एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के एक बयान ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है. ओवैसी ने महाराष्ट्र के सोलापुर में कहा था कि उनका सपना है कि एक दिन हिजाब पहनने वाली बेटी इस देश की प्रधानमंत्री बने. उन्होंने पाकिस्तान और भारत के संविधान की तुलना करते हुए कहा कि पाकिस्तान के संविधान में सिर्फ एक धर्म के व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने की बात है, जबकि बाबा साहेब आंबेडकर के संविधान में भारत का कोई भी नागरिक प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मेयर बन सकता है.
ओवैसी के इस बयान पर ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद राशिदी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा, "बुर्का पहनने वाली लड़की प्रधानमंत्री बनेगी या नहीं, यह एक राजनीतिक सवाल है. यह आस्था का मामला नहीं है. बुर्का कोई धार्मिक फर्ज नहीं है, बल्कि यह पर्दे का एक तरीका है और पर्दा हमारे धर्म का हिस्सा है."
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मौलाना राशिदी ने सवाल उठाया कि ओवैसी ने खासतौर पर 'बुर्का' शब्द का इस्तेमाल क्यों किया. उन्होंने कहा, "वह सिर्फ इतना कह सकते थे कि एक मुस्लिम महिला प्रधानमंत्री बनेगी. जानबूझकर 'बुर्का पहनने वाली महिला' कहना विवाद खड़ा करने की कोशिश है. मुझे यह सही नहीं लगता."
इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता और अमेठी से सांसद किशोरी लाल शर्मा ने भी ओवैसी पर निशाना साधा. उन्होंने कहा, "ये लोग बीजेपी के स्पॉन्सर्ड लोग हैं, जो हिंदू-मुस्लिम राजनीति करते हैं. मुस्लिम नेता मुस्लिम समाज के शुभचिंतक नहीं हैं और हिंदू नेता हिंदू समाज के शुभचिंतक नहीं हैं. ये लोग चुनाव से पहले जानबूझकर विवाद खड़ा करते हैं."
किशोरी लाल शर्मा ने आगे कहा कि इस तरह के बयान समाज को बांटने का काम करते हैं और असली मुद्दों से ध्यान भटकाते हैं. उनका आरोप है कि धर्म और पहचान से जुड़े बयान चुनावी फायदे के लिए दिए जा रहे हैं.
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ओवैसी के बयान को लेकर जहां कुछ लोग इसे संविधान की समावेशी भावना से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं आलोचकों का कहना है कि इस तरह के शब्दों का चयन अनावश्यक विवाद पैदा करता है. फिलहाल यह बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है और आने वाले दिनों में इस पर सियासत और तेज होने की संभावना है.
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