बारिश से पहले मौसम विभाग को कैसे चल जाता है पता, IMD का Prediction model कैसे काम करता है? जानिए

Weather Prediction Model: IMD की रडार, सैटेलाइट और NWP मॉडल के टीमवर्क से मौसम विभाग को पहले ही पता चल जाता है कि कब बारिश होगी. NWP मॉडल वायुमंडल को कंप्यूटर पर सिमुलेट करके भविष्य दिखाता है. आइए जानते हैं मौसम विभाग का प्रेडिक्शन मॉडल और ये सिस्टम कैसे काम करता है.

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IMD Weather Prediction Model (File Photo- Reuters) IMD Weather Prediction Model (File Photo- Reuters)

सना जैदी

  • नई दिल्ली,
  • 10 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 3:36 PM IST

IMD's Prediction Model: फरवरी का महीना भारत के लिए मौसम के लिहाज से बहुत खास होता है. सर्दी धीरे-धीरे विदा हो रही होती है, लेकिन अचानक हल्की बारिश, ठंडी हवाएं और कभी-कभी कोहरा भी आ जाता है. खासकर उत्तर भारत, हिमालयी इलाकों और उत्तर-पश्चिमी राज्यों में फरवरी में बारिश और बर्फबारी देखने को मिलती है. लेकिन यह बारिश अचानक क्यों आती है? और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) पहले ही बारिश की इतनी सटीक भविष्यवाणी कैसे करता है? आइए समझते हैं मौसम विभाग का प्रेडिक्शन मॉडल और ये सिस्टम कैसे काम करता है.

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वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के असर से कैसे होती है बारिश? 
भारत में फरवरी महीने में होने वाली ज्यादातर बारिश का कारण पश्चिमी विक्षोभ यानी वेस्टर्न डिस्टर्बेंस (Western Disturbance) होता है. यह एक तरह का चक्रवाती तूफान (extratropical storm) है, जो भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) के इलाके से शुरू होता है. यह तूफान अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते भारत की ओर बढ़ता है. जब यह विक्षोभ हिमालय से टकराता है, तो नमी भरी हवा ऊपर उठती है. जो ठंडी होती है और फिर बादल बनते हैं. इससे पहाड़ों पर बर्फबारी और मैदानी इलाकों में हल्की से मध्यम बारिश होती है.

यह विक्षोभ ज्यादातर दिसंबर से फरवरी तक एक्टिव रहते हैं. फरवरी में 4-5 ऐसे विक्षोभ आ सकते हैं, जिनका जीवनकाल 2-5 दिन का होता है. इसके असर से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली-NCR और कभी-कभी मध्य भारत तक बारिश होती है.

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2026 की फरवरी में भी कई पश्चिमी विक्षोभ एक्टिव हुए हैं. IMD के अनुसार, फरवरी की शुरुआत में 1-3 फरवरी, 5-6 फरवरी और 9-11 फरवरी जैसे समय में बारिश-बर्फबारी का दौर वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की वजह से ही है. इससे तापमान में उतार-चढ़ाव आया और ठंड फिर से बढ़ी. हालांकि, इस साल कुछ जगहों पर बारिश सामान्य से कम रही, जिससे तापमान थोड़ा ज्यादा है. यह बारिश रबी फसलों (गेहूं, सरसों आदि) के लिए फायदेमंद होती है, क्योंकि इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और सिंचाई की जरूरत कम पड़ती है. लेकिन ज्यादा तेज बारिश से फसलों को नुकसान भी हो सकता है.

IMD की टेक्नोलॉजी: रडार, सैटेलाइट और NWP मॉडल कैसे काम करते हैं?
IMD दुनिया के सबसे बेहतरीन मौसम विभागों में से एक है. यह कई आधुनिक तकनीकों से मौसम की निगरानी करता है और सटीक पूर्वानुमान देता है. आइए जानते हैं ये कैसे काम करता है.  

डॉप्लर वेदर रडार (Doppler Weather Radars)
IMD के पास देशभर में कई X-band और S-band Doppler रडार हैं. ये रडार बादलों से आने वाली बारिश, हवा की गति, तूफान और ओले जैसी चीजों को 150-200 किमी दूर तक देख सकते हैं. ये रीयल-टाइम में बादलों की आवाजाही, बारिश की तीव्रता और दिशा बताते हैं. इससे अबकास्ट (अगले 1-3 घंटे का पूर्वानुमान) बहुत सटीक होता है, जैसे अचानक तेज बारिश या गरज के साथ बौछार का पूर्वानुमान.

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सैटेलाइट इमेजरी (Satellite Imagery)
IMD ISRO के INSAT सैटेलाइट्स का इस्तेमाल करता है. ये सैटेलाइट बादलों की तस्वीरें, तापमान, नमी और हवा के पैटर्न को अंतरिक्ष से भेजते हैं.  ये पूरे भारत और आसपास के इलाकों की लगातार मॉनिटरिंग करते हैं. सैटेलाइट ही पश्चिमी विक्षोभ यानी वेस्टर्न डिस्टर्बेंस जैसे बड़े सिस्टम को बहुत पहले ट्रैक कर लेती है.

न्यूमेरिकल वेदर प्रेडिक्शन (NWP) मॉडल
यह IMD का सबसे मजबूत हथियार है. NWP यानी संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान.  इसमें सुपरकंप्यूटर पर वायुमंडल के नियमों (भौतिकी और गणित के समीकरण) को डालकर भविष्य का मौसम सिमुलेशन किया जाता है.
  

  • IMD के मुख्य मॉडल:  GFS (Global Forecast System): पूरी दुनिया का पूर्वानुमान, 4 बार रोज अपडेट होता है.
  • WRF (Weather Research and Forecasting): भारत के लिए हाई-रेजोल्यूशन (3 km तक), लोकल मौसम के लिए बेहतर है. 
  • Bharat Forecast System: भारत-केंद्रित नया मॉडल, AI/ML के साथ.

ये मॉडल रडार, सैटेलाइट, ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन (AWS), जहाजों-हवाई जहाजों से डेटा लेते हैं.  
सुपरकंप्यूटर (जैसे Arunika) पर लाखों गणनाएं करके 1-15 दिन तक का पूर्वानुमान बनाते हैं.
अब AI और मशीन लर्निंग से पूर्वानुमान 40-50% ज्यादा सटीक हो गया है.

रीयल-टाइम मॉनिटरिंग: कैसे डेटा बनकर हम तक पहुंचते हैं?
हजारों ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन, बुओ (समुद्र में), एयरक्राफ्ट और सैटेलाइट से हर मिनट-मिनट डेटा आता है. IMD के वैज्ञानिक इस डेटा को असिमिलेट (मिलाकर) करते हैं और NWP मॉडल में डालते हैं. मॉडल हर 6-12 घंटे में नया रन चलाते हैं. फिर फोरकास्टर इसे चेक करके बुलेटिन, ऐप (UMANG, Mausam), TV और सोशल मीडिया पर जारी करते हैं. इससे सुबह-शाम मौसम पूर्वानुमान का अपडेट मिलता है.

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