राज्यसभा में 27 जुलाई को गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजू ने जानकारी दी कि गुजरात, असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा समेत 26 राज्य और केंद्रशासित क्षेत्र बाढ़-बारिश की चपेट में हैं और 508 जानें जा चुकी हैं, देश की 2.8 लाख हेक्टेयर फसली जमीन बाढ़ से आई आपदा की चपेट में है और 63 लाख से ज्यादा घर क्षतिग्रस्त हो गए हैं. सबसे ज्यादा जान-माल का नुक्सान इस बार गुजरात को उठाना पड़ा, जहां 200 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है. रिजिजू ने यह भी कहा, ''मॉनसून के दौरान हर साल जून से सितंबर तक देश में भारी बारिश होती है...वर्षा के परिणामस्वरूप नदियों में बाढ़ आना मौसम की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है." बाढ़ और बारिश का यह सच हर साल देश के सामने आता है लेकिन नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने पिछले नौ साल के दौरान बाढ़ के पीछे की जो कहानी अपनी रिपोर्ट में दी है वह कुछ और ही हकीकत बयान करती है.
बांध और बाढ़ जुड़े हुए मसले हैं. पूर्वसूचना और तैयारी ही इससे बचने का उपाय है. बाढ़ की पूर्वसूचना हासिल करने के लिए टेलीमीट्री स्टेशनों की जरूरत होती है जहां से सूचनाएं प्रसारित की जाती हैं लेकिन करीब 60 फीसदी स्टेशन काम ही नहीं कर रहे हैं. सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक, बारहवीं पंचवर्षीय योजना में 219 टेलीमीट्री स्टेशन लगाने का लक्ष्य रखा गया लेकिन केवल 56 स्टेशन ही 2016 तक लगाए गए. कुल 375 टेलीमीट्री स्टेशनों में से 222 ठप पड़े हैं, इस वजह से जलस्तर और अन्य मौसमी सूचनाओं का रियल टाइम डेटा नहीं मिल पाता. 20 साल तक टेलीमीट्री स्टेशनों के आधुनिकीकरण पर खर्च करने के बावजूद राष्ट्रीय जल आयोग को स्थानीय डेटा पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे चूक की आशंका बनी रहती है.
एक और तथ्य यह है कि केंद्र सरकार राज्यों को बाढ़ की चेतावनी तो जारी कर सकती है लेकिन इंतजाम करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती और राज्यों का तंत्र कई बार चेतावनी नजरअंदाज करता है. रिपोर्ट कहती है कि ओडिशा के हीराकुड बांध में पानी का स्तर संतुलित न रखने के कारण अचानक 50 गेट खोल दिए गए, जिससे निचले इलाके पानी में समा गए. अगस्त से लेकर सितंबर 2011 तक 20 दिनों में छत्तीसगढ़ और ओडिशा में भारी बारिश से महानदी का जलस्तर बढऩे की चेतावनी केंद्रीय जल आयोग ने कई बार जारी की थी लेकिन बांध के अफसरों ने ध्यान नहीं दिया और सितंबर में भारी बाढ़ आ गई, जिससे ओडिशा के 13 जिले प्रभावित हुए और दो हजार करोड़ रु. का आर्थिक नुक्सान हुआ.
इससे भी सबक नहीं लिया गया, 2014 में यही कहानी फिर दोहराई गई. नतीजा भी वही रहाः महानदी बेसिन में बाढ़ आ गई. जून 2013 में उत्तराखंड में अलकनंदा में बाढ़ की कोई पूर्वसूचना नहीं दी गई. मार्च 2016 तक 4,862 बड़े बांधों में से मात्र 349 (7 फीसदी) के लिए ही इमरजेंसी ऐक्शन प्लान/डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान तैयार किया गया. इनमें से भी 231 (पांच फीसदी) में ही ऑपरेटिंग मैनुअल तैयार किया गया. उत्तर प्रदेश के 115 में से सिर्फ 2, मध्य प्रदेश के 898 में 2, महाराष्ट्र के 1,693 में से 181 जबकि ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना, त्रिपुरा, हरियाणा ने कोई इमरजेंसी ऐक्शन प्लान बनाया ही नहीं. 17 राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में से सिर्फ दो ने मॉनसून के पहले और बाद में बांधों का पूरी तरह निरीक्षण कराया जबकि 12 राज्यों में किसी तरह का कोई निरीक्षण नहीं हुआ.
