चमक नहीं, किताबों की ताकत... विश्व पुस्तक मेले में 'किताब वाली आंटी' ने सबका खींचा ध्यान, उनकी कहानी है अनोखी

नई दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में संजना तिवारी का छोटा सा स्टॉल लोगों का ध्यान खींच रहा है. उन्हें मंडी हाउस में ‘किताब वाली आंटी’ कहा जाता है. 25 साल से वे हिंदी साहित्य को आगे बढ़ा रही हैं. संजना सिर्फ किताबें नहीं बेचतीं, बल्कि सोच और अनुभव साझा करती हैं. उनका बेटा डॉक्टर है, बेटी पीएचडी कर रही है और दामाद आईपीएस अधिकारी हैं.

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 किताब वाली आंटी का 25 साल का सफर.(Photo: Screengrab)  किताब वाली आंटी का 25 साल का सफर.(Photo: Screengrab)

मनीष चौरसिया

  • नई दिल्ली,
  • 15 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 7:18 PM IST

नई दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में बड़े-बड़े प्रकाशकों और चमकदार स्टॉल्स के बीच एक छोटा सा स्टॉल लोगों का ध्यान अपनी सादगी से खींच रहा है. यह स्टॉल किसी नामी ब्रांड का नहीं, बल्कि उस महिला का है, जिसने किताबों को ही अपना जीवन बना लिया है. उनका नाम है संजना तिवारी, जिन्हें दिल्ली के मंडी हाउस इलाके में लोग प्यार से ‘किताब वाली आंटी’ कहते हैं.

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विश्व पुस्तक मेले में जहां लोग भारी-भरकम किताबों और ऑफर्स की ओर आकर्षित हो रहे हैं, वहीं संजना तिवारी का यह सादा सा स्टॉल अलग पहचान बना रहा है. यहां आने वाले पाठक सिर्फ किताबें नहीं, बल्कि वर्षों का अनुभव और आत्मीयता भी महसूस करते हैं.

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मंडी हाउस से विश्व पुस्तक मेले तक का सफर

पिछले करीब ढाई दशक से संजना तिवारी दिल्ली के मंडी हाउस में एक पेड़ के नीचे हिंदी साहित्य की दुकान सजाती आ रही हैं. थिएटर कलाकारों, कवियों और लेखकों के बीच उनका यह ठिकाना साहित्य का जाना-पहचाना केंद्र बन चुका है. आज वही संजना तिवारी विश्व पुस्तक मेले में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं.

संजना मूल रूप से बिहार के सीवान जिले की रहने वाली हैं. शादी के वक्त वे केवल हाईस्कूल पास थीं. उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि आगे चलकर वे पढ़ाई जारी रखेंगी और मास्टर्स तक का सफर तय करेंगी. उनकी पढ़ाई और जीवन का यह सफर अपने आप में प्रेरणादायक रहा है.

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संपन्न परिवार, फिर भी किताबों से जुड़ाव

संजना तिवारी का परिवार आर्थिक रूप से संपन्न है. उनके पति रिटायर्ड पत्रकार और लेखक हैं. बेटा डॉक्टर है, बेटी पीएचडी कर रही है और दामाद आईपीएस अधिकारी हैं. इसके बावजूद संजना आज भी खुद अपनी किताबों की दुकान संभालती हैं.

वे मानती हैं कि यह काम उनके लिए किसी मजबूरी का नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष का जरिया है. उनके लिए किताबें केवल व्यापार नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा हैं.

किताबों से बना परिवार और सोच का रिश्ता

संजना तिवारी कहती हैं कि उनका परिवार सिर्फ घर तक सीमित नहीं है. मंडी हाउस के थिएटर कलाकार, लेखक, कवि और पाठक सभी उनके अपने हैं. कई ऐसे युवा, जो कभी उनकी दुकान से किताबें खरीदा करते थे, आज आईएएस और आईपीएस अधिकारी बन चुके हैं और आज भी उनसे आशीर्वाद लेने आते हैं.

संजना सिर्फ किताबें नहीं बेचतीं, बल्कि सोच बेचती हैं. उनका मानना है कि साहित्य समाज को बेहतर बनाता है और नई पीढ़ी को किताबों से जोड़ना ही उनका सबसे बड़ा सपना है.

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