नई दिल्ली के राजीव चौक के पास एक सामान्य-से दो मंजिला मकान में आम आदमी पार्टी (आप) के दफ्तर में हर दिन भारी गहमागहमी रहती है. कार्यकर्ता बनने या टिकट चाहने वालों की लंबी-लंबी कतारें लगी रहती हैं. पार्टी के इस बढ़ते जनाधार के प्रबंधन के लिए अवैतनिक कार्यकर्ता दिन-रात जुटे रहते हैं.
31 दिसंबर तक पार्टी के पंजीकृत समर्थकों की संख्या करीब 14 लाख पहुंच गई थी. करीब तीसेक वर्ष की सुजाता राय ऐसी ही एक कार्यकर्ता हैं. वे लगभग सालभर से पार्टी से जुड़ी हुई हैं और रोज करीब 12 घंटे पार्टी दफ्तर में चंदा जुटाने में बिताती हैं. उनके कारोबारी पति भी पार्टी के कार्यकर्ता हैं. वे कहती हैं, ''हमें पार्टी की पारदर्शिता काफी आकर्षित करती है.”
उन्हें अभी तक पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मिलने का मौका नहीं मिला है. लेकिन उन्हें इसका कोई मलाल नहीं है.
इसी तरह कैंब्रिज से अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विषय में ग्रेजुएट 24 वर्षीय दिगंत कपूर को देखिए. कपूर करीब सालभर पहले आप के लिए काम करने यूएई से स्वदेश लौटे. वे भी अवैतनिक कार्यकर्ता हैं. उन्हें अकसर एक सफेद प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठे जनगणना और चुनाव आयोग के आंकड़ों को खंगालते देखा जा सकता है.
कपूर के पीछे केजरीवाल का एक पोस्टर लगा है जिसमें स्वराज और आम लोगों के सशक्तीकरण की बातें हैं. केजरीवाल के मुताबिक, स्वराज की यही अवधारणा लोकसभा चुनावों के लिए राष्ट्रीय घोषणा-पत्र का आधार बनेगी.
लेकिन पार्टी का समर्थन जैसे-जैसे बढ़ रहा है, देश में प्रमुख आर्थिक चुनौतियों पर रुख स्पष्ट करने की जरूरतों का भी एहसास होने लगा है. इससे उसके काडर को ही बल नहीं मिलेगा, बल्कि आलोचकों को भी जवाब दिया जा सकेगा. आलोचकों के मुताबिक, पार्टी अब भी गंभीर राष्ट्रीय विकल्प बनने को तैयार नहीं है.
इसी वजह से अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, कृषि, भूमि अधिग्रहण, ऊर्जा, परिवहन और टिकाऊ शहरीकरण के मुद्दों पर सिफारिशों का मसौदा तैयार करने के लिए आप के नेताओं की 31 कमेटियां बनाई गई हैं. पार्टी अभी तक विभिन्न विचारधाराओं के छोटे-मोटे समूहों के एक छतरी संगठन जैसी दिखती है.
पार्टी के नेता योगेंद्र यादव कहते हैं, ''हम सभी के विविध वैचारिक नजरिए और पृष्ठभूमि हैं. आप में ऐसे लोग हैं जिन्हें परंपरागत वामपंथी कह सकते हैं, कुछ दूसरे लोग मुक्त बाजार के हिमायती हैं तो कुछ वामपंथियों के तीखे आलोचक हैं. परंपरागत राजनैतिक पार्टियों के विपरीत हम किसी एक विचारधारा से बंधे नहीं हैं. हमारा जोर समस्या समाधान पर है.”
यादव आप की तीन सदस्यीय रणनीतिक कोर कमेटी के सदस्य हैं. वे अपने लंबे अकादमिक करियर में समाजवादी विचारों के लिए जाने जाते हैं, और चुनाव विश्लेषक के रूप में मशहूर रहे हैं. उनके एक करीबी सहयोगी उन्हें 'ऊंचे सिद्धांतों’ वाले बताते हैं जो सीपीएम और बीजेपी, दोनों की राजनीति और आर्थिक सिद्धांतों के विरोधी हैं.
