महमूद ग़ज़नवी ने 24 वर्षों तक भारत पर लगातार हमले किए. सोमनाथ जैसे महान मंदिरों को लूटा और ध्वस्त किया. लेकिन उसकी मृत्यु के बाद उसका साम्राज्य खुद आग में जलकर राख हो गया. उसकी क्रूर लूट-यात्राओं का यही अंत था. एक ऐसी मौत जैसी कहानियों में बुरा करने वालों के लिए दर्ज है.
सोमनाथ पर महमूद ग़ज़नवी का आक्रमण उसकी लूट और विध्वंस की सबसे बड़ी घटना थी. लेकिन गुजरात की ओर बढ़ने से पहले ही महमूद भारत पर हमलों को अपने लिए एक सालाना रिवाज बना चुका था. महमूद के पिता ने उसे ऐसा साम्राज्य सौंपा था जो जरूरत से ज्यादा फैला हुआ था. महत्वाकांक्षा उसके खून में पिघले लावे की तरह बहती थी. वह मध्य एशिया के पड़ोसी राज्यों को जीतना चाहता था.
इन युद्धों के लिए सोना चाहिए था. वफादारी के लिए चांदी और गुलाम. जिन विद्वान दरबारी कवियों को वह संरक्षण देता था और समरकंद व बग़दाद में अपने प्रतिद्वंद्वियों को कुचलने के लिए जिन विशाल सेनाओं की जरूरत थी, उनके लिए ऐसा खजाना चाहिए था जो खर्च से पहले भरता रहे. उसकी नजर भारत पर गिद्ध की तरह पड़ी. दक्षिण-पूर्व में स्थित यह भूमि समृद्ध थी, बिखरी हुई थी, और इन पर ऐसे राजाओं का शासन था रेशम से ढंके हाथियों पर युद्ध में जाते थे और सेविकाओं द्वारा लपेटे गए पान खाते थे.
जो हुआ वह युद्ध नहीं था. वह एक वार्षिक ‘एक्सट्रैक्शन ऑपरेशन’ था, जो चौबीस वर्षों तक चला, हर हमला योजनाबद्ध तरीके और बेरहमी से अंजाम दिया गया था.
खैबर दर्रा... वो दरवाजा जहां से आया आततायी
काबुल से सिंधु तक फैली किलाबंदियों की पतली पट्टी पर हिंदू शाही वंश का शासन था. उनके राजा जयपाल ने खैबर दर्रे को हमलावरों से बचाए रखा था. साल 1001 में जयपाल की सेना पेशावर के मैदानों में हमलावरों से टकराई. जयपाल की सेना हाथियों की चिंघाड़, झंडों की फड़फड़ाहट के साथ पहले पहुंची. उसके सेनापति आश्वस्त थे. आक्रमणकारी सेना छोटी थी, लेकिन ये पारंपरिक योद्धा नहीं थे. ये तुर्की घुड़सवार धनुर्धर थे, जिन्हें बचपन से ही पूरे वेग में घोड़े दौड़ाते हुए तीर चलाने का प्रशिक्षण मिला था.
महमूद ने सीधा हमला नहीं किया. उसने घेरा बनाया और उसके धनुर्धर लगातार तीरों की बौछार करते रहे. लोहे की धार हाथियों की आंखों और कोमल कानों में धंस गई. हाथी घबरा गए और पलटकर अपनी ही पैदल सेना को कुचलने लगे. सूर्यास्त तक जयपाल जंजीरों में था. महमूद ने उसे विकल्प दिया, राजसी फिरौती दो या अपने परिवार को अपनी आंखों के सामने मरते देखो. जयपाल ने फिरौती दी. महमूद ने नाटकीय उदारता दिखाते हुए उसे छोड़ दिया और सोना, घोड़े और पचास हाथी लेकर ग़ज़नी लौट गया. लेकिन जयपाल अपमान के साथ नहीं जी सका. 1002 में उसने अपने पुत्र आनंदपाल को गद्दी सौंपी, एक चिता में जलकर प्राण दे दिए
जब एक ही ध्वज तले साथ आए हिंदू राजा
आनंदपाल अपने पिता से अधिक बुद्धिमान था. वह जानता था कि वह अकेले महमूद का सामना नहीं कर सकता. इसलिए उसने दूसरों राजाओं से एकजुट होने की अपील की. हर प्रमुख हिंदू राज्य को पत्र भेजे गए. सदियों में पहली बार प्रतिद्वंद्वी भारतीय राजवंश एक ही ध्वज के नीचे चलने को राज़ी हुए. उन्होंने आधुनिक पाकिस्तान के अटक के पास, वाहींद में महमूद से सामना करने और उसके हमलों को हमेशा के लिए समाप्त करने का निश्चय किया.
