एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि यह मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं उत्तराखंड से जुड़े एक गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान दिलाऊं. वहां हाल ही में कुछ ऐसे पोस्ट और बातें सामने आई हैं, जिनमें किसी बॉडी या इलाके में नॉन-हिंदू लोगों के प्रवेश या काम करने पर रोक जैसी बातें कही जा रही हैं.
ओवैसी बोले कि साफ़ कहना चाहता हूं कि यह संविधान के खिलाफ है. यह छुआछूत है और यह समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है. अगर आप इस तरह के विचारों और व्यवहार को कानून मानते रहेंगे, तो सोचिए देश किस दिशा में जाएगा.
जहां तक धर्म से जुड़े रिचुअल्स का सवाल है, यह बिल्कुल साफ है कि हर धर्म के अपने नियम होते हैं और उन्हें उसी धर्म के लोग निभाते हैं. लेकिन अगर आप यह कहें कि किसी इलाके में किसी को आने की इजाज़त नहीं है, तो यह किस आधार पर किया जा रहा है? इसकी संवैधानिक बुनियाद क्या है?
उन्होंने कहा कि तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) जैसे संस्थानों में यह नियम है कि वहां काम करने वाले व्यक्ति को यह लिखकर देना पड़ता है कि वह हिंदू धर्म को मानता है. यह व्यवस्था लंबे समय से चली आ रही है. लेकिन सवाल यह है कि इस सोच को आप देश को कहां तक ले जाकर छोड़ेंगे?
जो लोग इस तरह की बातें कर रहे हैं, उन्हें असली मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए. युवाओं को नौकरी दीजिए. रोजगार दीजिए. लेकिन आप ऐसा नहीं कर रहे हैं.
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ओवैसी बोले - आपके ही उत्तराखंड में एंजेल चकमा को मार दिया गया. उसके बारे में झूठी और गलत बातें फैलाई गईं. वह एक नौजवान बच्चा था, मजदूरी करता था. उसका पिता बीएसएफ में सिपाही है, जो हमारी सरहदों की हिफाज़त कर रहा है. उस बच्चे की हत्या को भी कुछ लोग जायज़ ठहराने की कोशिश कर रहे हैं.
यह नफरत है. सिर्फ इसलिए क्योंकि वह आपकी तरह नहीं दिखता, उसे मार दिया गया. जो लोग इस तरह की फासीवादी सोच रखते हैं, उन्हें लगता है कि सबको उनकी तरह ही रहना चाहिए. मैं पूछना चाहता हूं, तुम हो कौन?
हम सब एक ही देश में पैदा हुए हैं. एक 22 साल का नौजवान अपनी जान से हाथ धो बैठा और लोग चुप हैं. सब भूल गए कि एक इंसान मारा गया. यही सबसे बड़ी चिंता है.
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