सड़क पर रहने वाले बच्चे निकालते हैं अखबार, चार राज्यों तक फैला नेटवर्क

इस अखबार की खास बात यह है की इसके रिपोर्टर कोई खास बच्चे नहीं, बल्कि सड़कों पर काम करने वाले बच्चे हैं. ये वो बच्चे हैं जिनके मां-बाप मजदूरी करके अपना घर चलाते हैं.

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बालकनामा से 10,000 बच्चे जुड़े बालकनामा से 10,000 बच्चे जुड़े

लव रघुवंशी

  • नई दिल्ली,
  • 06 जुलाई 2016,
  • अपडेटेड 7:26 AM IST

आपने कभी नहीं सुना होगा की बच्चे अपना खुद का अखबार भी चलाते हों? मगर दिल्ली में कुछ बच्चे खुद रिपोर्टिंग कर अपना खुद का अखबार चलाते हैं. दिल्ली क गौतम नगर में कुछ बच्चे अपना खुद का अखबार चलाते है. इस अखबार का नाम 'बालकनामा' है. बालकनामा अखबार पूरी तरह बच्चों के लिए ही है. इसकी शुरुआत सन 2003 में हुई थी.

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अखबार की कीमत 2 रुपये
इस अखबार की खास बात यह है की इसके रिपोर्टर कोई खास बच्चे नहीं, बल्कि सड़कों पर काम करने वाले बच्चे हैं. ये वो बच्चे हैं जिनके मां-बाप मजदूरी करके अपना घर चलाते हैं. और ये बच्चे भी मजदूरी करके अपने मां-बाप का हाथ बंटाते थे. मगर अब ये बच्चे रिपोर्टर है. 8 पेज के इस अखबार की कीमत महज दो रुपये हैं. इसकी खास बात ये है की इसमें जिस भी रिपोर्टर की ऊम्र 18 साल से ज्यादा होती है, वो अखबार का सलाहकार बन जाता है.

बच्चों पर हो रहे जुर्म की खबर छापते हैं
इनमें से कोई साउथ दिल्ली रिपोर्टिंग के लिए जाता है, तो कोई नॉर्थ दिल्ली. महीने भर की मेहनत के बाद अखबार की 8000 प्रतियां छापी जाती हैं, जो कि दिल्ली के कई अलग-अलग इलाकों में बांटी जाती हैं. ये बच्चे अपना ग्रुप बनाकर निकल पड़ते हैं अपना अखबार बांटने. कभी किसी होटल में तो कभी किसी पार्क में. कोई इस अखबार के बारे में नहीं जानता हैं, तो ये बच्चे खुद ही अपने अखबार के बारे में बतलाते है. अगर कोई नहीं खरीदना चाहता तो ये बच्चे उन्हें मुफ्त में भी अपना अखबार दे देते है. ये सोचकर की शायद वो कभी तो खरीदेंगे. और ऐसे ही बच्चे दिन रात मेहनत कर अपने अखबार में बच्चों पर हो रहे जुर्म को छापते है. जिसका काफी बार असर भी होता है. वैसे तो इस अखबार को पूरी तरह बच्चे ही चलाते हैं, मगर इस अखबार को छापने के लिए चेतना नाम का एनजीओ इनकी मदद करता है.

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10 हजार बच्चे जुड़े
आज बालकनाम का नेटवर्क देश के चार राज्यों में फैला हुआ है. मध्य प्रदेश, बिहार, यूपी और हरियाणा में आज बालकनामा से 10,000 बच्चे जुड़े हुए हैं. जो बच्चे लिख नहीं सकते वो अपनी खबर बोल कर बतलाते हैं. उन्हें बातूनी रिपोर्टर कहते हैं. खबरों को लिखने के लिये एडिटर भी हैं जो की कंप्यूटर पर खबरें लिखते हैं. आज भले ही इन बच्चों के अखबार को लोग जानते नहीं हैं, मगर ये बच्चे पूरी लगन और मेहनत के साथ काम करते हैं और बच्चों पर हो रहे जुर्म को अपने इस अखबार में छापते हैं.

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