पत्नी के मर्डर केस में आरोपी को आजीवन कारावास, बॉम्बे हाइकोर्ट ने 20 साल की न्यूनतम सजा हटाई

न्यायमूर्ति सरंग वी. कोटवाल और न्यायमूर्ति अद्वैत एम. सेठना की खंडपीठ ने कहा कि बेटे मयूर की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय है, जिसे पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने भी पुष्ट किया. अदालत ने बचाव पक्ष की दलील खारिज कर दी कि यह मामला आईपीसी की धारा 300 की अपवाद 4 (सडन फाइट, हीट ऑफ पैशन) के तहत आता है.

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मृतक महिला की बहन की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया था (Photo: Represetational) मृतक महिला की बहन की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया था (Photo: Represetational)

विद्या

  • मुंबई,
  • 16 सितंबर 2025,
  • अपडेटेड 7:14 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2013 में पत्नी की हत्या के मामले में पुणे निवासी अनिल सीताराम गोसावी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है. हालांकि अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को हटा दिया, जिसमें कहा गया था कि दोषी को रिहाई से पहले कम से कम 20 साल की सजा काटनी होगी.

अभियोजन पक्ष के मुताबिक, अनिल गोसावी अपनी पत्नी प्रतिभा के चरित्र पर शक करता था. 18 जून 2013 को उनका बेटा मयूर स्कूल से घर लौटा और एक बटुआ उठा लिया. इसी बात पर अनिल ने बेटे को पीटना शुरू कर दिया. जब पत्नी प्रतिभा, जो प्राइवेट कंपनी में काम करती थीं, बेटे को बचाने आईं और पति से उसे न पीटने को कहा, तभी अनिल ने कुल्हाड़ी से पत्नी के सिर पर दो वार कर दिए.

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घटना के समय बेटा मयूर (तब पांचवी कक्षा का छात्र) मौजूद था. उसने रिश्तेदारों को फोन किया, लेकिन तब तक प्रतिभा की मौत हो चुकी थी. उसी दिन मृतक महिला की बहन ज्योति ने एफआईआर दर्ज कराई और अनिल को गिरफ्तार कर लिया गया.

गवाहों की गवाही और अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति सरंग वी. कोटवाल और न्यायमूर्ति अद्वैत एम. सेठना की खंडपीठ ने कहा कि बेटे मयूर की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय है, जिसे पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने भी पुष्ट किया.

अदालत ने बचाव पक्ष की दलील खारिज कर दी कि यह मामला आईपीसी की धारा 300 की अपवाद 4 (सडन फाइट, हीट ऑफ पैशन) के तहत आता है. अदालत ने कहा, “यह घटना न तो अचानक झगड़े में हुई, न ही क्षणिक उत्तेजना में. आरोपी ने क्रूर और असामान्य व्यवहार किया. प्रतिभा तो केवल अपने बेटे को बचाने की कोशिश कर रही थीं, इसे पति-पत्नी का झगड़ा नहीं कहा जा सकता.”

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जजों ने यह भी कहा, “आरोपी घर से बाहर निकलकर चिल्ला रहा था कि उसने अपनी पत्नी को मार डाला है और दूसरों को भी मार देगा. ऐसे में यह मामला अपवाद 4 में नहीं आता.”

सजा पर अदालत का फैसला

हाईकोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा, लेकिन ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाई गई 20 साल की न्यूनतम सजा की शर्त हटा दी. अदालत ने कहा, “ट्रायल जज न्यूनतम 20 साल की कैद का प्रतिबंध नहीं लगा सकते थे. दोषी को नियमों के अनुसार मिलने वाली सभी रियायतें और लाभ दिए जाएंगे.”

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