कफ सिरप से कैप्सूल तक… हर तीन घंटे में फेल हो रही एक दवा, आख‍िर सिस्टम में गड़बड़ी कहां है?

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में 20 बच्चों की जान लेने वाले कोल्ड्र‍िफ कफ स‍िरप ने भारत की दवा इंडस्ट्री पर एक बार फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं. सरकार ने दवा पर बैन लगाया, FIR दर्ज हुई और जांच शुरू हुई लेकिन ये कहानी नई नहीं है. पिछले एक दशक में हर साल तीन हजार से ज्यादा दवाएं क्वालिटी टेस्ट में फेल हो रही हैं. सवाल यही है दुनिया को दवाएं देने वाला भारत अपने ही लोगों को जहर क्यों पिला रहा है?

Advertisement
बच्चों की मौतों के पीछे भारत का ब‍िगड़ा ड्रग रेगुलेशन स‍िस्टम? बच्चों की मौतों के पीछे भारत का ब‍िगड़ा ड्रग रेगुलेशन स‍िस्टम?

पियूष अग्रवाल / अंकिता तिवारी

  • नई दिल्ली ,
  • 09 अक्टूबर 2025,
  • अपडेटेड 8:57 PM IST

स‍िर्फ अगस्त भर में इंड‍िया में 94 दवाएं क्वाल‍िटी स्टैंडर्ड की परीक्षा में फेल हो गईं. मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में 20 बच्चे मारे गए, इनमें 85 पर्सेंट बच्चे पांच साल से कम के थे. उनके पेरेंट्स ने बच्चों को ये सोचकर दवा दी थी कि उन्हें खांसी में आराम मिले. लेकिन वो दवा बच्चों के लिए जहर बन गई. वो मासूम हमेशा के लिए दुनिया से व‍िदा हो गए. ये दुखद घटना कोल्ड्र‍िफ कफ सिरप के कारण हुई. 

Advertisement

इसके बाद राज्य प्रशासन जागा और लगातार छापेमारी और टेस्ट किए गए.

चिंताजनक ट्रेंड

. भारत के बाहर भी . हर बार ऐसी त्रासदी के बाद भारतीय नियामक कड़े परीक्षण का वादा कर तो देते हैं, लेकिन होता क्या है. फिर नए हादसे होते हैं और सवाल वहीं का वहीं रहता है कि भारत की दवाओं की सुरक्षा कितनी है और ये समस्याए बार-बार क्यों होती हैं.

डेटा बताता है कि सैंपल टेस्ट‍िंग बढ़ने के बावजूद सबस्टैंडर्ड और नकली दवाएं बाजार में लगातार आती हैं. अगस्त में 2024–25 के दौरान लगभग 1.2 लाख दवा सैंपल टेस्ट किए गए. साल 2014–15 में ये संख्या 74,199 थी यानी लगभग 57 प्रतिशत बढ़ोतरी. फिर भी 3,000 से अधिक दवाएं हर साल मूल गुणवत्ता परीक्षण में फेल होती हैं. सिर्फ 2024-25 में, 3104 सैंपल क्वालिटी ऑफ स्टैंडर्ड में फेल हो गए. इनमें से 245 को नकली या मिलावटी पाया गया. पिछले दशक में 32,000 से अधिक सैंपल टेस्ट फेल हुए और 2,500 से ज्यादा नकली या मिलावटी पाए गए. औसतन हर दिन आठ दवाएं गुणवत्ता परीक्षण में फेल होती हैं यानी लगभग हर तीन घंटे में एक.

Advertisement

अभियोगों (Prosecutions ) की संख्या भी बढ़ी है. ये संख्या साल 2014-15 में 152 से बढ़कर 2024-25 में 961 हो गई. इससे क्या होता है क्या ये बदलाव है. जी नहीं, ये सभी रिएक्शन हैं न क‍ि सुधार. राज्यसभा में स्वास्थ्य मंत्रालय ने जुलाई में माना कि भारत में नकली दवा की कानूनी परिभाषा ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट,1940 में मौजूद नहीं है.

छिपी हुई महामारी

व‍िडंबना तो ये है कि हर महीने जारी करता है. इसमें ऐसे दर्द निवारक, एंटीबायोटिक और कफ सिरप जैसी दवाओं को लिस्टेड किया जाता है जो क्वाल‍ि‍टी टेस्ट में फेल होते हैं. बीते अगस्त 2025 के लेटेस्ट अलर्ट में 94 प्रोडक्ट मानक गुणवत्ता की श्रेणी में फेल पाए गए.

पिछले साल से इस तरह के अलर्ट में तेजी आई है. साल 2024 में 877 सबस्टैंडर्ड दवाएं पाई गईं. फिर साल 2025 के पहले आठ महीनों में 1,184 दवाएं और मार्च 2024 से अगस्त 2025 तक 12 कफ सिरप सबस्टैंडर्ड पाए गए जो बच्चों की मौत के मामले को देखते हुए चिंताजनक है.

देखा जाए तो इन अलर्टों से भी बड़ी खामी उजागर होती है. जून 2025 के  में कई राज्यों ने डेटा नहीं भेजा जिससे भारत की ओवर ऑल नेशनल लेवल की तस्वीर अधूरी है. इससे सवाल उठता है कि कितनी अनसेफ दवाएं अभी भी पता नहीं चली हैं.

भारत की साख पर खतरा

Advertisement

'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' का ख‍िताब पा चुके भारत ने पिछले दशक में लगभग सात प्रतिशत सालाना दर से अपने  . लेकिन हर वैश्विक चेतावनी इस भरोसे को कमजोर कर देती है.

WHO ने 2022 के बाद से कई चेतावनियां जारी की हैं. पहले  फिर    और   में भारतीय सिरप में खामी पाई गई. के अनुसार, कम और मध्यम आय वाले देशों में हर 10 दवाओं में से 1 नकली या घटिया होती है. भारत में दवाओं की जांच तो पहले से ज्यादा हो रही है, लेकिन इससे सुरक्षा में कोई खास सुधार नहीं दिखा. जब तक देश ‘नकली दवाओं’ की कानूनी परिभाषा तय नहीं करता और हानि होने से पहले कार्रवाई शुरू नहीं करता, तब तक अगली घातक दवा बस एक शिपमेंट की दूरी पर है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement