जमीयत उलमा-ए-हिंद की तीन दिवसीय बैठक में पसमांदा मुसलमानों के लिए सरकार की पहल का स्वागत किया गया है, लेकिन यह भी कहा कि इस्लाम में जाति और नस्ल के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है. इसके साथ ही जमीयत के वरिष्ठ नेता अरशद मदनी के ओम, अल्लाह और मनु पर बयान से शुरू हुए विवाद के बीच मुस्लिम धार्मिक और एजुकेशनल बॉडी ने कई प्रस्ताव पारित किए और राष्ट्र को एक संदेश जारी किया.
ये संदेश जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में भीड़ के सामने पढ़ा, जहां सभी धर्मों के नेता मौजूद थे. संदेश में कहा गया है- जमीअत उलमा-ए-हिंद धार्मिक घृणा और संप्रदायवाद को देश की अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है. यह हमारी दीर्घकालीन विरासत और लोकाचार से मेल नहीं खाता है. विभिन्न धर्मों के बीच मैत्रीपूर्ण और भाईचारे के संबंध भारतीय समाज की गौरवपूर्ण और स्थायी पहचान रहे हैं. इन संबंधों में दरार पैदा करने की किसी भी प्लान को राष्ट्रीय अपराध माना जाना चाहिए.
'पवित्र ग्रंथों का अपमान नहीं करेंगे'
इससे पहले दारुल उलूम देवबंद के रेक्टर मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नौमानी ने औपचारिक रूप से संकल्प पत्र पेश किया, जिसका सभी लोगों ने मौखिक समर्थन किया. इस 34वें आम सत्र की अध्यक्षता मौलाना महमूद असद मदनी ने की. लोगों ने संकल्प लिया कि वे कभी भी धर्मगुरुओं और पवित्र ग्रंथों का अपमान नहीं करेंगे और वे समाज को आतंकवाद और घृणा से दूर रखेंगे और देश की रक्षा और सम्मान के लिए प्रयास करेंगे.
मौलाना महमूद मदनी ने संदेश में मुसलमानों को आगाह किया कि वे हमारे देश के आंतरिक और बाहरी दुश्मनों के सीधे निशाने पर हैं, उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से हताश करने, उकसाने और गुमराह करने के लिए हर हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, लेकिन उन्हें निराश नहीं होना चाहिए. धैर्य रखें.
'हमारा देश और धर्म पहले आता है'
संकल्प कहा गया- जिहाद के नाम पर अतिवादी और हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने वाले तथाकथित संगठन देश हित या इस्लाम धर्म के मामले में हमारे सहयोग और समर्थन के हकदार नहीं हैं. वे पूरी तरह से गलत नैरेटिव में 'जिहाद' का इस्तेमाल कर रहे हैं. राष्ट्र के प्रति त्याग, निष्ठा और देश भक्ति हमारा राष्ट्रीय और धार्मिक कर्तव्य है. हमारा धर्म और हमारा देश पहले आता है, यही हमारा नारा है. मातृभूमि के लिए जान देना और उसके सम्मान के लिए मरना, यही हमारे बुजुर्गों ने हमें सिखाया है.
देश की न्यायपालिका पर जमीयत ने संदेश में कहा- न्याय किसी भी सभ्य समाज के लिए सबसे बड़ा मानक है. प्रत्येक शासक का पहला कर्तव्य अपनी प्रजा को समान और निष्पक्ष न्याय प्रदान करना है. सुप्रीम कोर्ट और देश की अन्य अदालतें भारत के सबसे बड़े लोकतंत्र के संरक्षक और ताकत हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से आम धारणा है कि अदालतें राज्य के दबाव में काम कर रही हैं. यह स्थिति कतई स्वीकार्य नहीं है. यदि न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं है तो देश भी स्वतंत्र नहीं है.
संदेश में आगे लिखा है- भारत एक विविध और बहुलवादी समाज वाला एक सुंदर देश है, इसकी मुख्य विशेषताओं में से एक यह है कि विभिन्न धार्मिक विचारों और समारोहों का पालन करने वाले लोगों को अपना जीवन जीने और अपनी विचारधारा का पालन करने की स्वतंत्रता दी जाती है. गांधीजी और उनके जैसे अन्य नेताओं ने भारतीय समाज की इन अनूठी विशेषताओं को बचाने के लिए अथक प्रयास किए. इस संबंध में जमीयत उलेमा-ए-हिंद और उसके नेताओं के प्रयास भी भारत के अतीत और वर्तमान के स्वर्णिम इतिहास के अंग हैं. समग्र राष्ट्रवाद और हिंदू-मुस्लिम एकता का विचार और दर्शन हमारे बुजुर्गों द्वारा छोड़ी गई विरासत है.
इसके विरुद्ध इस्लाम, हिंदुत्व और ईसाई धर्म के नाम पर प्रचारित की जा रही वर्तमान आक्रामक साम्प्रदायिकता इस देश की मिट्टी और लोकाचार से मेल नहीं खाती है. हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि हमारी आरएसएस और बीजेपी से कोई धार्मिक या जातीय दुश्मनी नहीं है, बल्कि हमारा मतभेद विचारधारा पर आधारित है.
