हिमाचल प्रदेश के मंडी की पहाड़ियों के बीच बसी रिवालसर झील इन दिनों सिर्फ टूरिस्ट प्लेस नहीं, बल्कि आस्था, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बनी हुई है. सर्द हवाओं के बीच झील के जल में उठतीं तरंगें, किनारों पर जलते हवन कुंड, मंत्रों की गूंज और रंग-बिरंगे प्रार्थना ध्वज... यह दृश्य आध्यात्मिक कथा जैसा लगता है. यहां दूर-दराज के पहाड़ी और जनजातीय इलाकों से आए बौद्ध श्रद्धालु मोक्ष और मन की शांति की तलाश में साधना में लीन हैं.
हर साल सर्दियों की शुरुआत के साथ ही किन्नौर, लाहौल-स्पीति, लेह-लद्दाख, अरुणाचल और नॉर्थ ईस्ट के कई इलाकों से बौद्ध अनुयायी रिवालसर पहुंचते हैं. इस बार भी पिछले एक महीने से यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है. झील के किनारे छोटे-छोटे समूहों में बैठे लोग माला जपते, मंत्र पढ़ते और हवन करते दिखाई देते हैं. किसी के हाथ में प्रार्थना चक्र है, तो कोई ध्यान में आंखें बंद किए घंटों बैठा है.
स्थानीय लोग बताते हैं कि सुबह का समय यहां सबसे ज्यादा खास होता है. सूरज की पहली किरण जब झील पर पड़ती है, उसी समय मंत्र जाप की ध्वनि वातावरण में गूंजने लगती है. ढोल, घंटी और शंख की ध्वनि के साथ सामूहिक प्रार्थनाएं होती हैं. श्रद्धालु मानते हैं कि इस पवित्र स्थल पर किया गया जाप और साधना वर्तमान जीवन के कष्ट कम करता है और अगले जन्म का मार्ग भी सुखद बनाता है.
लेह-लद्दाख के झांस्कर क्षेत्र से आए नोडबू टशी बताते हैं कि रिवालसर उनके लिए सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आत्मिक ऊर्जा का स्रोत है. वे कहते हैं कि यहां बैठकर मंत्र जाप करने से मन स्थिर होता है और जीवन की उलझनें हल्की लगने लगती हैं. उनका उद्देश्य बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना और लोगों को शांति का संदेश देना भी है. उनके अनुसार, यहां की साधना मन को भीतर से बदल देती है.
किन्नौर से आईं 75 वर्षीय ओपाल जंगमो की कहानी भी कम प्रेरक नहीं. वे बताती हैं कि जब वे 19 साल की थीं, तभी पहली बार रिवालसर आई थीं. तब से यह सिलसिला नहीं टूटा. हर साल सर्दियों में वे यहां आकर झील किनारे मंत्र जाप करती हैं. उनका विश्वास है कि इससे पापों का क्षय होता है और मोक्ष का मार्ग खुलता है. वे कहती हैं, यहां आना भगवान के और करीब आने जैसा है.
रिवालसर को बौद्ध धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है, क्योंकि मान्यता है कि गुरु पद्मसंभव (रिनपोछे) ने यहां वर्षों तक तपस्या की थी. झील के पास उनकी विशाल प्रतिमा स्थापित है. श्रद्धालु वहां दीप जलाते हैं, प्रार्थना करते हैं और आशीर्वाद मांगते हैं. कई लोग परिक्रमा भी करते हैं.
रिवालसर की खासियत सिर्फ बौद्ध परंपरा तक सीमित नहीं. इसे तीन धर्मों- हिंदू, सिख और बौद्ध की संगम स्थली भी कहा जाता है. यहां हिंदुओं के ऋषि लोमश, सिखों के गुरु गोबिंद सिंह और बौद्ध गुरु पद्मसंभव से जुड़ी मान्यताएं हैं. यही कारण है कि यहां साल भर अलग-अलग धर्मों के आयोजन होते रहते हैं और आपसी भाईचारे की अनूठी मिसाल देखने को मिलती है.
इन दिनों चल रहा मंत्र जाप और हवन का यह क्रम छेश्चू मेले तक जारी रहेगा, जो फरवरी या मार्च में मनाया जाता है. तब तक श्रद्धालु यहीं डेरा डाले रहेंगे- कठोर सर्दी, सीमित सुविधाएं और लंबी साधना... सब कुछ श्रद्धा के आगे छोटा लगता है. शाम ढलते ही झील के चारों ओर दीपों की रोशनी जगमगाने लगती है.
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