पश्चिमी दिल्ली की कुंवर सिंह कॉलोनी में हर दिन तय समय पर पानी आता है. लोग बाल्टियां रखते हैं. नल खोलते हैं. रोज़मर्रा की ज़िंदगी चलती रहती है. लेकिन करीब दो महीने से अब उन बाल्टियों में जो भर रहा है, उसे पानी कहना मुश्किल हो गया है. सबसे पहले बदबू आती है. तेज, साफ पहचानी जाने वाली, जैसे कहीं नीचे सीवर लाइन में गड़बड़ी हो गई हो. फिर इसका रंग उभरता है और आखिर में डर. इसे पीने का डर. इससे खाना बनाने का डर और उन घरों में इसके होने का डर, जहां बच्चे रहते हैं.
यहां अब सवाल यह नहीं रह गया है कि जब किसी शहर का पानी जहरीला हो जाए तो क्या किया जाए. यह सवाल अब रोज का हिसाब बन चुका है. पानी पीएं और बीमार पड़ने का खतरा उठाएं, या पानी से बचें और वो पैसे खर्च करें, जो लोगों के पास हैं ही नहीं.
'दिल्ली का भागीरथपुरा'
अब कुंवर सिंह कॉलोनी के लोग अपने इलाके को एक नया नाम देने लगे हैं- दिल्ली का भागीरथपुरा. यह नाम इंदौर की उस त्रासदी से लिया गया है, जहां दूषित पानी पीने से लोगों की जान चली गई और प्रशासन तब हरकत में आया, जब बहुत देर हो चुकी थी.
यह तुलना हल्के में नहीं की जा रही. यह डर से निकली हुई तुलना है. क्योंकि यह कहानी सिर्फ गंदे पानी की नहीं है. यह उस सिस्टम की कहानी है, जो तब तक सुनने से इनकार करता है, जब तक उसे मजबूर न कर दिया जाए.
शिकायतें सबके सामने हैं, जवाब नहीं
दिल्ली जल बोर्ड के अपने सोशल मीडिया पेज खोलकर देखिए. एक के बाद एक शिकायतें दिख जाएंगी- बदबूदार पानी, सीवर मिला पानी, दूषित सप्लाई.
खतरे के संकेत खुले तौर पर मौजूद हैं, उन सभी के लिए जो देखना चाहें. लेकिन कुंवर सिंह कॉलोनी के लोग कहते हैं कि इन शिकायतों का कोई नतीजा नहीं निकला. पानी आता रहा. और सिस्टम की खामोशी भी.
नल से क्या निकल रहा है?
जब आजतक की टीम कॉलोनी पहुंची, तो सबूत कहीं छिपा नहीं था. गली-दर-गली, नलों से सीधे भरी गई बाल्टियों में वही बदबू थी. वही गंदलापन. वही बेचैनी.
हमारे सामने एक शख्स ने कंटेनर उठाया और बताया- यह वही पानी है जो हमें हर दिन मिलता है. यह वही पानी है जिसे कोई पीना नहीं चाहता. और यही पानी एक बुनियादी अधिकार माना जाता है.
'दो महीने से यही पानी आ रहा है'
महिलाएं बोतलें और बाल्टियां लेकर इकट्ठा होती हैं. पानी भरने के लिए नहीं, पानी दिखाने के लिए. एक महिला कहती हैं, दो महीने से यही आ रहा है. सीवर जैसी बदबू आती है.
दूसरी महिला तुरंत बोल पड़ती हैं, उल्टी हो रही है, दस्त हो रहे हैं, पेट दर्द है. बच्चे भी बीमार पड़ रहे हैं.
कई लोग कहते हैं कि यह सब पहले कभी नहीं हुआ. पहले ऐसा नहीं था. एक शख्स जोर देकर कहते हैं. यह सब अब हो रहा है.
जब बच्चों को भी समझ आ जाए...
यहां बच्चों को किसी समझाने की जरूरत नहीं है. एक बच्चा पानी सूंघता है और तुरंत मुंह फेर लेता है. वह कहता है- पीने लायक नहीं है.
जब बच्चे भी पहचानने लगें कि पानी सुरक्षित नहीं है, तो कार्रवाई न होना और भी ज्यादा सवाल खड़े करता है.
