महाराष्ट्र में विधान परिषद यानी MLC के चुनाव आने वाले हैं और इसे लेकर सियासी खेल बहुत दिलचस्प हो गया है. एक तरफ सत्ताधारी महायुति गठबंधन पूरी ताकत से मैदान में उतरा. दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन MVA में कांग्रेस और उद्धव ठाकरे गुट के बीच सीट को लेकर तकरार हो गई. आखिर में कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार वापस ले लिया.
इस बार 9 सीटों के लिए चुनाव है और नामांकन के आखिरी दिन कुल 9 ही उम्मीदवार मैदान में रहे. इसका मतलब है कि सभी 9 उम्मीदवार बिना मुकाबले के जीत सकते हैं. सत्ताधारी महायुति गठबंधन जिसमें BJP, शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार की NCP है, इसने कुल 8 उम्मीदवार उतारे.
BJP ने पांच उम्मीदवार दिए जिनके नाम हैं सुनील कारजतकर, माधवी नाईक, विक्रम कोल्हे, प्रमोद जाठार और संजय भेंडे. BJP की प्रज्ञा सतव एक अलग उपचुनाव सीट से लड़ रही हैं और वो भी बिना मुकाबले जीत सकती हैं.
शिंदे गुट की शिवसेना ने नीलम गोरहे और बच्चू कडू को उतारा. अजित पवार की NCP ने जीशान सिद्दीकी को मैदान में उतारा. विपक्षी MVA गठबंधन की तरफ से सिर्फ एक उम्मीदवार है और वो है उद्धव ठाकरे गुट के अंबादास दनवे.
कांग्रेस और उद्धव गुट में क्या तकरार हुई?
यहीं से असली कहानी शुरू होती है. कांग्रेस ने पहले पूरी ताकत से कहा कि उन्हें भी एक सीट चाहिए. कांग्रेस का कहना था कि अगर उद्धव ठाकरे खुद नहीं लड़ रहे तो यह सीट हमें मिलनी चाहिए. दोनों पार्टियों के बीच काफी तनाव रहा.
लेकिन फिर सुप्रिया सुले और अनिल देसाई जैसे बड़े नेताओं की बातचीत के बाद कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार न उतारने का फैसला किया. नामांकन की आखिरी घड़ी में अंबादास दनवे ने कांग्रेस के समर्थन से पर्चा भरा.
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कांग्रेस ने पीछे क्यों हटी? असली वजह क्या है?
इसे समझने के लिए नंबरों का खेल समझना जरूरी है. MVA गठबंधन में तीन पार्टियां हैं. उद्धव ठाकरे गुट के 20 विधायक हैं. शरद पवार गुट के 10 विधायक हैं. और कांग्रेस के 16 विधायक हैं. कुल मिलाकर 46 विधायक हैं. MLC की एक सीट जीतने के लिए कम से कम 29 वोट चाहिए.
अब अगर कांग्रेस अपना अलग उम्मीदवार उतारती तो क्या होता?
उद्धव गुट के 20 और शरद पवार गुट के 10 मिलाकर 30 वोट हो जाते जो एक सीट जीतने के लिए काफी होते. कांग्रेस के पास 16 विधायक होते जो एक सीट जीतने के लिए 29 से कम हैं. यानी कांग्रेस हार जाती. और इससे भी बड़ा खतरा था क्रॉस वोटिंग का यानी कुछ विधायक अपनी पार्टी की बजाय दूसरे को वोट दे सकते थे जिससे दोनों हार सकते थे. इसलिए कांग्रेस ने एक सीट के लिए जोखिम उठाने की बजाय पीछे हटना सही समझा.
कांग्रेस को इससे क्या फायदा हुआ?
कांग्रेस का यह कदम सिर्फ हार से बचना नहीं था. इसके पीछे एक बड़ी सोच भी थी. पहली बात यह कि गठबंधन में कोई सार्वजनिक दरार नहीं आई और इंडिया एलायंस एकजुट दिखा.
दूसरी बात यह कि कांग्रेस ने एक संदेश दिया कि हमने इस बार झुककर समझदारी दिखाई है इसलिए आगे राज्यसभा और विधानसभा चुनावों में सीट बंटवारे में हमारे साथ भी सही बर्ताव होना चाहिए. यानी यह एक तरह का उधार है जो कांग्रेस ने दिया है और भविष्य में वापस लेने की उम्मीद रखती है.
ऋत्विक भालेकर