गुजरात में 33 साल बाद टाइगर रिटर्न्स: फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को दी जा रही स्पेशल ट्रेनिंग

गुजरात में तीन दशक से अधिक समय बाद टाइगर के स्थायी रूप से लौटने की तैयारी है. मादा टाइगर को भी इस एरिया में लाने की योजना पर विचार किया जा रहा है. पंचमहल के जंगलों में टाइगर की मौजूदगी के संकेत मिलने के बाद फॉरेस्ट डिपार्टमेंट ने उसकी सुरक्षा और निगरानी के लिए स्पेशल ट्रेनिंग शुरू की है.

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पंचमहल जिले में इको-टूरिज्म सेंटर में चल रही है वर्कशॉप. (Photo: Screengrab) पंचमहल जिले में इको-टूरिज्म सेंटर में चल रही है वर्कशॉप. (Photo: Screengrab)

aajtak.in

  • पंचमहल,
  • 19 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 3:56 PM IST

गुजरात से वन्यजीव संरक्षण को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है. राज्य में करीब 33 साल बाद टाइगर की स्थायी रूप से वापसी की तैयारी है. इसी को ध्यान में रखते हुए फॉरेस्ट डिपार्टमेंट ने पंचमहल के जांबुघोडा के पास स्थित धनपुरी इको-टूरिज्म सेंटर में ट्रेनिंग शुरू की है. तीन दिनों की वर्कशॉप का मकसद टाइगर की देखभाल, उसकी निगरानी और उसके संरक्षण से जुड़े आधुनिक तरीकों को फील्ड स्टाफ तक पहुंचाना है.

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वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि यह कदम राज्य में वन्यजीव संरक्षण के लिए अहम साबित हो सकता है. दाहोद जिले के बारीया क्षेत्र के पास स्थित रतन महाल के जंगलों में पिछले एक साल से टाइगर की मौजूदगी दर्ज की जा रही है. विशेषज्ञों के अनुसार, यह बाघ अब गुजरात के पर्यावरण और जलवायु के साथ पूरी तरह अनुकूल हो चुका है. इसी वजह से यह संभावना मजबूत हो गई है कि आने वाले समय में बाघ यहां स्थायी रूप से रह सकता है.

इस ट्रेनिंग में भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India) और नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी के विशेषज्ञों की टीम शामिल है. यह टीम गुजरात वन विभाग के अधिकारियों और फील्ड कर्मचारियों को बाघ की ट्रैकिंग, व्यवहार, स्वास्थ्य और संरक्षण तकनीकों की जानकारी दे रही है.

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ट्रेनिंग के दौरान कर्मचारियों को बाघ के पदचिह्न पहचानने, उसके व्यवहार को समझने और जंगल में उसकी गतिविधियों पर नजर रखने के आधुनिक तरीकों के बारे में बताया जा रहा है. इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि अगर परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो भविष्य में मादा टाइगर को भी यहां लाया जा सकता है, जिससे बाघों की संख्या बढ़ सकती है.

इस ट्रेनिंग में पंचमहल के अलावा दाहोद और छोटा उदेपुर जिलों के वन अधिकारी और फील्ड स्टाफ भी शामिल हैं. उन्हें जंगल में काम करने की प्रैक्टिकल ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत और सही फैसला लिया जा सके.

वन संरक्षक निशा राज ने कहा कि यह पहल गुजरात के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में महत्वपूर्ण है. उनका कहना है कि बाघ की मौजूदगी जंगल के पारिस्थितिक संतुलन के लिए जरूरी है. इसके लिए तैयारियां की जा रही हैं. वन विभाग का मानना है कि अगर यह प्रयास सफल होता है, तो गुजरात फिर से उन राज्यों में शामिल हो जाएगा, जहां बाघ स्थायी रूप से हैं.

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(रिपोर्ट: जयेंद्रकुमार बलवंतभाई)

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