इस रिपोर्ट को तैयार करने में सीएजी ने 206 फ्लड मैनेजमेंट प्रोजेक्ट, 38 फ्लड फोरकास्टिंग स्टेशन, 49 रिवर मैनेजमेंट एक्टिविटीज, 68 बड़े बांध, 17 चुनिंदा राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों का सैंपल 2007-08 से 2015-2016 तक सैंपल लिया. इसमें बाढ़ नियंत्रण के कामों का भी आकलन पेश किया गया है. 11वीं और 12वीं योजना के नौ साल में 12,242.88 करोड़ रुपए के कामों को मंजूरी दी गई लेकिन जल संसाधन मंत्रालय ने 4,723.08 (39 फीसदी) करोड़ रु. ही जारी किए. 517 योजनाओं में से 297 ही पूरी हो सकीं (देखें सूची). मंत्रालय ने इन आंकड़ों का प्रोजेक्ट आधारित ब्योरा तैयार ही नहीं किया है. जल संसाधन मंत्रालय कहता है कि केंद्रीय मदद में कमी या तो बजट में कम धन के आवंटन के कारण या प्रस्ताव न देने या अव्यावहारिक प्रस्ताव देने के कारण आई. केंद्र से बजटीय सहायता कम मिलने कारण भी प्रोजेक्ट लेट हो रहे हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, चार राज्यों में 48 परियोजनाओं को एंम्पावर्ड कमेटी की मंजूरी के बावजूद केंद्रीय सहायता की राशि मिलने में दो से 48 महीनों का असाधारण विलंब हुआ. लेटलतीफी की कुछ और मिसालें भी रिपोर्ट में गिनाई गई हैं. हरिद्वार जिले में भोगपुर से बलवाली तक 20.5 किलोमीटर के मार्जिनल बांध की 11.92 करोड़ रु. की परियोजना 1989 में गंगा फ्लड कंट्रोल कमिशन (जीएफसीसी) पटना को भेजी गई जो कि 25 साल बाद 2014 में 20.69 करोड़ रु. में पूरी हो सकी. उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में कुनरा नदी का 15 किलोमीटर लंबा तटबंध बनना था ताकि 1,696 हेक्टेयर जमीन को बाढ़ से बचाया जा सके. प्रोजेक्ट 10.33 करोड़ रु. की लागत से बनना था, जीएफसीसी से यह 2006-07 में मंजूर हुआ लेकिन मौका मुआयना में पता चला कि यह सिर्फ 8.1 किलोमीटर बना है.
इसमें रेगुलेटर नहीं बने और रेगुलेटर के लिए 50-60 मीटर की जगह छोड़ी गई है जिससे यह बेमतलब हो गया है. प्रोजेक्ट को मंजूरी में देरी से और भी समस्याएं आती हैं जैसे कि हरियाणा में राज्य बाढ़ नियंत्रण बोर्ड ने 2008 में एक बाढ़ नियंत्रण प्रोजेक्ट बनाया जिसे मार्च 2012 में पूरा होना था. इसके लिए केंद्र ने अगस्त 2009 में 173.75 करोड़ रु. स्वीकृत किए लेकिन राज्य में 2010 में बाढ़ आ जाने से प्रोजेक्ट का पूरा तकनीकी ढांचा बदलना पड़ा. एम्पावर्ड कमेटी और इंटर मिनिस्टीरियल कमेटी की मंजूरी में विलंब इसकी वजह है. कई राज्यों में बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम पूरा करने में 10 महीने से लेकर 13 साल तक का विलंब हुआ. बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम (एफएमपी) गाइडलाइंस के मुताबिक, एक्वपावर्ड कमेटी की मंजूरी के बाद केंद्र को प्रोजेक्ट की पहली किस्त तत्काल रिलीज करनी होती है. 15 दिन में राज्य को रकम काम वाले विभाग को जारी करनी होती है.
सीएजी को बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम में काम का ठेका देने में भी अनियमितताएं मिलीं. साथ ही हिमाचल प्रदेश, केरल, पंजाब, राजस्थान आदि 15 राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में बाढ़ पूर्वानुमान केंद्र हैं ही नहीं. असम और उत्तर प्रदेश के अलावा किसी राज्य ने बाढ़ संभावित इलाकों का सत्यापन भी नहीं किया. बाढ़ के लिहाज से संवेदनशील इलाकों की कोई वैज्ञानिक परिभाषा अभी तक सरकार तय नहीं कर पाई है. बाढ़ आयोग ने प्रभावित क्षेत्रों की वैज्ञानिक तरीके से पहचान के लिए कहा लेकिन 17 राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में से किसी ने यह काम नहीं किया. नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी कहती है कि बाढ़ रोकने के उपाय करना राज्यों का काम है. अथॉरिटी इसमें मदद भर करती है.
बाढ़ नियंत्रण के अलावा बाढ़ राहत कार्यों में भी परेशानी आती है. नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स के महानिदेशक संजय कुमार कहते हैं, ''लोग घर-जमीन छोडऩे को तैयार नहीं होते. उन्हें पानी की ताकत का अंदाजा नहीं है." बनासकांठा में विकराल स्थित का जायजा खुद केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने लिया. उन्होंने बताया, ''गुजरात में 80 हजार से ज्यादा लोगों को बाढ़ वाले इलाकों से सुरिक्षत निकाला गया है. राज्य में 18 जिलों के करीब 4.5 लाख लोग बाढ़ की चपेट में हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 करोड़ रु. का पैकेज दिया है." इस बार गुजरात की बाढ़ अप्रत्याशित है. स्काइमेट के मौसम विज्ञानी महेश पालावत बताते हैं, ''जुलाई 1905 के बाद पहली बार गुजरात में ऐसी बारिश हुई. अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के मॉनसूनी बादल एक साथ यहां बरसे. राजस्थान का पानी बहकर गुजरात के जिलों में पहुंचा."
बाढ़ से बचने के उपायों में कई अड़ंगे हैं, जैसे बांध सुरक्षा विधेयक 2010 से लटका हुआ है. राष्ट्रीय जल नीति के अलावा महकमे बहुत बन गए हैं, जैसे केंद्र सरकार के अधीन-केंद्रीय जल आयोग, गंगा फ्लड कंट्रोल मिशन (1972), ब्रह्मपुत्र बोर्ड (1980), राष्ट्रीय बाढ़ आयोग (1976), टास्क फोर्स (2004) नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी और राज्यों में स्टेट टेक्निकल एडवाइजरी कमेटी, राज्य बाढ़ नियंत्रण बोर्ड आदि, फिर भी बाढ़ का पानी हर साल सिर चढ़कर बोलता है.
मनीष दीक्षित