बीमारी, कल्पना नहीं हकीकत...
यह डर कोई कल्पना नहीं है. इसके नाम हैं. इसके लक्षण हैं. इसके मेडिकल बिल हैं. उल्टी. दस्त. लगातार पेट के इंफेक्शन.
एक छोटा लड़का अपनी मां के बारे में धीमे से कहता है, 'पानी पीने के बाद बीमार हो गईं. हमें उन्हें गांव भेजना पड़ा.'
पास की मेडिकल शॉप पर यह कोई नई बात नहीं है. दुकानदार कहते हैं, रोज के केस हैं. करीब 15 के आसपास. उल्टी, दस्त.
‘पानी सुरक्षित है...’ कहकर लौट जाते हैं
इन सबके बावजूद लोगों का कहना है कि अधिकारी शिकायतों को लगातार खारिज करते रहे हैं. एक आदमी सीवर लाइन के बेहद पास से गुजर रही पाइपलाइनों के पास खड़ा होकर कहता है, तीन बार DJB वाले आए. हर बार यही कहा कि पानी सुरक्षित है.
जिस पानी को नहीं पी सकते, उसका पूरा बिल
पानी इस्तेमाल लायक हो या नहीं, बिल समय पर आ जाता है. एक महिला ₹24,000 का बिल दिखाती हैं- हम पानी पीते ही नहीं, फिर भी बिल भरना पड़ता है.
अब परिवार रोज़ 40-50 रुपए सिर्फ बोतलबंद पानी पर खर्च कर रहे हैं. कुछ लोग बोरवेल पर निर्भर हैं. कुछ ने कर्ज लेकर RO लगवाया है. यह शौक नहीं है. यह बचाव है.
जब DJB कर्मचारी के घर की भी नहीं सुनवाई
कॉलोनी में कुछ घर ऐसे भी हैं, जहां दिल्ली जल बोर्ड के कर्मचारी खुद रहते हैं. उनकी शिकायतें भी अनसुनी हैं. एक निवासी कहते हैं, हमारे घर में DJB का ही आदमी है. फिर भी कोई सुनवाई नहीं. गंदा पानी आ रहा है, बच्चे घर में हैं. अगर सिस्टम के अंदर के लोग भी जवाब नहीं पा रहे, तो सवाल अपने आप खड़ा हो जाता है- फिर सुनेगा कौन?
गुस्सा और छोड़े जाने का एहसास
अब यह नाराजगी राजनीति तक पहुंच चुकी है. लोग कहते हैं कि उनके स्थानीय विधायक, जो स्वास्थ्य मंत्री भी हैं, उन्होंने भी बात नहीं सुनी. एक महिला कहती हैं, हेल्थ मिनिस्टर होकर भी नहीं सुन रहे. कुछ लोग इस संकट को राजनीतिक बदलाव से जोड़ते हैं. BJP के आने के बाद यह शुरू हुआ. एक निवासी कहते हैं- पहले ऐसा नहीं होता था.
राजनीतिक आरोप अपनी जगह हैं. लेकिन ज़मीन पर भावना साफ है- लोग खुद को छोड़ा हुआ महसूस कर रहे हैं.
‘पानी सुरक्षित है...’ लेकिन किसने तय किया
अधिकारी लगातार कहते हैं कि पानी सुरक्षित है. लेकिन हालिया रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली जल बोर्ड की 25 में से 23 पानी जांच लैब्स की NABL मान्यता खत्म हो चुकी है. तो जब पानी को 'पीने योग्य' बताया जाता है, तो लोग पूछते हैं- किस लैब ने जांच की? किस मानक पर जांच हुई? जब जांच पर भरोसा ही नहीं तो भरोसा दिलाने वाले शब्द खोखले लगते हैं.
क्या किसी त्रासदी का इंतजार है?
देश यह कहानी पहले देख चुका है. इंदौर के भागीरथपुरा में लोग मरे. उसके बाद सिस्टम जागा. अब कुंवर सिंह कॉलोनी वही डर लेकर इंतजार कर रही है. क्या प्रशासन कुछ अपूरणीय होने से पहले जागेगा? या फिर किसी हादसे के बाद? यह अब असुविधा का सवाल नहीं रह गया है. यह जिंदगी और मौत का सवाल बन चुका है.
श्रेया चटर्जी