मोदी सरकार की पहल के बाद रूस में फंसे 45 भारतीयों को छुड़ाकर वापस देश लाया गया. वहीं विदेश मंत्रालय का कहना है कि जल्द ही करीब 50 और लोगों की रिहाई सुनिश्चित करने के प्रयास जारी हैं. इन भारतीय नागरिकों को रूसी सेना में शामिल किया गया था. ये लोग अपनी मर्जी से यूक्रेन संग युद्ध में रूस की तरफ से लड़ने को सेना में शामिल हुए थे. लेकिन अब वह वापस लौटना चाह रहे हैं. पीएम मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के समक्ष ये मुद्दा उठाया था.
रिहा होने वाले भारतीयों में दक्षिण कश्मीर के अवंतीपोरा जिले के रहना वाला आजाद यूसुफ कुमार भी शामिल है, जिसने युद्धग्रस्त क्षेत्र में कड़ी मेहनत की और फ्रंटलाइन युद्ध प्रशिक्षण के दौरान गोली लगने से गंभीर घायल हो गया. मोदी सरकार की पहल के बाद वह वापस लौट आया है और इस बात से बेहद खुश है कि वह लगभग दो साल बाद अपने परिवार से फिर से मिल पाएगा.
पीटीआई के मुताबिक आजाद ने याद करते हुए बताया कि रूसी कमांडर ने टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में कुछ नाम पढ़े और फिर हमसे कहा भारतीय वापस जाओ. वह सिर्फ इतनी ही अंग्रेज़ी जानता था. हमें यकीन ही नहीं हुआ कि वह वास्तव में हमारी आज़ादी के बारे में बात कर रहा था. रूसी अधिकारी ने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच एक बैठक का जिक्र किया, जिसमें कहा गया कि इससे उनकी यात्रा की स्थिति प्रभावित हुई है.
आज़ाद ने कहा, "उसने कुछ ऐसा कहा कि राष्ट्रपति पुतिन ने मोदी से मुलाकात की और अब आपका अनुबंध रद्द हो रहा है. प्रधानमंत्री के प्रति अपनी गहरी प्रशंसा व्यक्त करते हुए उसने कहा, "मुझे लगता है कि यह पीएम मोदी की रूस यात्रा थी जिसने मुझे सुरक्षित घर पहुंचने में मदद की. इस दौरान मेरी पत्नी ने पहले ही हमारे बेटे को जन्म दे दिया."
आजाद ने बताया कि दो साल से भी ज़्यादा समय पहले मुझे यूट्यूब चैनल "बाबा व्लॉग्स" मिला, जिसे कथित तौर पर मुंबई निवासी फैसल खान चलाता है. इस चैनल पर रूस में सुरक्षा सहायक के तौर पर नौकरी का वादा किया गया था. शुरुआती वेतन 40,000 से 50,000 रुपये के बीच था और संभावित रूप से 1 लाख रुपये तक बढ़ सकता था. सफलता की कहानियों से आश्वस्त होकर, मैंने इस पद के लिए आवेदन किया और यात्रा और प्रोसेसिंग शुल्क के रूप में 1.3 लाख रुपये की भारी राशि का भुगतान किया. वह 14 दिसंबर, 2022 को अपने पोशवान गांव से मुंबई के लिए निकला, जहां उसकी मुलाकात गुजरात के एक नौकरी चाहने वाले से हुई.
उसने बताया कि इसके बाद दोनों को चेन्नई भेज दिया गया. 19 दिसंबर को वे मॉस्को के डोमोडेडोवो एयरपोर्ट पर पहुंचे, जहां उनकी स्थिति की वास्तविकता ने उन्हें अंदर तक झकझोर कर रख दिया. उन्हें रूसी सेना को सौंप दिया गया. इससे मुझे घबराहट भी हुई. उन्होंने हमसे रूसी भाषा में एक अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाए और हम बस मदद के लिए गुहार लगा सकते थे.
हमें जल्द ही फ्रंटलाइन युद्ध प्रशिक्षण के लिए रूसी-यूक्रेनी सीमा पर ले जाया गया.
आजाद ने बताया कि छह अन्य भारतीय रंगरूटों के साथ, मुझे अकल्पनीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. हम भाषा नहीं बोल सकते थे और मदद के लिए कोई नहीं था. अपने प्रशिक्षण के कुछ ही दिनों बाद मेरे पैर में गोली लग गई और मुझे 18 दिन अस्पताल में बिताने पड़े. यह एक प्रलय की तरह था. मुझे बंदूक चलाना नहीं आता था और इसी वजह से मैं घायल हो गया.
मैंने गुजरात के अपने करीबी दोस्त सहित कुछ साथी भारतीय रंगरूटों की मौत भी देखी. गोली लगने के बाद अस्पताल ले जाते समय, मेरी आंखें बंद हो रही थीं. लेकिन मेरे साथ मौजूद डॉक्टर ने मुझे थप्पड़ मारा और कहा कि मैं अपनी आंखें बंद न करूं. मेरा बहुत खून बह गया था.
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