ब्राह्मणवाद के विरोधी और दलित चिंतक... तमिल पॉलिटिक्स की दिशा बदलने वाले 'पेरियार' कौन हैं

पेरियार, जिनका जन्म 17 सितंबर 1879 को हुआ, तमिलनाडु के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं. उन्होंने जाति आधारित भेदभाव और ब्राह्मणवाद के खिलाफ आवाज उठाई और द्रविड़ आंदोलन की नींव रखी.

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पेरियार को द्रविड़ राजनीति के बड़े चेहरे के तौर पर जाना जाता है पेरियार को द्रविड़ राजनीति के बड़े चेहरे के तौर पर जाना जाता है

टीआर जवाहर

  • नई दिल्ली,
  • 11 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 5:00 PM IST

तमिलनाडु के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो पेरियार का नाम बोल्ड और कैपिटल में उभरता दिखाई देता है. असल में पेरियार को लेकर अलग-अलग लोगों के विचार बहुत अलग-अलग हो सकते हैं. वहीं पेरियार ऐसे भी हैं उन्हें द्रविड़ राजनीति को समझने की राह में एक जरिया माना जा सकता है. 17 सितंबर 1879 को इरोड वेंकट रामासामी नायकर के रूप में जन्मे ईवीआर एक ऐसे समाज में पैदा हुए, जहां जाति की रेखाएं लोहे जितनी ही कठोर थीं.

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उनके पिता वेंकटप्पा नायकर कोई साधारण दुकानदार नहीं थे. वे इरोड के एक समृद्ध और प्रभावशाली व्यापारी थे, जिनका कारोबार किराने के सामान से लेकर सोने तक फैला हुआ था.

वेंकटप्पा वैष्णव थे. पूजा-अनुष्ठानों और परंपरागत ब्राह्मण समाज के लिए आयोजित होने वाले भव्य भोज-भात के इर्द-गिर्द ही उनका जीवन बीता. बाहर की दुनिया के लिए नायकर परिवार बड़ा धार्मिक माना जाता था, लेकिन इन परंपराओं के बीच ईवीआर अपना दम घुटता हुआ महसूस करते थे.

बचपन के सवाल और परंपराओं से टकराव

उनकी मां चिन्नाथ्ये मुथम्मल इस पारंपरिक ढांचे की नींव थीं. ईवीआर परिवार में बीच के बच्चे थे, ऐसा वातावरण जो अक्सर या तो संत पैदा करता है या विद्रोही. ईवीआर ने बचपन में ही विद्रोह का रास्ता चुन लिया था. बचपन से ही वे सवाल करने लगे थे कि क्यों कुछ मेहमानों को घर के भीतर बैठाकर भोजन कराया जाता है, जबकि कुछ को आंगन या पीछे बैठाया जाता है. उनकी जिज्ञासा की पहली चिंगारी किसी क्रांतिकारी पुस्तक से नहीं, बल्कि उन्हीं धार्मिक भोजों से उठी जिन्हें उनके पिता आयोजित करते थे. वहीं उन्होंने देखा कि अक्सर भक्ति के पीछे विशेषाधिकार का मुखौटा छिपा होता है.

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ईवीआर ने महज पांच साल बाद ही स्कूल छोड़ दिया. रटंत विद्या के बजाय उन्होंने इरोड के बाजार की जीती-जागती दुनिया से ज्यादा ज्ञान हासिल किया. किशोर होते-होते वे फैमिली बिजनेस में उतर गए और सौदेबाजी उनके लिए बाएं हाथ का खेल बन गया. यहीं से समाज को समझने की उनकी शुरुआत हुई.

दिलचस्प बात यह है कि बाद में 'द्रविड़' आंदोलन का प्रतीक बनने वाले ईवीआर का पारिवारिक मूल कन्नड़ था. तमिल पहचान की राजनीति में यह उनके लिए एक चुनौती हो सकती थी, लेकिन उन्होंने इसे एक राजनीतिक रणनीति में बदल दिया. 'द्रविड़' पहचान को उन्होंने एक व्यापक छतरी की तरह इस्तेमाल किया, जिसमें दक्षिण भारत की कई भाषाई पहचानें समा सकती थीं.

काशी यात्रा: आस्था से टकराव और तर्कवाद की शुरुआत

19 वर्ष की उम्र में उनका विवाह नागम्मई से हुआ. यह एक पारंपरिक अरेंज मैरिज थी. लेकिन ईवीआर का स्वभाव शुरू से ही सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देने वाला था. उन्होंने अपने युवाकाल के कई ऐसे अनुभवों को खुले तौर पर स्वीकार किया, जिन्हें उस दौर में छिपाया जाता था. उन्होंने इस बात को भी स्वीकारा कि वे वैश्यालयों तक भी जाते थे. उनके लिए यह पाखंड के खिलाफ खुलापन था, ऐसी स्वीकारोक्ति जिसने उन्हें आलोचना से लगभग अजेय बना दिया.