संयुक्त सेना विशाल थी. समकालीन स्रोत 30,000 घुड़सवार, 300 युद्ध-हाथी और असंख्य पैदल सैनिकों का जिक्र करते हैं. संख्या में वे महमूद से तीन गुना थे. वाहींद का युद्ध 1008 की सर्दियों में शुरू हुआ. एक बार फिर हाथी पलटे और भगदड़ मचाते हुए अपनी ही पंक्तियों में घुस गए. आनंदपाल भाग निकला. महासंघ टूट गया. दो सौ वर्षों से भारत के उत्तर-पश्चिम की रक्षा करने वाला हिंदू शाही वंश अप्रासंगिक हो गया. महमूद ने खैबर दर्रा अपने नियंत्रण में ले लिया. इस युद्ध से भारत का द्वार खुल चुका था.
महमूद गजनवी मंदिरों को क्यों बनाने लगा निशाना
1009 तक महमूद राजाओं से लड़ता रहा. फिर उसे पता चला मंदिरों के बारे में और ये भी कि राजाओं पर हमला करने से अधिक आसान मंदिरों पर हमला करना है और मंदिर अधिक लाभदायक साबित होंगे. नगरकोट (कांगड़ा) पर हमले ने उसके लालच को और भड़का दिया. नगरकोट के मंदिर परिसर में सदियों की दान-राशि जमा थी. सोने के सिक्के, जड़ाऊ आभूषण, मोतियों की पेटियां. महमूद सब कुछ ग़ज़नी ले गया.
उसे समझ आ गया कि भारतीय सरप्लस, कृषि-आधारित राज्यों की संचित समृद्धि, राजकोषों में नहीं बंद है. वह देवताओं के घर में रखी है, जिसकी रक्षा केवल पुजारी और अनुष्ठान करते हैं. महमूद को आसान शिकार मिल गया था. 1014 तक उसके हमलों ने एक धार्मिक आयाम ले लिया, जो अब अर्थशास्त्र से आगे की बात थी. वह अब केवल धन के लिए नहीं, बल्कि उत्तर भारतीय सभ्यता की मनोवैज्ञानिक रीढ़ तोड़ने के लिए, प्रतीकात्मक महत्व वाले स्थलों को निशाना बनाने लगा.
थानेसर (कुरुक्षेत्र) की विष्णु प्रतिमा का भयंकर अपमान
थानेसर कुरुक्षेत्र में है, जहां महाभारत का युद्ध लड़ा गया माना जाता है. वहां के चक्रस्वामी मंदिर में विष्णु की एक कांस्य प्रतिमा थी, जिसे पांडवों द्वारा स्थापित बताया जाता था. पूरे भारत से तीर्थयात्री आते थे. नवंबर 1014 में महमूद पहुंचा. स्थानीय शाही राजा ने हताश दूत भेजे. उन्होंने फिरौती की पेशकश की. कहा सोने के पहाड़ या कुछ और भी कीमती ले लें, लेकिन मंदिर को बख्श दिया जाए. महमूद ने इनकार कर दिया.
मंदिर ध्वस्त कर दिया गया. कांस्य विष्णु प्रतिमा को घसीटकर गजनी ले जाया गया और शाही मस्जिद के प्रवेश द्वार पर स्थापित किया गया, जहां उपासकों को अंदर जाने के लिए उस पर पैर रखना पड़ता था. यह साधारण तोड़फोड़ नहीं थी. यह रणनीतिक अपमान था. यह साबित करने के लिए कि हिंदू देवता अपने भक्तों की रक्षा नहीं कर सकते. महमूद ने अपवित्रता को हथियार बना लिया था.
1018 में वह गंगा के मैदान के दिल में बसे मथुरा और कन्नौज पर प्रहार करने के लिए आगे बढ़ा, दोनों उस क्षेत्र के मुकुटमणि थे. मथुरा कृष्ण की जन्मभूमि थी, हजार मंदिरों का नगर. आदेश दिए गए—मूर्तियों से सोना उतारो, लकड़ी के ढांचों को सड़कों पर ढेर करो और नगर को जला दो. फिर महमूद कन्नौज की ओर मुड़ा, जो कभी गुर्जर-प्रतिहार वंश की राजधानी था, जिसका शासन राजस्थान से बंगाल तक फैला था. 1018 तक वह अपने पुराने वैभव की छाया भर था, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से काफी महत्वपूर्ण था. प्रतिहार राजा राजपाल बिना लड़े भाग गया. महमूद ने राजकोष लूटा, मंदिरों को अपवित्र किया और एक सप्ताह के भीतर चला गया.
