संस्कारों का संचार करना उनका पवित्र कर्तव्य है.” उनका मार्गदर्शन सभी उपस्थित लोगों को अत्यंत प्रसन्न कर गया.

उनके भाषण में पूर्वोत्तर क्षेत्र (जिसमें असम, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश शामिल हैं) में आने वाली घटनाओं का पूर्वाभास दिया गया था. इसमें आने वाली विपत्ति से निपटने के तरीके भी बताए गए थे. उन्होंने चेतावनी दी थी कि घुसपैठ के माध्यम से असम को मुस्लिम बहुल प्रांत बनाने की साजिश रची जा रही है, और एक मुस्लिम समर्थक केंद्रीय मंत्री ऐसी घुसपैठ को बढ़ावा दे रहा है. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ईसाई नवगठित मेघालय राज्य में परेशानी खड़ी कर सकते हैं/ गुरु गोलवलकर ने पहले भी मेघालय के गठन के खिलाफ सलाह दी थी, लेकिन कुछ दबाव के कारण इसका गठन हुआ. गुरु गोलवलकर की भविष्यवाणी सच साबित हुई.
 
जब शास्त्रीजी को गुरु गोलवलकर ने कहा ‘आप ऐसा नहीं कर पाएंगे’

गुरु गोलवलकर की मुलाकात एक बार श्री लाल बहादुर शास्त्री से हुई थी, जब शास्त्री गृह मंत्री थे. इस मुलाकात से पहले उनके सामने एक प्रदर्शन हुआ था, जिसमें हजारों प्रदर्शनकारियों ने असम में बांग्लादेश की घुसपैठ के विरोध में ‘हिंदुओं, जागो’ लिखे बैनर लहराए थे. इस पृष्ठभूमि में, स्वाभाविक रूप से यह सवाल बैठक में उठा. शास्त्रीजी ने कहा कि मुस्लिम घुसपैठियों की पहचान करना मुश्किल है, क्योंकि वे स्थानीय मुसलमानों के साथ घुलमिल गए थे. इसके बाद गुरु गोलवलकर ने सुझाव दिया कि स्थानीय नागरिकों को चेतावनी दी जानी चाहिए कि घुसपैठियों को शरण देने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और उन्हें मताधिकार से वंचित कर दिया जाएगा. अगर वे जवाब नहीं देते हैं, तो उन्हें भी बाहर निकाल दिया जाएगा। उसी समय, श्री गुरुजी ने शास्त्रीजी से कहा, “शायद आप ऐसा नहीं कर पाएंगे, क्योंकि यह कांग्रेस पार्टी के चुनावी गणित के अनुरूप नहीं है.” अंततः, ठीक यही हुआ. समय बीतने के साथ, यह समस्या और भी गंभीर होती चली गई.

पिछली कहानी: बंगाल ही RSS का प्रेरणास्रोत, बंगाल ही बनी रही मुश्किल

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