टूलकिट केस: शांतनु मुलुक को कोर्ट से राहत, 9 मार्च तक बढ़ाई गई अग्रिम जमानत

टूलकिट मामले में आरोपी शांतनु मुलुक को पटियाला हाउस कोर्ट से राहत मिली है. कोर्ट ने शांतनु की अग्रिम जमानत को 9 मार्च तक बढ़ा दिया है, यानी 9 मार्च तक दिल्ली पुलिस शांतनु को गिरफ्तार नहीं कर सकती है.

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शांतनु मुलुक (फाइल फोटो) शांतनु मुलुक (फाइल फोटो)

पूनम शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 25 फरवरी 2021,
  • अपडेटेड 10:57 AM IST
  • पटियाला हाउस कोर्ट का फैसला
  • 9 मार्च को होगी अगली सुनवाई

टूलकिट मामले में आरोपी शांतनु मुलुक को पटियाला हाउस कोर्ट से राहत मिली है. कोर्ट ने शांतनु की अग्रिम जमानत को 9 मार्च तक बढ़ा दिया है, यानी 9 मार्च तक दिल्ली पुलिस शांतनु को गिरफ्तार नहीं कर सकती है. इससे पहले बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने शांतनु मुलुक को अग्रिम जमानत दी थी.

पटियाला हाउस कोर्ट में आज सुनवाई के दौरान आरोपी शांतनु मुलुक के वकील ने कहा कि हमे दिल्ली पुलिस का जवाब मिला नहीं है, हमें 7 दिन का और अतिरिक्त समय चाहिए. इस पर दिल्ली पुलिस ने कोर्ट से कहा कि जांच अभी भी लगातार चल रही है, हम लगातार आरोपी शांतनु से पूछताछ कर रहे हैं और डिटेल में आपको सबकुछ फाइल करना चाहते हैं.

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इस पर शांतनु मुलुक के वकील ने कहा कि जब भी पुलिस की ओर से शांतनु को पूछताछ के लिए बुलाया जाता है, वो हाजिर होते हैं, सुबह 10 बजे से जबतक वो पूछताछ करना चाहते हैं, वो पूछताछ करते हैं, ऐसे में हमें इस मामले में 7 दिन का अतिरिक्त समय चाहिए. दलील सुनने के बाद कोर्ट ने शांतनु की अग्रिम जमानत की अवधि 9 मार्च तक बढ़ा दी. 

गौरतलब है कि 16 फरवरी को शांतनु मुलुक को 10 दिन के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट की तरफ से अग्रिम जमानत दी गई थी. यह अवधि 26 फरवरी को खत्म हो रही है. ऐसे में शांतनु ने दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए अर्जी दाखिल की थी. इस पर कोर्ट ने पुलिस से जवाब मांगा था, लेकिन पुलिस शांतनु के वकील को जवाब नहीं दे पाई.

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इससे पहले दिशा रवि को कोर्ट ने जमानत दे दी थी. इस दौरान कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी भी की थी. पुलिस ने देश के खिलाफ साजिश रचने जैसे दावों को सही साबित करने के लिए तमाम दलीलें रखीं लेकिन वो काम नहीं आईं. कोर्ट ने सारी दलीलें खारिज करते हुए कहा था कि इन रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है कि जिससे लगे कि दिशा अलगाववादी विचार रख रही थीं.

जज धर्मेंद्र राणा ने जमानत देने वाले फैसले में कहा था, 'देशद्रोह का मामला सिर्फ सरकार के टूटे गुरूर पर मरहम लगाने के लिए नहीं थोप सकते, किसी लोकतांत्रिक देश में नागरिक सरकार को राह दिखाते हैं, उनको इसलिए जेल में नहीं डाल सकते कि वो सरकार की नीतियों से असहमत हैं. विचारों में मतभेद और असहमति, सरकार की नीतियों में निष्पक्षता लाते हैं और जागरूक नागरिक हां में हां मिलाने वाले लोगों के मुकाबले समृद्ध लोकतंत्र की पहचान है.'

 

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