लालू यादव: इंदिरा विरोध से पाया मुकाम, आडवाणी विरोध से कद और मोदी विरोध से वापसी

आजादी के करीब एक साल बाद 11 जून 1948 को बिहार के गोपालगंज में जन्मे लालू प्रसाद यादव ने छात्र राजनीति से शुरू कर मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तक का सफर तय किया. बिहार में उनको सामाजिक न्याय के कामों के लिए जाना जाता है. फिलहाल लालू यादव चारा घोटाले मामले में रांची के बिरसा मुंडा जेल में सजा काट रहे हैं.

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आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 11 जून 2020,
  • अपडेटेड 10:43 AM IST

  • लालू का जन्म 11 जून 1948 में बिहार को गोपालगंज में हुआ
  • लालू 1990 में सीएम बने और सामाजिक न्याय पर किया फोकस

बिहार की सियासत के सबसे कद्दावर नेताओं में शामिल आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद ने आज जिंदगी के 72 साल का सफर पूरा कर लिया है. आरजेडी इस बार लालू के जन्मदिन को 'गरीब सम्मान दिवस' के रूप में मनाएगी और 72,000 से ज्यादा गरीबों को खाना खिलाने का काम करेगी. पार्टी ने बिहार के प्रत्येक प्रखंड में कम से कम 151 लोगों को खाना खिलाने का लक्ष्य रखा है.

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आजादी के करीब एक साल बाद 11 जून 1948 को बिहार के गोपालगंज में जन्मे लालू प्रसाद यादव ने छात्र राजनीति से शुरू कर मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तक का सफर तय किया. बिहार में सामाजिक न्याय के लिए किए गए कामों के लिए उन्हें जाना जाता है. फिलहाल लालू यादव चारा घोटाले मामले में रांची के बिरसा मुंडा जेल में सजा काट रहे हैं. हालांकि, स्वास्थ्य खराब होने के चलते रिम्स अस्पताल में भर्ती हैं.

मजदूर का बेटा बना पटना विवि में छात्रसंघ अध्यक्ष

लालू प्रसाद यादव का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ और उनके पिता मजदूरी किया करते थे. लालू ने बिहार में दलित-पिछड़ों को मुख्यधारा में लाने का काम किया. छात्र राजनीति से अपना सियासी सफर शुरू करने वाले 62 वर्षीय लालू ने 1970 के दशक में पटना विश्‍वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव के रूप में पहला चुनाव जीता और फिर छात्र संघ के अध्यक्ष बने.

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इंदिरा विरोध ने दिलाया बिहार में मुकाम

जयप्रकाश नारायण, राज नारायण, कर्पूरी ठाकुर और सत्‍येंद्र नारायण सिन्‍हा से प्रेरित होकर लालू ने छात्र आंदोलन का नेतृत्‍व किया. साल 1974 में बिहार और गुजरात में तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ किए आंदोलन से लालू का सियासी कद बढ़ा. 1975 में आपातकाल के खिलाफ आवाज बुलंद कर लालू यादव मीसा कानून के तहत जेल में रहे. लालू के जेल में रहते उनकी बेटी का जन्म हुआ तो उन्होंने उसका नाम मीसा भारती रखा.

आपातकाल के बाद 1977 में लोकसभा चुनाव हुआ तो जनता पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सत्‍येंद्र नारायण ने लालू को लोकसभा चुनाव लड़ने की सलाह दी. इसके बाद लालू यादव महज 29 साल की उम्र में 1977 में लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे लेकिन दो साल बाद 1979 में वह तब चुनाव हार गए. इसके बाद 980 और 1985 में वह बिहार विधानसभा के लिए चुने गए.

