क्या हुआ जब 11 साल बाद aajtak.in की टीम पहुंची 'बाटला हाउस'

दिल्ली के जामिया नगर इलाके में 11 साल पहले आज ही दिन हुए बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद से एल-18 इमारत के फ्लैट नंबर 108 आजतक अपनी विरानगी पर रो रहा है. इस फ्लैट का न तो ताला खोला गया है, न तो यहां कोई किराय पर रहने आया है और न ही इसे कोई खरीदने आया.

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बाटला हाउस की बिल्डिंग एल-18 बाटला हाउस की बिल्डिंग एल-18

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 19 सितंबर 2019,
  • अपडेटेड 12:38 PM IST

  • 11 साल से अपनी वीरानगी पर रो रहा है एल 18 फ्लैट
  • पड़ोस में रह रहे लोग आज भी नहीं भूले गोलियों की बरसात
  • बाटला एनकाउंटर से ठीक पहले हुए थे सीरियल ब्लास्ट

दिल्ली के जामिया नगर के बाटला हाउस इलाके की बिल्डिंग एल-18 की चौथी मंजिल का फ्लैट नंबर 108 आज भी वीरान है. 11 साल पहले आज ही के दिन 19 सितंबर 2008 को इस फ्लैट में दिल्ली पुलिस की मुठभेड़ कुछ लोगों से होती है. मुठभेड़ में दो लोग मारे जाते हैं, जिनके बारे में दिल्ली पुलिस बताती है कि वे आतंकवादी थे और दिल्ली ब्लास्ट के मुख्य साजिशकर्ता थे. इस मुठभेड़ में एक पुलिसकर्मी भी गोलियां लगने से शहीद हो जाता है.

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बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद से एल-18 इमारत के फ्लैट नंबर 108 आजतक अपनी वीरानगी पर रो रहा है. इस फ्लैट का न तो ताला खोला गया है, न तो यहां कोई किराये पर रहने आया है और न ही इसे कोई खरीदने आया. इस फ्लैट का मालिक भी अब तो दिल्ली के जामिया नगर से दूर गाजियाबाद में जाकर बस गया है.

19 सितंबर 2008 को बाटला हाउस के जिस फ्लैट पर गोलियां बरस रही थीं, उसी के सामने वाले फ्लैट में रह रहे सुहेल अनवर ने aajtak.in से बातचीत करते हुए कहा कि 11 साल पहले यह फ्लैट जिस प्रकार से बंद किया गया है, वैसे ही आज भी बंद है. इस फ्लैट में आजतक कोई रहने नहीं आया है और न ही इसे कोई देखने आया है. इस फ्लैट में लगा विंडो एसी आज भी वैसे ही लगा हुआ है. हालांकि इस फ्लैट को सील किया गया था, उसे कोर्ट के आदेश पर एक साल पहले हटा दिया गया है. इसके बावजूद यहां पर कोई रहने के लिए नहीं आया है.

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सुहेल अनवर 19 सितंबर 2008 के घटनाक्रम की याद को ताजा करते हुए कहते हैं कि उस दिन जो हुआ था वह सब कुछ हमारी नजरों के सामने हुआ था. उसे याद कर आज भी रूह कांप जाती है, लेकिन अब घटना को काफी दिन गुजर गए हैं. इसीलिए समय के साथ अब हम उसे याद भी नहीं करना चाहते हैं, लेकिन फ्लैट सामने हैं तो याद आ ही जाती है.

वह कहते हैं कि सामने वाले फ्लैट में काफी लड़के रहा करते थे और वहां पर काफी दूसरे लड़के भी आया करते थे. हालांकि वे क्या करते थे और क्या नहीं, हमें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. उन्होंने कहा कि हमें जो भी पता था वह सब दिल्ली पुलिस को बता दिया था. बाटला हाउस एनकाउंटर पर बनी फिल्म पर सुहेल अनवर कहते हैं कि वह तो पूरी तरह बकवास है. फिल्म तो नहीं देखी है, लेकिन ट्रेलर देखा है. उसमें जो दिखाया गया है, वैसा यहां कुछ नहीं हुआ है.

एनकाउंटर वाले फ्लैट से ठीक नीचे तीसरी मंजिल पर 106 नंबर के फ्लैट रह रहे फैसल बट्ट बताते हैं कि वह अभी दो महीने पहले ही यहां रहने आए हैं. हालांकि उन्हें बाटला हाउस एनकाउंटर के बारे में पता है, लेकिन वह कभी उस फ्लैट जाकर देखने की हिम्मत नहीं जुटा सके हैं. वह कहते हैं कि हम कश्मीर से हैं, इस तरह की घटना वहां पर हर रोज होती है. इसीलिए हमें उसे देखने में कोई दिलचस्पी नहीं है.

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एल-18 के तीसरी मंजिल पर स्थित 105 नंबर के फ्लैट में हम घंटी बजाते हैं, अंदर से एक बच्ची की आवाज आती है रुकिए अंकल और फिर एक महिला कहती हैं कि कौन तो हम कहते हैं कि हमें जरा 108 नंबर वाले फ्लैट के बारे में कुछ बात करनी है तो बिना कुछ बोले फौरन ही दरवाजे को बंद कर देती हैं.

बिल्डिंग से हम नीचे उतरते हैं और बगल में रह रहे बुजुर्ग बदर तस्लीम से जैसे ही बात करने की कोशिश की वह तैश में आ जाते हैं और कहते हैं कि कुछ नहीं होने वाला. जो होना था, हो गया है. बेवजह अब लकीर पीटने से कोई मतलब नहीं है. फोटो थे और वीडियो थे, सबकुछ था, क्या हुआ? अब हमें इस मसले पर कोई बात नहीं करनी है और बड़बड़ाते हुए अपने घर के अंदर चले जाते हैं. साथ ही हमें वो अपने अधूरे सवालों और चिंताओं के बीच बाहर छोड़ जाते हैं.

बाटला एनकाउंटर से ठीक पहले हुए थे सीरियल ब्लास्ट

बता दें कि बाटला हाउस एनकाउंटर से ठीक एक हफ्ते पहले 13 सितंबर 2008 को दिल्ली में पांच अलग-अलग जगह पर सीरियल ब्लास्ट हुए थे. दो बम कनॉट प्लेस में फटे थे. दो ग्रेटर कैलाश के एम ब्लॉक में और एक बहुत भीड़-भाड़ वाली जगह करोल बाग की गफ्फार मार्केट में. इन पांचों धमाकों में करीब 30 लोग मारे गए थे.

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यह था बाटला हाउस एनकाउंटर

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल इन सीरियल बम धमाकों की जांच कर रही थी. इसी के चलते वो टीम 19 सितंबर 2008 को बाटला हाउस में एल-18 नंबर बिल्डिंग की चौथी मंजिल पर जा पहुंची, जहां पर पुलिस की इंडियन मुजाहिदीन के संदिग्ध आतंकियों से मुठभेड़ हुई. इस मुठभेड़ में मोहम्मद आतिफ अमीन और साजिद की मौत हुई. साथ ही इस एनकाउंटर में टीम का नेतृत्व कर रहे मोहन चंद्र शर्मा को भी गोली लगी गई थी. 19 सितंबर को ही देर शाम मोहन चंद्र शर्मा की होली फैमिली अस्पताल में मौत हो गई थी.

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