मद्रास हाईकोर्ट में फिल्म 'जन नायगन' से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आज प्रक्रिया को लेकर अहम सवाल उठे. कोर्ट ने साफ तौर पर पूछा कि क्या सिर्फ दो दिनों में इस मामले पर फैसला करना सही था और क्या CBFC (सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) को अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था.
CBFC क्या है और फिल्म पर विवाद क्या है?
CBFC यानी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड वो वैधानिक संस्था है जो फिल्मों को सिनेमाघरों में रिलीज से पहले सर्टिफिकेट जारी करती है. किसी भी फिल्म को पब्लिक रिलीज के लिए CBFC से मंजूरी लेना अनिवार्य होता है. बोर्ड ये तय करता है कि फिल्म को U, UA, A या S सर्टिफिकेट मिलेगा या उसमें किसी तरह की कटौती या बदलाव की जरूरत है. वहीं फिल्म जन नायगन जिसका तमिल में अर्थ होता है जनता का नेता, इसके बारे में कहा जा रहा है कि निर्माता पक्ष की ओर से अब तक ये दावा नहीं किया गया है कि फिल्म किसी वास्तविक नेता या सच्ची घटना पर आधारित है या नहीं. खासकर फिल्म का विरोध कंटेंट को लेकर नहीं है, बल्कि कानूनी प्रक्रिया को लेकर है.
कोर्ट में आज क्या हुआ?
सुनवाई की शुरुआत में हाईकोर्ट की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को देखा और दोनों पक्षों के वकीलों से पूछा कि उन्हें बहस के लिए कितना समय चाहिए. CBFC और फिल्म निर्माताओं दोनों ने 30-30 मिनट का समय बताया.
इसके बाद CBFC की ओर से पेश एएसजी सुंदरसन ने दलीलें रखनी शुरू कीं. उन्होंने कोर्ट को बताया कि फिल्म निर्माताओं को पहले ही एक आधिकारिक सूचना भेज दी गई थी, जिसमें कहा गया था कि CBFC का पहले का फैसला फिलहाल होल्ड पर रखा गया है. CBFC के मुताबिक, ये बात खुद निर्माताओं की याचिका में भी दर्ज है कि उन्हें ये जानकारी मिल चुकी थी.
CBFC ने ये भी कहा कि जब हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई, उससे पहले ही बोर्ड ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी. इसके बावजूद याचिका में कहीं भी CBFC चेयरमैन के आदेश को सीधे तौर पर चुनौती नहीं दी गई.
सिंगल जज के फैसले पर सवाल
CBFC के वकील ने कहा कि सभी मूल दस्तावेज सिंगल जज की बेंच के सामने पेश किए गए थे और कोर्ट को बताया गया था कि चेयरमैन के आदेश को चुनौती नहीं दी गई है. CBFC ने काउंटर एफिडेविट दाखिल करने की अनुमति मांगी थी, लेकिन इसके लिए समय नहीं दिया गया. उनका कहना था कि सिंगल जज ने दस्तावेज अपने चैंबर में देखे, लेकिन CBFC को लिखित जवाब दाखिल करने का मौका नहीं मिला.
हाईकोर्ट का अहम सवाल
इस पर हाईकोर्ट ने मुख्य सवाल उठाया कि क्या यह मामला सिर्फ दो दिनों में तय किया जा सकता था? और क्या CBFC को अपना पक्ष रखने के लिए वाकई पर्याप्त मौका मिला? कोर्ट ने साफ कहा कि अगर यह पाया गया कि CBFC को उचित अवसर नहीं दिया गया तो मामले के मेरिट्स यानी गुण-दोष में जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.
CBFC की दलील
CBFC ने नियमों का हवाला देते हुए कहा कि आमतौर पर काउंटर एफिडेविट दाखिल करने के लिए 4 से 8 हफ्ते का समय दिया जाता है. अगर इतना नहीं तो कम से कम दो दिन का वक्त तो मिलना चाहिए था. बोर्ड का आरोप है कि फिल्म निर्माताओं ने CBFC से सर्टिफिकेट लिए बिना ही रिलीज डेट घोषित कर दी और फिर देरी होने पर नुकसान का तर्क देने लगे. CBFC का कहना है कि रिलीज डेट एकतरफा तय की गई और बोर्ड को अपनी बात रखने का मौका ही नहीं मिला.
अब हाईकोर्ट इस बात पर विचार करेगा कि निचली अदालत में CBFC को पर्याप्त सुनवाई का अवसर मिला था या नहीं. इसी आधार पर आगे की दिशा तय होगी.
aajtak.in