AI अभी टूल है, स्टोरी टेलर नहीं: कली पुरी

भारत में प्रेस की आजादी पर एक सवाल का जवाब देते हुए इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस-चेयरपर्सन और एक्जीक्यूटिव एडिटर-इन-चीफ कली पुरी ने कहा कि मीडिया को कठोर वैचारिक ढांचे थोपने के बजाय सांस्कृतिक और सामाजिक वास्तविकताओं के दायरे में काम करना चाहिए.

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दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान 'फ्यूचर ऑफ द फोर्थ एस्टेट' विषय पर पैनल चर्चा में कली पुरी (Photo: ITG) दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान 'फ्यूचर ऑफ द फोर्थ एस्टेट' विषय पर पैनल चर्चा में कली पुरी (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:00 AM IST

सत्ता अब केवल धार्मिक मंचों, संसद या बोर्डरूम से नहीं चलती. अब यह एल्गोरिदम, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जरिए संचालित होती है, जिसने समाज के सोचने, फैसले लेने और विरोध करने के तरीकों को बुनियादी रूप से बदल दिया है. यह बात इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस-चेयरपर्सन और एक्जीक्यूटिव एडिटर-इन-चीफ कली पुरी ने कही.

दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के दौरान 'फ्यूचर ऑफ द फोर्थ एस्टेट (The Future of the Fourth Estate)' विषय पर एक पैनल चर्चा में कली पुरी ने कहा कि पत्रकारिता ऐसे माहौल में काम कर रही है, जो तेजी से मुश्किल होता जा रहा है, जहां टेक्नोलॉजी, बिजनेस और पावर एक साथ मिल गए हैं, जिससे मीडिया को घटते भरोसे, बंटे हुए दर्शकों और बढ़ते कमर्शियल दबाव के बीच 'वॉचडॉग' की अपनी भूमिका का बचाव करना पड़ रहा है.

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उन्होंने कहा, 'पहले प्रथम स्तंभ का अर्थ पादरी या चर्च हुआ करता था, जो समाज के नैतिक ढांचे को तय करते थे. लेकिन आज यह भूमिका बदल चुकी है. आज वह स्थान पादरियों का नहीं है. अब यह सोशल मीडिया और एल्गोरिदम का मेल है और जैसे-जैसे AI का प्रभाव बढ़ेगा, यह और भी अधिक स्पष्ट होता जाएगा.'

'बदल रहा सत्ता का स्वरूप'
कली पुरी ने कहा कि लोकतंत्र के पहले और दूसरे स्तंभों की सीमाओं के बीच परंपरागत रूप से धर्म और सत्ता, उसके बाद व्यापार और कुलीनता के बीच की सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं. अब टेक्नोलॉजी कंपनियां नैरेटिव और बिजनेस दोनों पर असर डाल रही हैं.

उन्होंने कहा, 'पहला और दूसरा स्तंभ अब आपस में घुल-मिल रहे हैं, जबकि चौथे स्तंभ को कहीं अधिक कड़वाहट भरे माहौल में इन दोनों की कमियों को उजागर करने की जिम्मेदारी उठानी पड़ रही है.'

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उन्होंने आगे बताया कि तीसरा स्तंभ- नागरिक भी बदल गए हैं. वे अधिक लेन-देन, अधीर और असुविधा को स्वीकार करने के लिए कम इच्छुक हो गए हैं. भले ही सत्ता को जवाबदेह ठहराने के लिए असुविधा जरूरी हो.

कली पुरी ने कहा कि इस बदलाव ने पत्रकारिता को एक अत्यंत नाजुक और अनिश्चित स्थिति में खड़ा कर दिया है, जहां विश्वसनीयता और वित्तीय स्वतंत्रता के बीच अक्सर सीधा टकराव बना रहता है.

उन्होंने कहा, 'अगर आप केवल पूर्वाग्रहों को ही बढ़ावा देते रहेंगे, तो आप प्रहरी का काम कैसे करेंगे? लेकिन अगर आप दर्शकों की जरूरतों को पूरा नहीं करेंगे, तो आप आर्थिक स्वतंत्रता खो देंगे और सरकार पर निर्भर हो जाएंगे. यह संतुलन बनाने की चुनौती है और मीडिया इसे बखूबी निभा रहा है.'

भारत में आजादी, संदर्भ और न्यूजरूम में बदलाव
भारत में प्रेस की आजादी पर एक सवाल का जवाब देते हुए कली पुरी ने कहा कि मीडिया को कठोर वैचारिक ढांचे थोपने के बजाय सांस्कृतिक और सामाजिक वास्तविकताओं के दायरे में काम करना चाहिए.

