विदेशी अदालत के फैसले के बाद भारत में केस चलाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग: दिल्ली HC

दिल्ली हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों को लेकर बड़ा फैसला दिया है. अदालत ने कहा कि अगर किसी विदेशी अदालत ने तलाक और आर्थिक समझौते पर आखिरी फैसला दे दिया है, तो उसी मामले को भारत में नए सिरे से उठाना कानून का दुरुपयोग है.

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तलाक विवाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला (File Photo: ITG) तलाक विवाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला (File Photo: ITG)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 04 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 10:50 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि विदेशी अदालत का फैसला आने के बाद भारत में वही कानूनी प्रक्रिया दोबारा नहीं चलाई जा सकती. कोर्ट ने पाया कि संबंधित महिला ने अमेरिका की अदालत से तलाक की डिक्री और आर्थिक समझौता पहले ही स्वीकार कर लिया था. इसके बावजूद उसने भारत में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत आपराधिक मामला जारी रखा था. 

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कोर्ट ने शख्स, जो पति है और ससुराल पक्ष के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करते हुए इसे नागरिक अधिकारों के तहत मिली कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करार दिया. 

यह फैसला उन मामलों के लिए नजीर बनेगा, जहां विदेश में बसे भारतीय जोड़े विवाद सुलझने के बाद भी भारत में मुकदमेबाजी जारी रखते हैं.

क्या है पूरा मामला?

इस विवाद की शुरुआत जुलाई 2017 में दिल्ली में हुई शादी से हुई थी. शादी के बाद युवती अपने पति के साथ अमेरिका चली गई, लेकिन एक साल के अंदर ही दोनों में अनबन शुरू हो गई. मई 2019 में पति ने अमेरिका की अदालत में तलाक की याचिका दायर की. इसके जवाब में महिला ने अमेरिका में दो बार घरेलू हिंसा की शिकायत की, लेकिन वहां की पुलिस जांच में वह आरोप साबित नहीं कर सकी. 

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इसी दौरान अगस्त 2019 में महिला ने दिल्ली में भी दहेज प्रताड़ना की शिकायत दर्ज करा दी. हालांकि, जनवरी 2020 में अमेरिका में दोनों ने आपसी सहमति से तलाक ले लिया और महिला ने भरण-पोषण के तौर पर करीब 11 लाख रुपये का अंतिम निपटान भी स्वीकार कर लिया.

हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी

कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि वैवाहिक विवाद में संपत्ति समझौता जिंदगी में आगे बढ़ने का इरादा दर्शाता है. जब अमेरिकी कोर्ट में दोनों पक्षों ने सहमति दी थी कि उनके सभी विवाद सुलझ चुके हैं, तो भारत में एफआईआर को बरकरार रखना गलत है. कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि महिला ने विदेशी अदालत की कार्यवाही में स्वेच्छा से भाग लिया और समझौता राशि भी ली. 

तलाक के करीब एक साल बाद भारत में एफआईआर दर्ज कराना और पुराने विवादों को फिर से उठाना न्यायोचित नहीं है. अदालत ने कहा कि जब एक सक्षम विदेशी अदालत आपसी समझौते के आधार पर फैसला सुना चुकी हो, तो भारत में आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रह सकती.
 

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