कौन हैं स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, जो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को दे रहे हैं चुनौती... 37 साल से कोर्ट में लड़ रहे केस

प्रयागराज माघ मेले के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और स्वामी वासुदेवानंद के बीच ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य पद को लेकर विवाद तेज हो गया है. यह विवाद वर्षों पुरानी कानूनी लड़ाई का हिस्सा है, जो सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य पदवी पर लगातार सवाल उठ रहे हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य पदवी पर लगातार सवाल उठ रहे हैं

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 22 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:46 PM IST

प्रयागराज माघ मेला के दौरान विवादों में घिरे स्वामी अवमुक्तेश्वरानंद की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं. इस विवाद के बाद लगातार उनके शंकराचार्य पद को लेकर सवाल उठ रहे हैं. माघ मेला प्रशासन ने भी टकराव के बाद यही मुद्दा उठाया था. असल में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद खुद को साल 2022 से ज्योतिष्पीठ ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य बताते रहे हैं. इसी में एक कानूनी पेच है जिसका मसला सुप्रीम कोर्ट में है. 

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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ कौन गया है कोर्ट?
यहीं से ये सवाल उठता है कि अगर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य नहीं हैं तो कौन हैं जो खुद को उनकी जगह शंकराचार्य बताते हैं और कितने साल से ज्योतिर्मठ पर काबिज होने की लड़ाई कोर्ट में लड़ रहे हैं. इस सवाल का जवाब है स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती. उन्होंने ही सुप्रीम कोर्ट में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ अपील की थी. असल में वह ज्योतिर्मठ पर शंकराचार्य पदवी की कानूनी लड़ाई लंबे समय लगभग 37 वर्षों से लड़ रहे हैं.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने प्रतिपक्षी के बारे में आजतक से खास बातचीत में जानकारी दी. उनके मुताबिक, उनके प्रतिपक्षी स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती का विवाद पहले से ही उनके गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के साथ चल रहा था. यह विवाद सुप्रीम कोर्ट में पहले से था. स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले ही कह चुका है कि वह शंकराचार्य नहीं थे. इसी फैसले के खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट गए हैं. 

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कहां से विवाद में फंसे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया कि जब मेरे गुरु का शरीर पूरा हो गया (यानी निधन/ब्रह्मलीन) तब मैं उनके उत्तराधिकारी के रूप में मठ के पद पर आसीन हुआ. उनके पद पर आसीन होने के बाद प्रतिपक्षी स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, जिनसे उनके गुरु का पहले से विवाद चल रहा था, ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर उन्हें शंकराचार्य के रूप में कार्य करने से रोकने की मांग की थी. 

यह मामला 21 सितंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट में सुना गया, जहां अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया. उनका कहना है कि इसके बाद उन्होंने 12 अक्टूबर को पुरी के शंकराचार्य से जुड़ा एक कथित छद्म हलफनामा अदालत में पेश किया, जिसमें कहा गया कि पुरी पीठ ने उन्हें मान्यता नहीं दी है और भविष्य में किसी अन्य का पट्टाभिषेक न कराया जाए. इसी आधार पर अदालत ने एक आदेश पारित किया, जिसे अब संदर्भ से काटकर पेश किया जा रहा है.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने आजतक से कहा कि शंकराचार्य वही होता है, जिसे शेष तीन आम्नाय पीठ मान्यता दें. इसके पहले महाकुंभ में आम्नानाय पीठों के शंकराचार्यों ने उनके साथ कुंभ स्नान किया था. उनका आरोप है कि प्रशासन से बातचीत में सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर जो तथ्य रखे गए, वे अधूरे और भ्रमित करने वाले थे. जिस आदेश का हवाला दिया जा रहा है, उससे लगभग एक महीने पहले ही उनका शंकराचार्य के रूप में विधिवत पट्टाभिषेक हो चुका था. इसकी जानकारी सुप्रीम कोर्ट को दे दी गई थी.

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कौन हैं स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती?
स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने खुद को 1989 में स्वामी कृष्ण देवानंद का शिष्य बताते हुए उनकी वसीयत के आधार पर शंकराचार्य की पदवी का हकदार मनवाया था. वह 26 वर्षों तक ज्योतिर्मठ (बदरिकाश्रम) के शंकराचार्य रहे भी. स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, जिन्होंने खुद को असली शंकराचार्य होने का दावा किया था, उन्होंने इसे लेकर कानूनी लड़ाई लड़ी और फिर इस मामले में जीत हासिल की. साल 2015 में इलाहाबाद की अदालत ने स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को 'फर्जी' करार दिया था. 