उन्होंने कहा, 'हम ऑब्जर्वर हैं. हम इतिहास बनते हुए सबसे अग्रिम पंक्ति से देख रहे हैं. हम हर चीज पर सिर्फ अपनी राय नहीं दे सकते.' उन्होंने यह भी जोड़ा कि ओपिनियन जर्नलिज्म को रिपोर्टिंग के एक बड़े इकोसिस्टम का हिस्सा बना रहना चाहिए.

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इंडिया टुडे ग्रुप में अपने अनुभव से सीखते हुए कली पुरी ने बताया कि भारत में भाषा में बदलावों ने न्यूजरूम के पावर डायनामिक्स को कैसे बदला है.

'विश्वास को दोबारा कायम करना होगा'
मीडिया पर भरोसे में वैश्विक गिरावट को स्वीकार करते हुए कली पुरी ने कहा कि इसे सुधारने की पूरी जिम्मेदारी मीडिया संगठनों पर है. उन्होंने कहा, 'दूसरों को दोष देने के बजाय मीडिया के लोगों को विश्वास को फिर से कायम करने पर काम करना होगा.'

उन्होंने इंडिया टुडे ग्रुप की उन प्रयासों के बारे में बताया, जिनका उद्देश्य असहमति रखने वाले समुदायों के बीच सीधी बातचीत को बढ़ाना है. जिससे पत्रकारों, राजनेताओं और एक्सपर्ट्स को बहस के केंद्र से हटाया जा सके.

उन्होंने रोजगार और परीक्षा प्रक्रियाओं जैसी उन कहानियों पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने की ओर भी इशारा किया जो लोगों के जीवन पर सीधे तौर पर असर डालती हैं.

उन्होंने कहा, 'जब एग्जाम रिजल्ट आते हैं या लगातार रिपोर्टिंग की वजह से नौकरियां खुलती हैं, तो लोग इसका प्रभाव देखते हैं. इससे विश्वास बढ़ता है.'

'AI को टूल की तरह यूज करें, स्टोरी टेलर जैसे नहीं'
कली पुरी ने कहा कि इंडिया टुडे ग्रुप ने सख्त संपादकीय सीमाओं को बनाए रखते हुए AI को अपनाया है. उन्होंने कहा, 'हम कहानियां गढ़ने के लिए एआई का इस्तेमाल नहीं करते. हम इसे एआई सैंडविच कहते हैं. इसकी शुरुआत एक इंसान से होती है, प्रक्रिया में एआई का इस्तेमाल हो सकता है और अंत भी एक इंसान से ही होता है.'

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उन्होंने एआई की मदद से तैयार किए गए मैगजीन कवर, बिना फुटेज वाली घटनाओं के विजुअल रिकंस्ट्रक्शन का जिक्र किया, जहां रिपोर्टर अंतिम संपादकीय कंट्रोल अपने पास रखते हैं.

उन्होंने कहा, 'एआई कहानी कहने की कला का स्थान नहीं ले रहा है. यह एक बुद्धिमान असिस्टेंट है'. साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि एआई ने अब तक मानवीय सुपरविजन की आवश्यकता को कम करने के बजाय बढ़ाया है.

हालांकि, कली पुरी ने चेतावनी दी कि अधिकांश एआई सिस्टम अंग्रेजी भाषा के पश्चिमी डेटासेट पर प्रशिक्षित होते हैं, जिससे भारत जैसे देशों के लिए चुनौतियां पैदा होती हैं.

पैनल चर्चा इस आम सहमति के साथ समाप्त हुई कि पत्रकारिता एक चौराहे पर खड़ी है, जहां भरोसा, तकनीक और दर्शकों के अलग-थलग होने से आधुनिक इतिहास में किसी भी समय की तुलना में चौथे स्तंभ (पत्रकारिता) का स्वरूप तेजी से बदल रहा है.

उन्होंने कहा, 'जैसे-जैसे हिंदी और क्षेत्रीय भाषा की पत्रकारिता केंद्र में आई, कई अंग्रेजी बोलने वाले और अंग्रेजी मीडियम से पढ़े पत्रकारों को लगा कि उनकी पावर कम हो गई है. लेकिन हमारे लिए, क्योंकि हम बाइलिंगुअल थे, इसने एक पूरी कम्युनिटी के लिए रास्ते खोल दिए जो भाषा की वजह से पीछे रह गई थी.'

उन्होंने इस बदलाव को शानदार बताया और कहा कि न्यूजरूम को अथॉरिटी की पारंपरिक जगहों से हटने के लिए तैयार रहना चाहिए.

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