ग्राउंड रिपोर्ट: मुंबई में LPG संकट और चुनाव की दोहरी मार, मजदूरों के पलायन से कारोबार प्रभावित

मुंबई में एलपीजी संकट और चुनाव के कारण मजदूरों का पलायन बढ़ गया है, जिससे रियल एस्टेट और होटल सेक्टर प्रभावित हो रहे हैं. निर्माण साइट्स पर मजदूरों की संख्या तेजी से घट रही है, जबकि रेस्टोरेंट्स में स्टाफ की कमी देखी जा रही है. कामगारों का कहना है कि महंगाई और गैस की कमी के कारण शहर में रहना मुश्किल हो गया है. इससे कारोबार पर दबाव बढ़ गया है.

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गैस की किल्लत और चुनाव का डर, मुंबई में मजदूरों का पलायन (Photo: ITG) गैस की किल्लत और चुनाव का डर, मुंबई में मजदूरों का पलायन (Photo: ITG)

मुस्तफा शेख

  • मुंबई,
  • 10 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:13 PM IST

मुंबई के बिजनेस सेक्टर पर इस समय एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है. एक तरफ कमर्शियल गैस (LPG) की भारी किल्लत और दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल के चुनावों ने मजदूरों को शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है. आलम यह है कि रियल एस्टेट साइट्स खाली हो रही हैं और रेस्टोरेंट मालिकों को सिलेंडर के लिए तीन गुना ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है.

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आजतक की इस ग्राउंड रिपोर्ट में मुंबई के अलग-अलग इलाकों का जो हाल दिखा, वो वाकई चिंताजनक है. खास तौर पर इसकी सबसे ज्यादा मार निर्माण उद्योग (Real Estate) पर पड़ी है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भायखला के लकड़ावाला गार्डन्स साइट पर इस वक्त पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ है. यहां के हालातों को बयां करते हुए लकड़ावाला ग्रुप के डायरेक्टर आमिर लकड़ावाला ने बताया कि 'मेरी एक साइट पर 20 में से 18 मजदूर काम छोड़कर भाग गए हैं. हैरानी की बात तो ये है कि कुछ मजदूर तो चुनाव के डर और गैस की किल्लत की वजह से इतनी हड़बड़ी में थे कि अपना सामान तक यहीं छोड़ गए.' हालांकि, बिल्डर्स इन मजदूरों को रोकने के लिए मुफ्त खाना और ज्यादा मजदूरी जैसे तमाम लालच दे रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद कामगार यहाँ रुकने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं.

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यहीं काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर मोहम्मद आजाद का कहना है कि लगभग सभी लोग चले गए हैं. बाहर खाना बहुत महंगा हो गया है और अगर हालात नहीं सुधरे, तो वो भी कुछ दिनों में गांव निकल जाएंगे. असल में मजदूरों के पलायन की सबसे बड़ी वजह बुनियादी जरूरतों का महंगा होना है. कंस्ट्रक्शन वर्कर अबुल हसन ने बताया कि उन्हें महज 5 किलो का छोटा गैस सिलेंडर लेने के लिए सुबह 5 बजे से 11 बजे तक लाइन में लगना पड़ता है. हसन के मुताबिक, बाहर का खाना अब पहुंच से बाहर है, इसलिए घर में बनाना ही एकमात्र रास्ता है, लेकिन अब गैस मिलना भी नामुमकिन सा हो गया है.

होटल इंडस्ट्री का हाल भी कुछ ऐसा ही है. गोवंडी में रेस्टोरेंट चलाने वाले महफूज खान के यहां तो रातों-रात 20% कर्मचारी काम छोड़कर गायब हो गए. दरअसल, फ्यूल लॉकडाउन की अफवाहों ने मजदूरों के मन में इतना डर पैदा कर दिया है कि वे रुकने को तैयार नहीं हैं. महफूज ने बताया कि महंगाई का आलम यह है कि जो कमर्शियल सिलेंडर पहले 1800 रुपये का आता था, उसके लिए अब उन्हें 6000 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं. महफूज का कहना है कि खर्चों को संभालने के लिए उन्होंने हार मानकर ग्राहकों के बिल पर 10% का अतिरिक्त शुल्क  भी लगाया है. लेकिन इसके बाद भी कामगार यहां रुकने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं.

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पलायन की इस पूरी कहानी के बीच रेस्टोरेंट में काम करने वाले जावेद खान का दर्द भी साफ छलक आया. उनका कहना है कि चाहे नोटबंदी रही हो, लॉकडाउन का दौर या फिर अब गैस की यह किल्लत, हर बार गाज गरीब मजदूर पर ही गिरती है. जावेद याद करते हुए बताते हैं कि पिछले संकटों के दौरान जो लोग एक बार गांव गए, उनमें से बहुत से लोग कभी वापस नहीं लौटे और अब ठीक वही पुराना डर हर किसी के चेहरे पर फिर से साफ दिखाई दे रहा है.
 

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