बांग्लादेश में चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी के अमीर डॉ. शफीकुर रहमान ने भारतीय मीडिया को पहला इंटरव्यू दिया. इंडिया टुडे से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि वे ‘अल्पसंख्यक’ (माइनॉरिटी) शब्द में विश्वास नहीं करते और उनके लिए देश के सभी लोग सिर्फ बांग्लादेशी नागरिक हैं.
डॉ. रहमान ने कहा कि धर्म के आधार पर लोगों को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में बांटना गलत परंपरा है. इससे समाज में विभाजन पैदा होता है और लोग आमने-सामने खड़े हो जाते हैं. उनका कहना है कि उनकी पार्टी सभी नागरिकों को एकजुट और एकीकृत रूप में देखना चाहती है.
हिंदू समुदाय की चिंताओं पर उन्होंने कहा कि पहले ऐसी आशंकाएं रही होंगी, लेकिन अब वे पुराने इतिहास को पीछे छोड़कर साथ मिलकर आगे बढ़ना चाहते हैं. उन्होंने दोहराया कि बांग्लादेश में सिर्फ ‘बांग्लादेशी पहचान’ ही सबसे अहम है.
जमात प्रमुख ने यह भी कहा कि देश के हर नागरिक को बराबर अधिकार और समान सुरक्षा मिलेगी. उन्होंने भरोसा दिलाया कि सभी लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाएगा.
बता दें कि जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश की प्रमुख इस्लामी राजनीतिक पार्टियों में से एक है. 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पार्टी की भूमिका को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है. बीते वर्षों में युद्ध अपराध मामलों में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को सजा भी सुनाई गई. एक दौर में हाई कोर्ट के फैसले के बाद पार्टी का चुनावी पंजीकरण रद्द कर दिया गया था, जिससे उसकी राजनीतिक गतिविधियों पर असर पड़ा.
हाल के वर्षों में जमात ने खुद को 'कानून के दायरे में रहकर लोकतांत्रिक राजनीति' करने वाली पार्टी के रूप में पेश करने की कोशिश की है. चुनाव से पहले दिया गया यह इंटरव्यू भी उसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
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