हिंदू मंदिरों की पिघली मूर्तियों पर खड़ा गजनी का साम्राज्य
लेकिन असली क्षति राजनीतिक थी. राजपाल का पलायन कायरता माना गया. उसके अपने सामंतों ने शीघ्र ही उसकी हत्या कर दी. वह प्रतिहार साम्राज्य, जिसने दो सौ वर्षों तक अरब आक्रमणों का प्रतिरोध किया था, टूटकर आपस में लड़ते उत्तराधिकारी राज्यों में बिखर गया. बिना कोई बड़ा युद्ध लड़े महमूद ने उत्तर भारत की राजनीतिक एकता का सिर काट दिया था. उसके हमलों से अनुमानित दो करोड़ स्वर्ण दीनार भारत से निकाले गए. इतने कि गजनी मध्ययुगीन दुनिया के सबसे धनी नगरों में से एक बन गया. फारसी साहित्य और इस्लामी स्थापत्य की चमकदार राजधानी, जो हजार हिंदू मंदिरों की पिघली मूर्तियों पर खड़ी थी.
और फिर हुई सोमनाथ की लूट
1025 तक वह अपने अंतिम और सबसे दुस्साहसी लक्ष्य के लिए तैयार था एक ऐसा मंदिर जो इतना समृद्ध और इतना दूर था कि कोई विदेशी सेना वहां तक कभी नहीं पहुंची थी, यानी सोमनाथ. 1025 में सोमनाथ की लूट उसका सबसे प्रसिद्ध आक्रमण बन गया.
...लेकिन तिल-तिल कर मरने लगा लुटेरा
सोमनाथ के चार वर्ष बाद महमूद ग़ज़नवी की मृत्यु उसके महल में हुई. कुछ ने कहा रेगिस्तानी बुखार या मलेरिया. कुछ ने फुसफुसाकर तपेदिक और ज़हर की बात की. इसे रेगिस्तान का प्रतिशोध कहा गया. उसके बेटों ने तुरंत साम्राज्य को गृहयुद्ध में झोंक दिया. मुहम्मद और मसूद प्रथम एक-दूसरे को खत्म करने में लग गए, जबकि नए दुश्मन इकट्ठा हो रहे थे. पश्चिम से सेल्जुक तुर्क कमजोरी सूंघते हुए आक्रमण कर चुके थे.
सुल्तान मसूद प्रथम, अपने पिता की कभी महान रही सेना के अवशेषों का नेतृत्व करते हुए, मर्व के पास निर्जन इलाकों में सेल्जुकों से भिड़ा. यह सोमनाथ का उलटा दृश्य था. ग़ज़नवी सैनिक प्यास से मर रहे थे, जलहीन मरुस्थलों में फंसे हुए, और एक श्रेष्ठ शक्ति द्वारा चुन-चुनकर मारे जा रहे थे. इस तरह एक पश्चिमी साम्राज्य हमेशा के लिए खो गया. वंश अपने पुराने वैभव की छाया बनकर डेढ़ सदी तक किसी तरह जीवित रहा और लाहौर उसके लिए अंतिम शरणस्थली बना.
हमले, आग और लूट से ही हुआ खात्मा
1151 में ग़ूरी वंश के ‘जहां-सोज़’ अलाउद्दीन हुसैन ने ग़ज़नी को ही लूट लिया. सात दिनों तक शहर जलता रहा. पुस्तकालय, महल, मस्जिद, महमूद द्वारा बनाया गया सब कुछ राख हो गया. शायद यही ईश्वरीय न्याय था, सब कुछ तहस-नहस कर डालने वाले का खुद ही नाश हो गया.
1186 में गजनवी वंश का अंतिम गढ़ लाहौर, मुहम्मद गोरी के हाथों गिर गया. सुल्तान खुसरो मलिक, महमूद के सिंहासन का अंतिम उत्तराधिकारी था. उसे कैद कर लिया गया और जंजीरों में बांधकर एक पर्वतीय दुर्ग में ले जाया गया, जहां पांच वर्ष बाद चुपचाप उसकी हत्या कर दी गई. इतिहासकार लिखते हैं कि गजनी का कोई घर जिंदा नहीं बचा. वंश अंधकार में समाप्त हुआ, ठीक वैसे ही जैसे उसकी शुरुआत हुई थी. गुलाम जो राजा बने, आखिरकार अपनी ही महत्वाकांक्षा के गुलाम बनकर मरे.
संदीपन शर्मा