महाराष्ट्र में चल रहे निकाय चुनावों के दौरान वोटिंग के बाद मतदाताओं की उंगुली पर लगाई जाने वाली अमिट स्याही के मिटने की शिकायतों ने सियासी पारा गरमा दिया है. कल्याण से एमएनएस (MNS) उम्मीदवार उर्मिला तांबे ने सबसे पहले यह मुद्दा उठाते हुए राज्य चुनाव आयोग (SEC) पर सत्ताधारी दल की मदद करने का गंभीर आरोप लगाया है.
'मुंबई तक' के पत्रकारों द्वारा किए गए फैक्ट चेक में भी यह सामने आया कि एसीटोन (Acetone) का उपयोग करने पर स्याही पूरी तरह गायब हो रही है. बीएमसी कमिश्नर भूषण गगरानी ने भी स्वीकार किया है कि उंगुली पर लगी स्याही आसानी से मिट रही है.
चुनाव आयोग के पीआरओ ने सफाई देते हुए कहा, "स्थानीय निकाय चुनावों में मार्कर पेन का उपयोग साल 2012 से ही किया जा रहा है और यह कोई नई प्रक्रिया नहीं है. इन मार्कर पेन की आपूर्ति सीधे राज्य चुनाव आयोग द्वारा की गई है, जिस पर अब पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं."
फैक्ट चेक में फेल हुई 'अमिट' स्याही
उर्मिला तांबे की शिकायत के बाद जब मीडिया कर्मियों ने इसकी पड़ताल की, तो चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं. प्रयोग के दौरान देखा गया कि जैसे ही उंगुली पर लगे निशान पर एसीटोन लगाया गया, वह स्याही तुरंत मिट गई. एमएनएस उम्मीदवार का आरोप है कि चुनाव आयोग जानबूझकर ऐसी स्याही का उपयोग कर रहा है, जिससे फर्जी वोटिंग के जरिए सत्ता पक्ष को फायदा पहुंचाया जा सके.
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प्रशासन ने मानी खामी...
बीएमसी कमिश्नर भूषण गगरानी ने भी इस बात पर सहमति जताई है कि मार्कर पेन से लगाया गया निशान स्थायी नहीं है और इसे आसानी से साफ किया जा सकता है. हालांकि, चुनाव आयोग के जनसंपर्क अधिकारी (PRO) ने बचाव करते हुए कहा कि स्थानीय निकाय चुनावों की यह पारंपरिक पद्धति है. उन्होंने स्पष्ट किया कि साल 2012 से ही चुनावों में मार्कर पेन का उपयोग हो रहा है और इस बार भी वही किया गया है.
'मैं महाराष्ट्र के लोगों से अपील करता हूं...'
उद्धव ठाकरे ने मतदान केंद्रों पर वोटर्स की उंगुली पर लगी स्याही आसानी से मिटने के आरोपों पर कहा, 'मैं महाराष्ट्र के लोगों से अपील करता हूं कि कृपया अपने मताधिकार का प्रयोग करें. सुबह से मुझे पूरे महाराष्ट्र से फोन आ रहे हैं कि मतदान प्रक्रिया में कई समस्याएं हैं. मतदान के बाद उंगली पर लगी स्याही भी आसानी से हट रही है. इसलिए मुझे लगता है कि राज्य चुनाव आयोग को इसके लिए जवाबदेह होना चाहिए."
उन्होंने आगे कहा कि अगर इस तरह की गलतियां प्रक्रिया में हो रही हैं तो वे वर्षों से क्या कर रहे थे? वे 9 साल बाद बीएमसी चुनाव करा रहे हैं. मुझे लगता है कि उन्हें अपने कार्यालय में प्रतिदिन की गतिविधियों को सार्वजनिक करना चाहिए या राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को उनके कार्यालय में तैनात किया जाना चाहिए.'
अभिजीत करंडे