फंड की कमी पर रोती रही दिल्ली सरकार, 10 हजार करोड़ रखे थे, खर्च नहीं कर सकी

सीएजी रिपोर्ट में यूं तो कई सारे पहलुओं को छुआ गया है, लेकिन जो बात सबसे ज्यादा चौंकाने वाली हैं वो है जिसमें 8 विभागों के अंदर आने वाले 119 हेड ऐसे हैं जहां एक करोड़ या उससे ज्यादा का फंड बजट में निश्चित करने के बावजूद एक पैसा भी खर्च नहीं हो पाया.

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दिल्ली के वित्त मंत्री और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया (फाइल फोटो) दिल्ली के वित्त मंत्री और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया (फाइल फोटो)

कुमार कुणाल

  • नई दिल्ली,
  • 10 अप्रैल 2018,
  • अपडेटेड 7:23 PM IST

दिल्ली में सरकारें और एजेंसियां कई प्रोजेक्ट पर काम नहीं कर पाने के लिए फंड की कमी का रोना रोती रही हैं, लेकिन सीएजी की ओर से साल 2016-17 को लेकर जो रिपोर्ट पेश की गई है, उसके आंकड़े हैरान करने वाले हैं. कई प्रस्ताव के लिए हजारों करोड़ रखे थे और खर्च नहीं किए जा सके.

साल 2016-17 में खर्च करने के लिए दिल्ली सरकार ने कुल 47,429 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा, लेकिन साल खत्म होते होते महज 37,620 करोड़ ही खर्च हो पाया यानि 9,800 करोड़ से ज्यादा की राशि खर्च ही नहीं हो सका. 2015-16 में भी सरकार आवंटित बजट से कम राशि खर्च कर पाई थी. उसके पास खर्च के लिए 41,129 करोड़ रुपये आवंटित थे, लेकिन 37,690 करोड़ ही खर्च हो सके और 3,164 करोड़ की राशि बिना खर्च के ही पड़ी रह गई.

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119 प्रोजेक्ट में पैसा खर्च नहीं हुआ

सीएजी रिपोर्ट में यूं तो कई सारे पहलुओं को छुआ गया है, लेकिन जो बात सबसे ज्यादा चौंकाने वाली हैं वो है जिसमें 8 विभागों के अंदर आने वाले 119 हेड ऐसे हैं जहां एक करोड़ या उससे ज्यादा का फंड बजट में निश्चित करने के बावजूद एक पैसा भी खर्च नहीं हो पाया. इन 119 प्रोजेक्ट में सबसे ज्यादा बजट वाले प्रोजेक्ट की बात करें तो डीटीसी के बसों की खरीद, डीटीसी और क्लस्टर बसों में सीसीटीवी लगाने का प्रावधान, मोहल्ला सुरक्षा दल की स्थापना जैसी कई अहम स्कीम भी शामिल हैं.

डीटीसी बसों की खरीद के लिए 150 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, लेकिन एक भी पैसा खर्च नहीं हुआ. डीटीसी बसों और क्लस्टर बसों में सीसीटीवी कैमरा लगाने के लिए 90 करोड़ रखे गए, लेकिन खर्च कुछ भी नहीं हुआ.

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उसी तरह मोहल्ला रक्षा दल यानि हर मोहल्ले में पुलिस के अलावा सुरक्षा मुहैया कराने के लिए 200 करोड़ रुपये रखे गए थे लेकिन वहां काम तक नहीं शुरू हो पाया. इनके अलावा दिल्ली जलबोर्ड को इंटरसेप्टर सीवर के लिए 200 करोड़ दिए गए थे लेकिन वहां भी काम ठप पड़ा रहा.

पीडब्ल्यूडी भी नहीं कर सका खर्च

हद तो ये है कि दिल्ली में पीडब्ल्यूडी की सड़कों के मेंटनेंस और रख-रखाव के लिए 100 करोड़ रुपये दिए गए जिसका एक बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो पाया.

सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में ये भी बताया है कि 44 हेड में जहां 10 करोड़ से ज्यादा का फंड दिया गया था वहां 2,200 करोड़ रुपये से ज्यादा का फंड बिना खर्च किए ही रह गया.

अगर हम विभागों के हिसाब से देखें तो शिक्षा में 137 करोड़, स्वास्थ्य सेवाओं का 321 करोड़, विकास विभाग का 342 करोड़ और शहरी विकास विभाग का लगभग 1,380 करोड़ रुपये सरकार को साल के आखिर में सरेंडर करना पड़ा.

बात सिर्फ यहीं तक नहीं है बल्कि जब सरकार को ये लगने लगा कि साल खत्म होने तक फंड का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है तो साल के आखिरी तीन महीनों में खर्च ने अचानक रफ्तार पकड़ ली. साल के आखिरी तिमाही यानि तीन महीनों में 44 हेड ऐसे थे जिसमें पूरे बजट का 54 फीसदी से लेकर 100 फीसदी तक फंड खर्च कर दिया गया.

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ऐसे प्रोजेक्ट जहां 50 करोड़ से ज्यादा फंड खर्च नहीं हो पाया

1. इंफॉरमेशन और पब्लिसिटी के लिएः 207.68 करोड़ फंड आवंटन, महज 71.65 करोड़ खर्च, कम बिल, खाली पोस्ट, कंप्यूटर नहीं खरीदने जैसी वजहें.

2. सरकारी सेकंडरी स्कूल के लिएः 1537.86 करोड़ फंड आवंटन, 1392.71 करोड़ खर्च, रिक्त पोस्ट, कम क्लेम वजह.

3. स्कूलों में अतिरिक्त सुविधाएंः 2968.14 करोड़ फंड आवंटन, 2586.72 करोड़ खर्च.

4. दिल्ली स्टेट हेल्थ मिशनः 257 करोड़ फंड आवंटन, 175.68 करोड़ खर्च.

5. पीडब्ल्यूडी सड़कों का रख-रखावः 100 करोड़ आवंटन, 28.68 करोड़ खर्च, वर्क अवार्ड नहीं हुआ.

6. सरकारी स्कूल बिल्डिंग का आउटसोर्सिंग कामः 580 करोड़ बजट का आवंटन, 201.95 करोड़ खर्च, काम की धीमी रफ्तार.

7. सड़क और पुलों का निर्माणः 1031 करोड़ आवंटन, 662.19 करोड़ खर्च हुआ, काम की धीमी रफ्तार और नई स्कीम पास नहीं.

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