सुविधा की आस्था,आध्यात्मिक मनोरंजन... भजन क्लबिंग और श्राइनकेशन से कैसे भक्ति की दुनिया बदल रहा GenZ?

भारत की नई पीढ़ी ने आस्था को नया रूप दिया है. भगवान को मानने के लिए अब सिर्फ धूप-दीपक ही ज़रूरी नहीं, बल्कि कूल रहकर भी अपने धर्म और आस्था को अपनाया जा सकता है. नई पीढ़ी तीर्थस्थलों पर जा रही है लेकिन अपने तरीके से, भगवान से जुड़ने का तरीका भी अपना है. नई पीढ़ी का ये कैसा स्टाइल है और कैसे आस्था को अपनी सुविधा, अपने तरीके से बदला जा रहा है. यहां समझते हैं...

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ये नए ज़माने की भजन संध्या है, जहां माहौल पूरी तरह क्लब वाला होता है. ये नए ज़माने की भजन संध्या है, जहां माहौल पूरी तरह क्लब वाला होता है.

मोहित ग्रोवर

  • नई दिल्ली,
  • 25 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 8:00 AM IST

दिल्ली-एनसीआर में गर्मी बढ़ रही है, मौसम विभाग वॉर्निंग दे रहा है कि घरों से बाहर तभी निकलें जब बहुत ही ज़रूरी हो. यही वजह है कि मैदानों की तपिश से बचने के लिए लोग अब पहाड़ों का रुख करेंगे और इसी बीच चार धाम की यात्रा का शोर भी शुरू हो चुका है. पहाड़ की ठंडी हवाओं और धार्मिक सुकून के लिए दिल्ली-एनसीआर से लेकर देश भर में लोग अपनी छुट्टियां प्लान कर रहे हैं. लेकिन ये धार्मिक टूरिज्म सिर्फ पहाड़ों की यात्रा तक सीमित नहीं है. अब धर्म का यह सफर पहाड़ों की ऊंचाइयों से उतरकर शहरों के ऑडिटोरियम और क्लब तक पहुंच चुका है. जिसे आज की पीढ़ी 'भजन क्लबिंग' कह रही है.

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भारत में आज के दौर का 'धार्मिक होना' एक ऐसा फिनोमिना बन चुका है, जिसे समझना हो तो आपको मंदिर की सीढ़ियों से लेकर इंस्टाग्राम के एल्गोरिदम तक का सफर करना होगा. पिछले कुछ वक्त में हमने एक बड़ा शिफ्ट देखा है कि नई पीढ़ी अचानक से धर्म की ओर मुड़ रही है, लेकिन यह वापसी पुरानी वाली दकियानूसी नहीं है. ये धर्म का नया वर्जन है, जिसका सॉफ्टवेयर बिल्कुल अलग है. ये धर्म का Gen-Z स्टाइल है. 

भजन क्लबिंग हो या फिर रीमिक्स मंत्रों का जाप हो, जो ट्रेंड दिख रहा है, वह असल में एक बड़ी मानसिक और सामाजिक बेचैनी का नतीजा है. लेकिन सवाल ये है कि क्या यह सच में शांति की तलाश है या फिर सिर्फ एक सोशल लाइफ का नया ग्लैमराइज्ड तरीका. जेन-ज़ी या यूं कहें कि नई पीढ़ी के लिए अपनी धार्मिक आस्था को दर्शाने के अलग-अलग चरण हैं. कोई श्राइनकेशन (Gen-Z में ये वर्ड पॉपुलर है) करता है, कोई भजन क्लबिंग कर रहा है और कोई सोशल मीडिया पर धार्मिक है. एक-एक करके सारे मसलों को देखते हैं.

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अब कीर्तन नहीं भजन क्लबिंग का ज़माना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कुछ वक्त पहले अपने रेडियो प्रोग्राम 'मन की बात' में इस ट्रेंड का जिक्र करते हुए कहा था कि आज की पीढ़ी भक्ति को अपने अनुभव और जीवनशैली में ढाल रही है. उन्होंने भजन क्लबिंग को खासतौर पर Gen-Z के बीच तेजी से लोकप्रिय बताया. उन्होंने साफ कहा कि इन आयोजनों में संगीत भले ही आधुनिक हो और मंच पर कॉन्सर्ट जैसा तामझाम हो, लेकिन भजन की गरिमा और आध्यात्मिकता का पूरा ध्यान रखा जाता है. उन्होंने आध्यात्म के इस निरंतर प्रवाह की सराहना की है. 

कुछ स्टडी छपी हैं, जो इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण मानती हैं आइडेंटिटी क्राइसिस को. आप देखेंगे कि शहर के कंक्रीट जंगलों में फंसी नई पीढ़ी को कहीं न कहीं लगा कि ग्लोबलाइजेशन की रेस में वे अपनी जड़ों से दूर हो गए. अब यही पीढ़ी अपनी उन जड़ों को वापस तलाश रही है, लेकिन यहां रूल्स और रेगुलेशन सब उनके हिसाब के हैं. यह वो जेनरेशन है जो लकीर की फकीर नहीं है. वे अगर मंदिर जा रहे हैं, तो वहां की वाइब को भी अपनी लाइफस्टाइल का हिस्सा बना रहे हैं.

