आम भी खाते हैं गुठली भी गिनते हैं..., जानें दिल्ली के 'गुठलीमैन' जस्मीत सिंह की कहानी  

दिल्ली के आयुर्वेदिक डॉक्टर जस्मीत सिंह 'गुठलीमैन' बनकर पर्यावरण बचाने की अनोखी मुहिम चला रहे हैं. आम की गुठलियों से लाखों पौधे तैयार कर किसानों में बांटे जा रहे हैं. छोटी सी पहल अब बड़े आंदोलन में बदल चुकी है, जो हरियाली बढ़ाने और लोगों को जागरूक करने का काम कर रही है.

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 जानें दिल्ली के 'गुठलीमैन' जस्मीत सिंह की कहानी (Photo: itg) जानें दिल्ली के 'गुठलीमैन' जस्मीत सिंह की कहानी (Photo: itg)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 08 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 9:02 AM IST

कहते हैं आम खाओ और गुठली मत गिनो लेकिन एक शख्स ऐसा है जिसने आम की गुठलियां गिनकर 21 लाख जुटा ली हैं. मीठा आम हर किसी की पसंद, लेकिन इस मीठे फल के पीछे छुपी है घटती हरियाली और बढ़ते प्रदूषण की कड़वी सच्चाई. इसी चिंता ने इस शख्स को प्रकृति का सिपाही बना दिया. दिल्ली में रहने वाले आयुर्वेदिक डॉक्टर जस्मीत सिंह ने एक अनोखी पहल के जरिए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मिसाल कायम की है. 'गुठलीमैन' के नाम से मशहूर डॉ. जस्मीत आम की गुठलियों को बेकार समझकर फेंकने की बजाय उन्हें पेड़ों में बदलने का काम कर रहे हैं.

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9 साल पहले की शुरुआत

इस अभियान की शुरुआत उन्होंने 9 साल पहले 2016 में बेहद छोटे स्तर पर की थी. शुरुआत में वे लोगों से आम की गुठलियां इकट्ठा करते थे, लेकिन समय के साथ यह एक बड़ा जनआंदोलन बन गया. आज उनके प्रयासों का नतीजा है कि अब तक करीब 21 लाख आम की गुठलियां एकत्र की जा चुकी हैं, जिनसे 8 लाख से अधिक पौधे तैयार कर वे किसानों और आम लोगों में वितरित किए जा चुके हैं.

'सिर्फ फल नहीं देता आम का पेड़...'

डॉ. जस्मीत सिंह का मानना है कि आम का पेड़ सिर्फ फल देने वाला वृक्ष नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए एक मजबूत आधार है. यह सालभर हरा रहता है, बड़ी छाया देता है और हवा को शुद्ध करने में मदद करता है. इसके अलावा, यह पक्षियों के लिए भी आश्रय का काम करता है. हालांकि आम के पेड़ को पूरी तरह विकसित होने में करीब 15 साल का समय लगता है, लेकिन एक बार तैयार हो जाने के बाद यह लंबे समय तक पर्यावरण को लाभ पहुंचाता है.

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'आम खाएं तो गुठली फेंकें नहीं'

उनकी अपील भी बेहद सरल है. जस्मीत का कहना है कि जब भी आप आम खाएं, उसकी गुठली को फेंकने के बजाय साफ कर सुखाएं और उनके अभियान से जुड़कर उन्हें भेज दें. सोशल मीडिया के माध्यम से अब इस मुहिम से न सिर्फ देश, बल्कि विदेशों के लोग भी जुड़ रहे हैं.

सबसे बड़ा फायदा किसानों को

इस पहल का सबसे बड़ा फायदा किसानों को मिल रहा है. तैयार पौधे किसानों तक पहुंचाए जाते हैं, जिससे उनकी आय के नए स्रोत बनते हैं और साथ ही हरियाली भी बढ़ती है. यह एक ऐसा मॉडल बन चुका है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक लाभ दोनों साथ-साथ चलते हैं.

डॉ. जस्मीत की यह पहल यह साबित करती है कि बदलाव के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि छोटी-छोटी आदतों की जरूरत होती है. एक आम की गुठली, जो आमतौर पर कचरे में चली जाती है, वही आने वाले समय में एक हरे-भरे भविष्य की नींव बन सकती है.

 

 

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