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उनकी मित्र मंडली के साथ नदी किनारे आयोजित होने वाली दारू-दावतों की कहानियां भी चर्चित बन गईं और कई लेखक लिखते हैं कि इन आयोजनों में उनकी पत्नी नागम्मई भी मेहमानों को भोजन परोसती थीं.

ईवीआर के जीवन का निर्णायक मोड़ काशी यात्रा बनी. परिवारिक तनाव से दूर होने के लिए वे बनारस पहुंचे. वहां उन्होंने धार्मिक व्यवस्था का एक अलग चेहरा देखा. एक ब्राह्मण धर्मशाला में भोजन पाने के लिए उन्हें खुद को ब्राह्मण बताना पड़ा. वहां खाना खाने के लिए उन्हें जनेऊ पहनना पड़ा, लेकिन बाहर उन्होंने देखा कि गैर-ब्राह्मणों को भोजन तक नहीं दिया जा रहा था.

कहा जाता है कि जब उनकी असल पहचान सामने आई तो उन्हें वहां से निकाल दिया गया. यह अनुभव उनके लिए गहरा झटका था. बाद में उन्होंने कहा कि उसी क्षण उन्हें धर्म की उस व्यवस्था का असली चेहरा दिखाई दिया. यहीं से उनके भीतर तर्कवाद और सामाजिक विद्रोह की आवाज जन्मी.

1910 के दशक के अंत तक ईवीआर इरोड के सार्वजनिक जीवन में एक प्रमुख नेता बन चुके थे. वे एक साथ लगभग 29 सार्वजनिक पदों पर कार्य कर रहे थे, जिनमें इरोड नगरपालिका के अध्यक्ष का पद भी शामिल था. उन्होंने नगर प्रशासन में जल आपूर्ति सुधार, स्वच्छता अभियान और मंदिर प्रबंधन में कई सुधार किए. स्वतंत्रता आंदोलन से प्रेरित होकर उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एंट्री ली और शराबबंदी के प्रबल समर्थक बन गए. उन्होंने शराब की दुकानों के खिलाफ आंदोलन चलाया और यहां तक कि अपने बागान के लगभग 500 नारियल के पेड़ कटवा दिए ताकि ताड़ी उत्पादन रुक सके.

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वैकोम सत्याग्रह: ‘वैकोम वीरर’ के रूप में पहचान

1924 में केरल के वैकोम में एक बड़ा आंदोलन हुआ. दलितों को मंदिर के आसपास की सड़कों पर चलने तक की अनुमति नहीं थी. जब स्थानीय नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, तब ईवीआर को आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए बुलाया गया. उन्होंने आंदोलन को व्यापक रूप दिया और गिरफ्तारी की परवाह किए बिना विरोध प्रदर्शन जारी रखा. उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा. इस संघर्ष के बाद उन्हें “वैकोम वीरर” यानी वैकोम का वीर कहा जाने लगा.

जैसे-जैसे उनकी लोकप्रियता बढ़ी, वैसे-वैसे उनकी भाषा भी अधिक तीखी होती गई. वे ब्राह्मणवाद की कड़ी आलोचना करते थे और कई बार उनके बयान अत्यधिक विवादास्पद हो जाते थे.

उनकी आलोचना का केंद्र ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना थी, लेकिन कई बार उनकी भाषा समुदाय विशेष पर भी कठोर प्रतीत होती थी. यही कारण है कि उनके विचारों को लेकर आज भी गहरी बहस जारी है.

एक व्यापारी से आंदोलनकारी तक: पेरियार की विरासत
1920 के दशक के अंत तक इरोड का यह व्यापारी दक्षिण भारत के सबसे चर्चित सामाजिक नेताओं में बदल चुका था. हालांकि उन्हें आधिकारिक रूप से “पेरियार” की उपाधि 1938 में मिली, लेकिन उनके विचारों और आंदोलनों ने उससे पहले ही एक व्यापक सामाजिक बदलाव की नींव रख दी थी. महिलाओं के अधिकार, तर्कवाद और सामाजिक समानता के लिए उनका संघर्ष द्रविड़ आंदोलन की आधारशिला बना. इरोड का यह विद्रोही धीरे-धीरे एक ऐसे विचारक में बदला की उसकी छाया आगे चलकर दक्षिण भारत की पूरी राजनीति पर पड़ी, जो आज भी हावी है.

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