इसके साथ ही बदरिकाश्रम स्थित इस प्रतिष्ठित धार्मिक पीठ का नेतृत्व करने से उन्हें रोक दिया गया था.अदालत के मुताबिक उनके इस पद पर चयन की प्रक्रिया उस नियम के तहत नहीं हुई थी, जिसका जिक्र मठाम्नाय अनुशासन (वह ग्रंथ जिसे आदि शंकराचार्य ने लिखा है) में किया गया है.

अदालत ने बताया था फर्जी
2015 में अदालत ने इस अहम फैसले में वासुदेवानंद सरस्वती के दावे को खारिज करते हुए कहा कि ज्योतिर्मठ के वास्तविक शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद  के गुरु) हैं. स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने खुद को शंकराचार्य पदवी की मान्यता दिलाने के लिए अदालत में याचिका दायर की थी. आदेश में अदालत ने स्वरूपानंद के दावे को सही ठहराया और वासुदेवानंद सरस्वती के सभी दावों को खारिज कर दिया. अदालत ने वासुदेवानंद को ‘शंकराचार्य’ की उपाधि का उपयोग करने, गद्दी पर बैठने और दंडी, छत्र जैसे शंकराचार्य से जुड़े प्रतीकों के प्रयोग से भी रोक दिया था.

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कोर्ट में नहीं साबित कर सके थे शंकराचार्य पदवी के सबूत
अदालत ने अपने आदेश में आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'महानुशासन' ग्रंथ का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि ये धार्मिक प्रतीक केवल शंकराचार्य को ही धारण करने का अधिकार है. आदि शंकराचार्य ने चार आम्नाय पीठों की स्थापना की थी, उत्तर में बदरीनाथ का ज्योतिर्मठ, दक्षिण में श्रृंगेरी का शारदा मठ, पूर्व में पुरी का गोवर्धन मठ और पश्चिम में द्वारका का कालिका मठ. 308 पन्नों के इस फैसले में अदालत ने यह भी कहा था कि वासुदेवानंद सरस्वती ने शंकराचार्य पद पर अपने अधिकार को साबित करने के लिए फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किए थे.

कैसे शुरू हुआ था विवाद
बता दें कि साल 1941 में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य नियुक्त किया गया था. स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती ने 18 दिसंबर 1952 को अपनी वसीयत तैयार की थी, जिसमें उन्होंने रामजी त्रिपाठी, द्वारिका प्रसाद, विष्णु देवानंद और परमानंद सरस्वती को क्रमशः भावी शंकराचार्य बताया था. हालांकि ब्रह्मानंद सरस्वती के निधन के बाद कथित रूप से कुछ लोगों की मदद से विष्णु देवानंद को शंकराचार्य बना दिया गया. उन्होंने 25 जून 1953 को कृष्ण बोधाश्रम को अपना उत्तराधिकारी बना दिया.

कृष्ण बोधाश्रम 10 दिसंबर 1973 तक गद्दी पर रहे, लेकिन उन्होंने अपने उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की. इसके बाद काशी विद्वत्पीठ और भारत धर्म महामंडल, (जिन्हें उत्तराधिकारी न होने की स्थिति में मठ का अतिरिक्त प्रभार सौंपने का अधिकार है) ने 1973 में ज्योतिर्मठ की जिम्मेदारी स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को सौंप दी. बाद में वे द्वारका मठ के शंकराचार्य भी बने.

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स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती

अदालत का फैसला- कभी भीं दंडी संन्यासी नहीं रहे वासुदेवानंद सरस्वती
यहां से स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती उनके खिलाफ हो गए और साल 1989 में कृष्ण देवानंद की कथित वसीयत पेश करते हुए दावा किया कि उन्हें उनके गुरु ने शंकराचार्य नामित किया था. लेकिन अदालत ने पाया कि वासुदेवानंद कभी भी कृष्ण देवानंद के शिष्य नहीं रहे और 7 अप्रैल 1989 की तारीख वाले दस्तावेज पूरी तरह फर्जी थे. इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर 14 नवंबर 1989 को उन्हें शंकराचार्य घोषित किया गया था.

अदालत ने 'महानुशासन' ग्रंथ का हवाला देते हुए कहा कि शंकराचार्य वही हो सकता है जो वेद, वेदांत और शास्त्रों का ज्ञाता हो, ब्राह्मण हो, वर्तमान शंकराचार्य का शिष्य हो और दंडी संन्यासी हो. अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि वासुदेवानंद सरस्वती कभी भी दंडी संन्यासी नहीं रहे. इतना ही नहीं, 13 नवंबर 1989 तक वे नौकरी में थे और वेतन भी प्राप्त कर रहे थे.

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