वे यह भी बताते हैं कि यादव पूंजी बाजार को भी 'संदेह’ की नजरों से देखते हैं. केजरीवाल के आर्थिक मामलों में व्यक्तिगत विचार अपेक्षाकृत दक्षिणपंथ की ओर झुके हुए हैं, जबकि जाने-माने वकील तथा पार्टी के सह-संस्थापक प्रशांत भूषण को कुछ लोग 'वामपंथ में भी वाम’ रुझान वाले बताते हैं.
दिल्ली में बिजली सब्सिडी के सवाल पर दो तरह की राय है. फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक विनायक चटर्जी लक्षित सब्सिडी को जायज ठहराते हैं. वे कहते हैं, ''उभरते समाजों में ऐसी पर्याप्त मिसालें हैं कि लक्षित सब्सिडी कुछ क्षेत्रों को खोलने के साथ-साथ जारी रह सकती हैं.”
बिजली की यह नीति पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की ही नीतियों के अनुरूप है जो बिजली पर सालाना 500 करोड़ रु. की सब्सिडी देती रही है. लेकिन केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद वीरमानी कहते हैं, ''दिल्ली को सब्सिडी की जरूरत नहीं है, यह धनी राज्य है. अगर आप खैरात ही बांटना चाहती है तो दूसरी पार्टियों से अलग कहां है. लोग अच्छी सर्विस चाहते हैं, न कि सब्सिडी.”
इसकी उम्मीद कम ही है कि आप कांग्रेस की सब्सिडी नीतियों का विरोध करेगी. पार्टी की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संबंधी कमेटी के प्रमुख, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है, ''फिलहाल सब्सिडी वाली सभी योजनाएं जरूरी हैं क्योंकि देश में गरीबी है और रोजगार का अभाव है. लेकिन हम अगर रोजगार पैदा करने में कामयाब हो जाते हैं तो ये योजनाएं बेमानी हो जाएंगी.”
इस बीच, आप की विभिन्न कमेटियों की सिफारिशें पार्टी नेतृत्व को सौंपी जा चुकी हैं. ये सिफारिशें आप की आर्थिक नीति की आधारशिला बनेंगी. इनमें इन्फ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि में सरकारी निवेश और लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर गरीबी और बेरोजगारी की समस्या से निबटने की बात है.
अरुण कुमार कहते हैं, ''हम निजी क्षेत्रों की भीड़ बढ़ाने के बदले जहां भी संभव होगा, सरकारी क्षेत्र का निवेश बढ़ाने की कोशिश करेंगे. जब ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएं सुधरेंगी तो निजी क्षेत्र निवेश करने को प्रोत्साहित होगा.”
आप की अर्थ नीति की मुख्य बात यह होगी कि निर्णय प्रक्रिया आम आदमी के हाथ में होगी. कर उगाही से लेकर खनन के लाइसेंस और भूमि अधिग्रहण के मामलों में लोगों की बड़ी भागीदारी रहेगी. केजरीवाल अपनी किताब स्वराज में ग्रामसभाओं को अधिकार संपन्न बनाने पर सर्वाधिक जोर देते हैं.
वे उसमें कहते हैं, ''ग्रामसभा के पास उसके दायरे में आने वाले अपने क्षेत्र के सभी छोटे जल संसाधनों, लघु खनिज और लघु वनोपज की मिल्कियत होनी चाहिए. यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि प्रभावित होने वाले गांवों की इजाजत के बिना जमीन, जंगल और खदानों के अधिकार किसी और को न दिए जाएं.”
व्यावहारिक रूप से वे सभी प्राकृतिक संसाधनों का मालिकाना हक ग्रामसभा को हस्तांतरित करने की बात करते हैं और सीधे प्रभावित होने वाले लोगों की इजाजत के बिना कोई फैसला या लाइसेंस देने की मनाही करते हैं.
टैक्स के मामले में कमेटी ने प्रत्यक्ष टैक्स में इजाफा और अप्रत्यक्ष टैक्स में कटौती, टैक्स दायरा बढ़ाकर और सेवाओं पर अधिक टैक्स लगाकर सरकारी खर्चों की भरपाई करने की सिफारिश की है. महंगाई घटाने के लिए उत्पाद शुल्क, सेवा शुल्क और वैट में कटौती करने का प्रस्ताव है.
— साथ में के.आर. बालसुब्रह्मण्यम
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