जयपुर की गुलाबी गलियों में, जहां हर पल कैमरों की क्लिक और सेल्फियों की चहल-पहल सुनाई देती है, वहीं हवा महल के पास एक कोना ऐसा भी है जहां वक्त जैसे ठहर जाता है. यहां आधुनिकता की तेज रफ्तार के बीच एक शख्स आज भी इतिहास को अपने हाथों में थामे खड़ा है टीकम चंद, जिन्हें लोग प्यार से 'ओल्ड फोटोग्राफर' के नाम से जानते हैं.
करीब 200 साल पुराने लकड़ी के बॉक्स कैमरे के साथ खड़े टीकम चंद सिर्फ तस्वीरें नहीं खींचते, बल्कि हर फ्रेम में एक कहानी कैद करते हैं. ये कैमरा 1860 के दशक का है और इसमें लगा असली Carl Zeiss Jena लेंस आज भी उतनी ही खूबसूरती से ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें उकेरता है, जितना कभी शाही दौर में करता था.
खास बात ये है कि ये कैमरा अपने आप में एक पूरा चलता-फिरता डार्करूम है. जिसमें डेवलपर, फिक्सर और फिल्म बॉक्स सब कुछ उसी 20 किलो के ढांचे में समाया हुआ है.
दादा की विरासत संभाल रहे टीकम चंद
इस अनोखी विरासत की शुरुआत टीकम चंद के दादा, पहाड़ी लाल से हुई थी, जो जयपुर रियासत के आधिकारिक फोटोग्राफर थे. कहा जाता है कि ये कैमरा उन्हें जयपुर के महाराजा की तरफ से तोहफे के तौर पर दिया गया था. रियासतों के खत्म होने के बाद इस ऐतिहासिक धरोहर को उनके पिता मोहन लाल ने संभाला और फिर 1977 में टीकम चंद ने इसे अपने हाथों में लिया.
हवा महल के बाहर सेट करते हैं कैमरा
तब से लेकर आज तक वे इस कैमरे की हर छोटी-बड़ी बारीकी को समझते हुए इसे परंपरा की तरह आगे बढ़ा रहे हैं. हवा महल के बाहर जब टीकम चंद अपना कैमरा सेट करते हैं, तो वहां से गुजरने वाले पर्यटक ठिठक कर रुक जाते हैं. डिजिटल युग में जहां तस्वीरें सेकंडों में खींची और भुला दी जाती हैं, वहीं टीकम चंद की तस्वीरें वक्त लेती हैं, लेकिन बदले में एक यादगार अनुभव देती हैं.
फ्रांस से मंगवाई गई खास फिल्म पर खींची गई हर तस्वीर हाथों से तैयार की जाती है, जिसमें एक अलग ही आत्मा और गहराई होती है. करीब 500 रुपये में मिलने वाली ये तस्वीर सिर्फ एक फोटो नहीं होती, बल्कि इतिहास का एक टुकड़ा होती है. एक ऐसा लम्हा जो समय के साथ फीका नहीं पड़ता.
लुप्त होती कला को जिंदा रख रहे टीकम
हर क्लिक के साथ टीकम चंद न सिर्फ लोगों की तस्वीरें कैद करते हैं, बल्कि एक लुप्त होती कला को भी जिंदा रखे हुए हैं. आज जब दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है, टीकम चंद जैसे कलाकार हमें ये याद दिलाते हैं कि असली खूबसूरती सिर्फ तकनीक में नहीं, बल्कि उस एहसास में है जो किसी चीज को खास बनाता है. उनकी ये अनोखी पहल न सिर्फ जयपुर की पहचान को और खास बनाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेशकिमती विरासत भी संजोए हुए है.
रिदम जैन