यह जुनून आप 'बुक माय शो' जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी देख सकते हैं. दिल्ली-एनसीआर समेत देश के प्रमुख शहरों में अब भजन क्लबिंग के इवेंट्स की लंबी लिस्ट है. राघव राजा और अभय पाल जैसे कलाकार अब ऐसे शो कर रहे हैं जहां भजन उसी उत्साह के साथ गाए जा रहे हैं, जैसे किसी रॉक स्टार का कॉन्सर्ट होता है. लोग टिकट्स खरीद रहे हैं, दोस्त के साथ इवेंट्स में जा रहे हैं और घंटों तक भजनों की धुनों पर झूम रहे हैं. यह दिखाता है कि युवाओं को अब वो रश चाहिए जो उन्हें क्लब में मिलता था, लेकिन अब वे उसे आध्यात्मिकता के साथ जोड़ रहे हैं. भले ही ये युवा अपने माता-पिता के कहने पर किसी मंदिर, भजन संध्या या कथा में ना जाए, लेकिन पैसे देकर भजन क्लबिंग में जाने के लिए तैयार है. क्यूंकि मामला पूरा वाइब का है. 

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भजन क्लबिंग की दुनिया में प्राची और राघव, भाई-बहन की जोड़ी एक बड़ा नाम है जो कि 'बैकस्टेज सिबलिंग्स' ग्रुप चलाते हैं. इस जोड़ी के लगातार देश के अलग-अलग हिस्सों में शोज़ हो रहे हैं, जो फुल पैक्ड हैं. इतना ही नहीं हाल ही में जब देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी का बर्थडे सेलिब्रेट किया गया, तब वहां भी इन्हीं दोनों ने भजन क्लबिंग परफॉर्म किया, जिसकी फोटो, वीडियोज़ पूरी दुनिया ने देखी.

भजन क्लबिंग के बढ़ते क्रेज के बारे में बात करते हुए 'बैकस्टेज सिबलिंग्स' के फाउंडर्स, राघव और प्राची बताते हैं कि यह आजकल लोगों का संगीत को एक्सपीरियंस करने का तरीका बदल रहा है. aajtak.in से बात करते हुए दोनों ने भजन क्लबिंग ट्रेंड को समझाया. राघव के मुताबिक, लोग अब सिर्फ दूर से बैठकर शो देखना नहीं चाहते, बल्कि उसमें शामिल होकर एक डीप कनेक्शन महसूस करना चाहते हैं. इसी वजह से भजन क्लबिंग हर सिटी और हर एज ग्रुप के बीच इतना पॉपुलर हो रहा है. प्राची का कहना है कि इसकी ग्रोथ बहुत ऑर्गेनिक है; इसमें स्टूडेंट्स से लेकर वर्किंग प्रोफेशनल्स और बुजुर्ग तक सब साथ आते हैं, जो इसे एक बहुत ही मीनिंगफुल और बड़ा कम्युनिटी एक्सपीरियंस बनाता है. 

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इन इवेंट्स के वाइब को लेकर राघव और प्राची का मानना है कि माहौल बिल्कुल घर के लिविंग रूम जैसा वॉर्म और आरामदायक होता है, पर एनर्जी बहुत हाई रहती है. हाई-प्रोफाइल क्लाइंट्स के लिए परफॉर्म करने के अनुभव पर वे कहते हैं कि म्यूजिक के लिए हर जगह एक जैसी है. चाहे सेटिंग्स कितनी भी फॉर्मल क्यों न हों, म्यूजिक शुरू होते ही लोग सारा फॉर्मेलिटी वाला बंधन भूलकर पूरी तरह से डूब जाते हैं. उनके लिए यह सिर्फ एक परफॉरमेंस नहीं, बल्कि लोगों के चेहरे पर वो खुशी और आपस का जुड़ाव देखना है जो उन्हें बार-बार ऐसा कुछ करने के लिए मोटिवेट करता है. 

राघव और प्राची ने जो ग्रुप 'बैकस्टेज सिबलिंग्स' बनाया है, वो भारत में 'भजन क्लबिंग' को मेनस्ट्रीम में लाने वाला पहला बड़ा फॉर्मेट है. यह पहल छोटे जैम सेशन से शुरू होकर आज एक नेशनल मूवमेंट बन चुकी है, जहां लोग सिर्फ सुनते नहीं, बल्कि साथ मिलकर गाते हैं. इनका मुख्य मकसद ऐसे स्पेस बनाना है जहां लोग संगीत के जरिए ठहरें, महसूस करें और एक-दूसरे से गहरा जुड़ाव कायम कर सकें.
  


