नहर विवाद पर पंजाब-हरियाणा की बैठक, केंद्रीय मंत्री की मौजूदगी में चर्चा

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने सतलुज यमुना लिंक नहर के मुद्दे को लेकर हरियाणा और पंजाब के मुख्यमंत्रियों को बातचीत कर मामले को सुलझाने को कहा था.

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पंजाब पंजाब

मनजीत सहगल

  • चंडीगढ़,
  • 18 अगस्त 2020,
  • अपडेटेड 3:39 PM IST

  • सतलुज यमुना लिंक नहर विवाद पर होगी चर्चा
  • केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की मौजूदगी में मीटिंग

हरियाणा और पंजाब के बीच मंगलवार सतलुज यमुना लिंक नहर यानी एसवाईएल मुद्दे पर बैठक होने वाली है. इस बैठक में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल और पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह में बातचीत होगी. इस दौरान केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भी वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये बैठक में मौजूद रहेंगे.

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पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को लेकर हरियाणा और पंजाब के मुख्यमंत्रियों को बातचीत कर मामले को सुलझाने को कहा था. वहीं इसमें मध्यस्थता करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कहा था. सुप्रीम कोर्ट ने बातचीत के लिए 3 सप्ताह का समय दिया था. दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री मंगलवार को बातचीत करेंगे. फिर बातचीत की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में रखी जाएगी.

44 साल पुराने सवाईएल मुद्दे पर फिर से हरियाणा और पंजाब में चर्चा होने जा रही है. एसवाईएल नहर के पानी के बंटवारे के मुद्दे पर हरियाणा और पंजाब में लंबे समय से विवाद चल रहा है. 28 जुलाई 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री आपस में बैठक बातचीत से मसले को सुलझा लें.

क्या है सतलुज यमुना लिंक नहर विवाद

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यह विवाद करीब 44 साल पुराना है. 24 मार्च 1976 को केंद्र सरकार ने पंजाब के 7.2 एमएएफ यानी मिलियन एकड़ फीट पानी में से 3.5 एमएएफ हिस्सा हरियाणा को देने की अधिसूचना जारी की थी. पूर्वी पीएम इंदिरा गांधी ने 8 अप्रैल, 1982 को पंजाब के पटियाला जिले के कपूरई गांव में इस योजना का उद्घाटन किया था. 24 जुलाई, 1985 को राजीव-लोंगोवाल समझौते को लागू किया गया था और पंजाब ने नहर के निर्माण के लिए अपनी सहमति दी थी. लेकिन समझौता के जमीन पर लागू नहीं होने के बाद हरियाणा ने 1996 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था.

सुप्रीम कोर्ट ने 15 जनवरी, 2002 को याचिका पर सुनवाई करते हुए पंजाब को एक साल के भीतर एसवाईएल नहर के निर्माण का निर्देश दिया था. दिलचस्प बात यह है कि 2004 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने सभी जल समझौतों को रद्द करने के लिए पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट एक्ट 2004 पारित कर दिया था.

हरियाणा सरकार ने 20 अक्टूबर, 2015 को शीर्ष कोर्ट से एक संवैधानिक पीठ गठित करने का अनुरोध किया, जिसने 26 नवंबर, 2016 को हरियाणा के पक्ष में अपना फैसला सुनाया. इसके बाद पंजाब ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और अपील दायर की. मामला अभी भी शीर्ष अदालत में लंबित है.

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असल में, पंजाब के राजनेता पड़ोसी राज्य हरियाणा के साथ पानी साझा करने के पक्ष में नहीं हैं. पंजाब द्वारा नहर के लिए अधिग्रहित किए गए संबंधित किसानों को भूमि वापस करने के लिए एक विधेयक पारित करने के बाद स्थिति और अधिक जटिल हो गई है. नहर को भी मिट्टी से भर दिया गया है जो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ था.

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