'मोहन भागवत के हाल के बयानों का स्वागत'
बयान में आगे कहा- हमारे लिए, हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन भारत के समान नागरिक हैं, हम इंसानों के बीच कोई भेद नहीं करते हैं और नस्लीय श्रेष्ठता को नहीं मानते हैं. हम आपसी सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करने वाले आरएसएस सरसंघ संचालक के हाल के बयानों का स्वागत करते हैं. इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, दोस्ती के लिए बढ़ाया गया हाथ मजबूती से और मजबूत होना चाहिए. इसलिए, हम उन्हें और उनके फॉलोअर्स को आपसी नफरत और शत्रुता को भूलकर एक-दूसरे को गले लगाने और अपनी प्यारी मातृभूमि को दुनिया की सबसे विकसित, आदर्श, सह-अस्तित्व वाली और शांतिपूर्ण महाशक्ति बनाने के लिए गर्मजोशी से आमंत्रित करते हैं.
बताते चलें कि इससे पहले जमीयत के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि देश में 1400 साल से हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रह रहे हैं. उनमें कभी कोई भेद नहीं रहा. अल्लाह ने आखिरी पैगंबर को अरब की धरती पर भेजा. इसी तरह पैगंबर हजरत आदम को सबसे पहले भारत की धरती पर उतारा गया था. आदम पहला आदमी था, जो स्वर्ग से आया था. उन्होंने कहा कि मैं सांप्रदायिकता के खिलाफ रहा हूं और यह भी मानता हूं कि जो भी नफरत को बढ़ावा देता है, वह देशद्रोही है. ऐसे में मुसलमानों को चाहिए कि वे घर, दुकान, बाजार, खेत जहां भी हों, प्रेम का संदेश फैलाएं, क्योंकि इस्लाम किसी भी तरह की दुश्मनी का विरोध करता है.
क्या बोले अलग-अलग धर्मों से जुड़े धर्म गुरु...
इससे पहले विभिन्न धर्मों के नेताओं और गुरुओं ने भी आयोजन में अपने विचार व्यक्त किए. राष्ट्रीय धर्म संसद के प्रमुख गोस्वामी सुशील महाराज ने कहा कि यहां विभिन्न धर्मों के नेताओं की उपस्थिति देश के लिए एक बड़ा संदेश है. अकाल तख्त के जत्थेदार हरदीप पुरी ने कहा कि गुरु नानक देव ने कहा था कि एक भगवान के अलावा कोई नहीं है. उसका ना कोई रूप है. हम सब एक जैसे हैं. हमें सबका सम्मान करना चाहिए. गोस्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज हरिद्वार ने कहा कि देश में कोई समस्या नहीं है. तिर से, ना तलवार से, देश चलेगा प्यार से. उन्होंने कहा कि हमें बीती बातों को भूलकर साथ रहना होगा. लड़ने से कुछ हासिल नहीं होता. यह देश लड़ाइयों के कारण बंटा था।.
जैन संत आचार्य लोकेश मुनि ने कहा कि कोई भी धर्म बांटता नहीं है. इंसान पहले होता है. बाद में हिन्दू और मुसलमान. गुरुद्वारा बंगला साहिब के प्रमुख सरदार परमजीत चंदुक ने कहा कि कुछ विदेशी ताकतें देश को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं. अखंड भारत के लिए एकता जरूरी है. दारुल उलूम देवबंद के रेक्टर मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने लोगों से बैठक के सभी प्रस्तावों को पूरे देश में फैलाने और उन्हें लागू करने की अपील की है.
जमीयत उलमा-ए-हिंद के उपाध्यक्ष मौलाना मुहम्मद सलमान बिजनौरी ने कहा कि हम सभी को जमीयत के घोषणापत्र के अनुसार काम करना चाहिए. उन्होंने कहा कि विभिन्न धर्मों के लोगों को संवाद में भाग लेकर अपनी समस्याओं का समाधान करना चाहिए. उन्होंने कहा कि संवाद एक बड़ी ताकत है, इसे नजरअंदाज करके आगे नहीं बढ़ सकते. जमीयत अहले हदीस हिंद के अध्यक्ष मौलाना असगर अली इमाम मेहदी सलाफी ने अपने संबोधन में कहा कि हमारा देश आज एक नाजुक दौर से गुजर रहा है. जरूरत है देश के बुद्धिजीवियों को एक साथ आने की.
दारुल उलूम वक्फ देवबंद के मौलाना सूफियान कासमी ने कहा कि इस समय देश की स्थिति बहुत ही चिंताजनक है और जमीयत उलेमा हिंद ने जिस सतर्कता से देश को दिशा देने का काम किया है वह काबिले तारीफ है. उन्होंने अपनी ओर से और अपनी पार्टी की ओर से जमीयत के प्रस्तावों का समर्थन किया. दारुल उलूम देवबंद नायब अमीर-उल-हिंद मौलाना मुफ्ती मुहम्मद सलमान मंसूरपुरी ने नसीहत दी कि मुसलमानों को इस रस्सी को मज़बूती से थामना चाहिए.
फरीद निजामी दरगाह हजरत निजामुद्दीन महबूब औलिया ने जमीयत के सभी प्रस्तावों का समर्थन किया. जमीयत उलेमा कर्नाटक के महासचिव मुफ्ती शम्सुद्दीन बिजली ने समान नागरिक संहिता के कार्यान्वयन के विरोध के आधार पर एक प्रस्ताव पेश किया.
आशुतोष मिश्रा