मुसलमानों और यादवों में बढ़ाया जनाधार

हालांकि, लालू यादव 10 साल के भीतर बिहार की सियासत में अपना सिक्‍का जमाने में कामयाब रहे. 1989 में भागलपुर सांप्रदायिक हिंसा के बाद लालू यादव ने मुसलमानों और यादवों के बीच अपना जनाधार बढ़ाया. इसी एम-वाई समीकरण के बल पर लालू 1989 में आम चुनावों और 1990 के बिहार विधानसभा चुनावों में नेशनल फ्रंट का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे. इसी का नतीजा था कि 1990 में लालू बिहार के मुख्यमंत्री बने और फिर उन्होंने कभी मुड़कर नहीं देखा.

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आडवाणी के रथ रोकने से बढ़ा राष्ट्रीय कद

इसी दौरान केंद्र में बीजेपी की समर्थन से चल रही वीपी सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट पेश कर दी और अन्य पिछडे वर्ग के लिए 27 प्रतिशत के आरक्षण की घोषणा कर दी. इसी के साथ मंडल बनाम कमंडल की राजनीति की शुरुआत हुई. बीजेपी राममंदिर आंदोलन को धार देने में जुटी हुई थी. लालकृष्ण आडवाणी ने राममंदिर के निर्माण के मुद्दे पर 1990 में रथयात्रा निकाली तो लालू ने बिहार के समस्तीपुर में उनका रथ रोका और आडवाणी को गिरफ्तार किया. इसका सियासी असर यह हुआ कि केंद्र की वीपी सिंह सरकार गिर गई, लेकिन लालू यादव राजनीतिक तौर पर मजबूत हो गए.

चारा घोटाले का दाग और राबड़ी के हाथ सत्ता

लालू की सियासत में तब नया राजनीतिक मोड़ आया जब 1996 में चारा घोटाले का दाग उनके दामन पर लगा. 1997 में सीबीआई लालू यादव की गिरफ्तारी के लिए वारंट लाई तो उनको मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत अपनी पत्नी राबड़ी देवी सौंप दी. राबड़ी देवी ने अगले आठ साल तक बिहार का शासन संभाला, लेकिन नीतीश कुमार और बीजेपी गठबंधन से मात खा गईं.

घाटे में जा रही रेल को उबारा

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हालांकि, बिहार की सत्ता बाहर होने के बावजूद लालू ने राष्ट्रीय राजनीति में एक मुकाम बना लिया था. 2004 में उनकी पार्टी आरजेडी ने लोकसभा चुनाव में 22 सीटों पर कब्जा जमाया और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में लालू यादव रेल मंत्री बने. उन्होंने रेल मंत्री के रूप में अपने पूरे कार्यकाल में रेल बजट में यात्री भाड़े में कोई भी इजाफा नहीं किया. उन्होंने घाटे में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम की कायापलट कर डाली और उसे मुनाफे में ला दिया. इस दौरान लालू ने रेलवे में कुल्हड़ का चलन शुरू किया और गरीब रथ जैसी सस्ती एसी ट्रेन चलाई.

मोदी विरोध से की बिहार में वापसी

केंद्र में नरेंद्र मोदी का राजनीतिक उदय लालू यादव की पार्टी के लिए वरदान साबित हुआ. 2014 के लोकसभा चुनाव में भले ही लालू की सीटें कम हो गई थी, लेकिन नीतीश कुमार से गठबंधन का रास्ता बन गया. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में जेडीयू और आरजेडी गठबंधन मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी को मात देने में कामयाब रहा. इसके जरिए लालू अपने बेटे तेजस्वी यादव को राजनीतिक तौर पर स्थापित करने में कामयाब रहे.

तेजस्वी को सौंपी राजनीतिक विरासत

हालांकि, यह दोस्ती बहुत दिन नहीं चल सकी और 2 साल के बाद जेडीयू और आरजेडी की दोस्ती टूट गई और नीतीश कुमार ने फिर से बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली. इसके बाद से लालू यादव जेल में हैं और अब लालू की विरासत तेजस्वी यादव संभाल रहे हैं. 2020 के विधानसभा चुनाव में तेजस्वी के कंधों पर लालू की राजनीतिक विरासत को बचाए रखने की चुनौती होगी.

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