भक्ति की ट्रिप

इस पूरे ट्रेंड में 'श्राइनकेशन' भी पॉपुलर है और यही एक बड़ा बदलाव है. आसपास आपने देखा होगा कि आपके ऑफिस के लोग, कॉलेज के दोस्त हर कोई कुछ समय में किसी धार्मिक स्थल होता है, किसी को नीम करोली (कैंची धाम) जाना है, किसी को वैष्णो देवी तो कोई अयोध्या या फिर खाटू श्याम जा रहा है. लग रहा है कि भारत की नई पीढ़ी की वांडरलिस्ट चेंज हो रही है. अब युवा तीर्थयात्रा को केवल एक धार्मिक क्रिया के तौर पर नहीं, बल्कि एक 'वेकेशन' यानी छुट्टी के साथ जोड़कर देख रहे हैं. केदारनाथ, ऋषिकेश या वाराणसी की यात्रा अब उनके लिए केवल मंदिर दर्शन का सफर नहीं, बल्कि एक ऐसी यात्रा है जहां उन्हें शांति, एडवेंचर और सोशल मीडिया पर साझा करने लायक 'एस्थेटिक' कंटेंट भी मिलता है. यह पीढ़ी ऐसी जगहों को चुन रही है जो उनकी आध्यात्मिक प्यास भी बुझाएं और उनकी प्रोफाइल को 'कल्चरली रूटेड' भी दिखाए.

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श्राइनकेशन का यह कॉन्सेप्ट इस पीढ़ी की उस 'एक्सपीरियंशियल' सोच को दर्शाता है, जहां वे धर्म को किताबी या दकियानूसी तरीके से नहीं, बल्कि जीकर देखना चाहते हैं. ये एक तरह का डिजिटल पोर्टफोलियो है, जो हर कोई अपने इंस्टाग्राम, स्नैपचैट अकाउंट में ऐड करना चाहता है. क्यूंकि धार्मिक स्थल पर जाएंगे तो एस्थेटिक रील भी बनेंगी और ट्रिप की ट्रिप भी होगी. धार्मिक स्थलों पर बढ़ती इस भीड़ के पीछे केवल आस्था नहीं है, बल्कि एक गहरी मानसिक शांति की तलाश है, जिसे वे अपनी आधुनिक जीवनशैली के साथ तालमेल बिठाकर हासिल कर रहे हैं. अब भले ही ये एक सोशल मीडिया के लिए दिखावा ही क्यों ना लगे, लेकिन लोग जुड़ तो इससे रहे ही हैं.  

हारे का अब धर्म सहारा

मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट्स भी इस तरफ इशारा करती हैं कि अनिश्चितता के इस दौर में धर्म एक एंकर का काम कर रहा है. आधुनिक कॉर्पोरेट दुनिया की डेडलाइन्स का दबाव और निजी रिश्तों में आता अकेलापन—इन सबके बीच, मंत्र और ध्यान युवाओं के लिए थेरेपी की तरह काम कर रहे हैं. वे थेरेपिस्ट की लंबी अपॉइंटमेंट लेने के बजाय, भजनों के साथ अपनी एंग्जायटी को कंट्रोल करना ज्यादा अफोर्डेबल और कूल समझ रहे हैं.

सोशल मीडिया का रोल इसमें सबसे अहम है. इंस्टाग्राम के एल्गोरिदम ने धर्म को कूल बना दिया है. आप देखेंगे कि कैसे एआई-जेनरेटेड धार्मिक तस्वीरें या फिर मंदिरों के सिनेमैटिक ड्रोन शॉट्स वायरल होते हैं. यह कंटेंट क्रिएशन का एक नया बाजार है. जो ब्रांड्स पहले केवल फिटनेस या लाइफस्टाइल पर ध्यान देते थे, अब वे धार्मिक पर्यटन और माइंडफुलनेस ऐप के जरिए युवाओं तक पहुंच रहे हैं.

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क्या यह ट्रेंड आगे भी चलेगा, बिल्कुल चलेगा. क्योंकि धर्म अब एक पर्सनल ब्रांड बन चुका है. आज का युवा जानता है कि कैसे उसे अपनी आस्था को अपने डिजिटल पोर्टफोलियो में सजाना है. फास्टिंग से लेकर मंत्र जाप तक, सब कुछ उनकी डेली रूटीन का हिस्सा बन गया है. यह धार्मिकता अब केवल मंदिर के गर्भ गृह तक सीमित नहीं है, यह उनकी प्रोफाइल, उनके पहनावे और उनकी बातचीत में है.

यह पीढ़ी धर्म को पुराने ढांचों से आजाद करवा रही है. वे इसे आधुनिकता के खिलाफ नहीं, बल्कि उसके साथ तालमेल बिठाकर जी रहे हैं. यह न तो पूरी तरह खोखला है और न ही पूरी तरह गहरा, यह बस एक नया भारत है, जो अपनी जड़ों और अपनी तकनीक के बीच का बैलेंस बनाना सीख रहा है. वे अपनी शर्तों पर धार्मिक हैं, और शायद यही इस बदलाव की सबसे बड़ी खूबसूरती है.

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