पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की यादों (memoirs) पर आधारित किताब 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' को लेकर विवाद गहरा गया है. रक्षा मंत्रालय ने पिछले एक साल से इस किताब की रिलीज को मंजूरी नहीं दी है, जिसने बाद एक बार फिर से सैन्य अधिकारियों द्वारा किताब लिखने और छपवाने के नियमों पर बहस छेड़ दी है.
बताया जा रहा है कि नरवणे की किताब के प्रकाशित न होने के पीछे 72 साल पुराना कानून- आर्मी रूल्स 1954 और ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.
क्या कहता है कानून
भारत में सैन्य कर्मियों द्वारा किताब लिखने और प्रकाशित करने के नियम सेवा विनियमों और सुरक्षा कानूनों से तय होते हैं.
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता सार्थक चतुर्वेदी के अनुसार, 'सेवारत सेना अधिकारियों के लिए आर्मी रूल्स, 1954 की धारा 21 के तहत जो भी अधिकारी आर्मी एक्ट, 1950 के दायरे में आता है, उसे सेवा मामलों या राजनीतिक मुद्दों पर कुछ भी प्रकाशित करने से पहले सरकार की मंजूरी लेनी होगी. ये नियम इसलिए बनाया गया है, ताकि रक्षा संचालन या आंतरिक कार्यप्रणाली से जुड़ी कोई भी संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक न हो. ये नियम किताबों, लेखों, पत्रों, भाषणों या किसी भी प्रकाशन पर लागू होता है.'
रिटायर्ड ऑफिस पर पाबंदी लगाता है ये नियम?
उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा कि सेवानिवृत्त अधिकारियों पर ये नियम सीधे तौर पर लागू नहीं होता, लेकिन 2021 के पेंशन नियम संशोधन और ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 उन पर भी पाबंदियां लगाता है. इन नियमों के अनुसार, यदि कोई सेवानिवृत्त कर्मचारी अपनी संस्था से जुड़े विषय पर कुछ प्रकाशित करना चाहता है तो उसे पहले आवश्यक अनुमति लेनी होती है. ऐसा न करने पर उनकी पेंशन रोकी जा सकती है. जनरल नरवणे की किताब में उनके कार्यकाल के रणनीतिक फैसलों का जिक्र होने के कारण रक्षा मंत्रालय ने इसे समीक्षा के अधीन रखा है.
भले ही आर्मी रूल्स रिटायरमेंट के बाद लागू न हों, लेकिन मई 2021 में सरकार ने सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) रूल्स, 1972 में एक बड़ा संशोधन किया था.
इसके तहत सुरक्षा या खुफिया संगठनों (जैसे IB और RAW) से जुड़े रिटायर्ड अधिकारियों को अपनी संस्था से संबंधित किसी भी जानकारी को प्रकाशित करने से पहले अनुमति लेना जरूरी है. अगर कोई अधिकारी बिना अनुमति के ऐसा करता है तो उसकी पेंशन रोकी या वापस ली जा सकती है. हालांकि, इसमें स्पष्ट रूप से सेना का नाम नहीं है.
इस संदर्भ में सार्थक कहते हैं कि आर्मी, नेवी और एयरफोर्स के नियमित अधिकारी इस श्रेणी में नहीं आते, इसलिए रिटायरमेंट के बाद उन्हें ऐसी मंजूरी लेना अनिवार्य नहीं होता. फिर भी, कई सेवानिवृत्त अधिकारी सावधानी के तौर पर अपनी किताब, लेख या पत्रों को रक्षा मंत्रालय को भेजते हैं. इसके बाद तीन स्तरों पर उसकी जांच (स्क्रूटनी) होती है- जांच के बाद या तो मंजूरी मिल जाती है या संवेदनशील जानकारी हटाने के निर्देश दिए जाते हैं या फिर अनुमति से इनकार भी किया जा सकता है.
ताउम्र लागू रहता है ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ने बताया कि उधर, पेंशन नियमों और सर्विस रूल्स से अलग ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (OSA), 1923 सरकारी अधिकारियों पर ताउम्र लागू रहता है, चाहे वह सेवारत हो या सेवानिवृत्त हों. ये कानून किसी भी ऐसी गोपनीय जानकारी को सार्वजनिक करना अपराध मानता है, जिससे देश की सुरक्षा को खतरा पैदा हो.
यही वजह है कि जनरल नरवणे जैसे शीर्ष पदों पर रहे अधिकारी अक्सर खुद-ब-खुद से अपनी किताब का ड्राफ्ट रक्षा मंत्रालय (MoD) को भेजते हैं, ताकि अनजाने में किसी कानून का उल्लंघन न हो.
क्या है 2021 की MoD पॉलिसी
वहीं, जून 2021 में रक्षा मंत्रालय ने युद्धों और सैन्य अभियानों के रिकॉर्ड के संरक्षण और प्रकाशन के लिए एक नई नीति को मंजूरी दी थी.
चतुर्वेदी ने बताया कि इस नीति के अनुसार, दस्तावेजों को सामान्यतः 25 साल बाद सार्वजनिक (Declassify) करने पर विचार किया जाता है. पुराने रिकॉर्ड्स को विशेषज्ञों द्वारा जांच के बाद ही नेशनल आर्काइव्स ऑफ इंडिया को सौंपा जाता है.
उन्होंने कहा, 'ये पॉलिसी पब्लिक रिकॉर्ड एक्ट 1993 और पब्लिक रिकॉर्ड रूल्स 1997 के अनुरूप है. हालांकि, व्यक्तिगत संस्मरणों पर ये सीधे लागू नहीं होती, लेकिन संवेदनशील सामग्री होने पर MoD रिव्यू करता है.'
जनरल नरवणे की किताब में हालिया सेना ऑपरेशंस और रणनीतिक फैसलों का जिक्र होने के कारण, मंत्रालय इन मानकों के आधार पर इसकी समीक्षा कर रहा है.
नितिन यादव