'एसिड अटैक पीड़ितों को मिले नौकरी या गुजारा भत्ता', SC ने दिया पॉलिसी बनाने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास को लेकर केंद्र और राज्यों को निर्देश दिए हैं कि वे पीड़ितों को सरकारी नौकरी देने के लिए नीति बनाएं. यदि रोजगार देना संभव न हो तो उनके लिए जीवन निर्वाह भत्ता की व्यवस्था की जाए.

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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को एसिड अटैक पीड़ितों के​ लिए पुनर्वास नीति बनाने के निर्देश दिए. (File photo: ITG) सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को एसिड अटैक पीड़ितों के​ लिए पुनर्वास नीति बनाने के निर्देश दिए. (File photo: ITG)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 09 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 5:28 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास को लेकर केंद्र और राज्यों को अहम निर्देश दिए हैं. अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा है कि वे तेजाब हमले के पीड़ितों को सरकारी नौकरी देने के लिए स्पष्ट नीति तैयार करें. अगर किसी कारणवश उन्हें सरकारी रोजगार देना संभव नहीं है, तो उनके लिए जीवन निर्वाह भत्ता या गुजारा भत्ता (Subsistence Allowance) देने की योजना बनाई जाए.

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यह निर्देश मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान दिए. पीठ ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से यह भी पूछा कि सरकारी विभागों और एजेंसियों में नौकरियों के माध्यम से एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास के लिए अब तक कोई ठोस योजना क्यों नहीं बनाई गई. अदालत ने सरकारों से इस संबंध में जवाब दाखिल करने को कहा है.

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यदि किसी राज्य को एसिड अटैक पीड़ितों को सरकारी नौकरी देने में लॉजिस्टिक समस्याएं आती हैं, तो कम से कम उनके लिए निर्वाह भत्ता देने की नीति तो बनाई ही जा सकती है, ताकि पीड़ितों को आर्थिक सहारा मिल सके. मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता शाहीन मलिक ने अदालत से अनुरोध किया कि वह अपनी पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा के माध्यम से कराना चाहती हैं.

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अदालत ने सिद्धार्थ लूथरा से इस मामले को Pro Bono यानी निःशुल्क आधार पर लेने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने स्वीकार किया. पीड़िता ने इस संवेदनशील मामले में समयबद्ध सुनवाई की भी मांग की. अदालत को बताया गया कि एसिड अटैक पीड़िताओं को बैंक खाता खोलने, आधार कार्ड बनवाने, संपत्ति की रजिस्ट्री कराने या मोबाइल सिम कार्ड लेने जैसी प्रक्रियाओं में गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

डिजिटल केवाईसी प्रक्रिया में पलकें झपकाने या उंगलियों के निशान देने जैसी बायोमेट्रिक प्रक्रियाएं कई बार उनके लिए संभव नहीं होतीं. इस पर पीड़िताओं ने अदालत से अनुरोध किया कि केंद्र सरकार को निर्देश दिए जाएं कि डिजिटल केवाईसी के लिए समावेशी और वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जाए. अदालत ने कहा कि सरकार का जवाब आने के बाद मामले की आगे सुनवाई की जाएगी.

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