संवेदनशील डेटा को बचाने के लिए भारत-UAE में इतना भरोसा क्यों, डिजिटल एंबेसी की क्या भूमिका?

जल्द ही भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच एक समझौता हो सकता है. दोनों ही देश एक-दूसरे के यहां डिजिटल एंबेसी खोलेंगे. यह आम दूतावास से बिल्कुल अलग होगा, जहां खुफिया कागजात से लेकर सरकारी बैंकों के भी दस्तावेज रखे जा सकते हैं.

Advertisement
यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान सोमवार को बेहद संक्षिप्त यात्रा पर भारत आए. (Photo- PTI) यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान सोमवार को बेहद संक्षिप्त यात्रा पर भारत आए. (Photo- PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 21 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:33 PM IST

देश एक-दूसरे के यहां एंबेसी खोलते हैं ताकि कूटनीतिक बातचीत आसान हो सके. यहां डिप्लोमेट्स होते हैं, जो नेताओं से पहले मेलजोल करते हुए कई मुश्किल मामले सुलझाते हैं. लेकिन अब देश आपस में डिजिटल एंबेसी भी खोल रहे हैं. 19 जनवरी को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और भारत ऐसी ही चर्चा पर आगे बढ़े. अब हमारी डिजिटल एंबेसी यूएई में हो सकती है, जहां राष्ट्रीय महत्व के दस्तावेज रखे जाएंगे. वहीं यूएई भी हमारे यहां अपना डिजिटल डेटा रखेगा. 

Advertisement

दो रोज पहले यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान भारत आए. यहां उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी के साथ कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए. इसी के तहत दोनों देशों में डिजिटल एंबेसी खोलने की भी चर्चा है. ये डेटा सेंटर कहां हो सकता है और क्या-क्या तैयारियां चाहिए, इसे खंगाला जा रहा है. 

यूएई के साथ कैसे हैं रिश्ते 

यूएई पश्चिम एशिया का बड़ा डिजिटल और डेटा हब बन चुका है, जहां मॉडर्न डेटा सेंटर और साइबर सुरक्षा के मजबूत इंतजाम हैं. दूसरी वजह यह है कि भारत और यूएई के रिश्ते सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि ज्यादा मजबूत हो चुके हैं. ऐसे में संवेदनशील डेटा को लेकर भरोसे का स्तर भी बढ़ा-चढ़ा है. साथ ही इस देश में राजनीतिक स्थिरता भी है. यही वजहें यूएई को भी भारत में दिखती हैं. 

Advertisement

डिजिटल एंबेसी को इंफो या डेटा एंबेसी भी कह सकते हैं, जिसका मतलब है किसी देश का अपना जरूरी सरकारी डेटा और डिजिटल सिस्टम किसी भरोसेमंद देश में सुरक्षित रखना. पारंपरिक एंबेसी में इमारत, दफ्तर और कर्मचारी होते हैं, वैसे ही डिजिटल एंबेसी में सर्वर, डेटा सेंटर और क्लाउड सिस्टम होते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि यह सब ऑनलाइन और डिजिटल रूप में होता है.

उत्तरी यूरोप के देश एस्टोनिया में लगभग दो दशक पहले बड़ा साइबर अटैक हुआ था. (Photo- Unsplash)

डिजिटल एंबेसी की जरूरत तब महसूस की गई जब सरकारों का कामकाज तेजी से डिजिटल होने लगा और साइबर हमलों का खतरा बढ़ गया. खास तौर पर साल 2007 में यूरोपीय देश एस्टोनिया पर हुए साइबर हमले के बाद यह चिंता गहराई. अटैक में सरकारी वेबसाइट्स, बैंकिंग सिस्टम और संचार सेवाएं ठप हो गई थीं.

दरअसल उस वक्त एस्टोनिया दुनिया के सबसे ज्यादा डिजिटली विकसित देशों में से था. साइबर हमले के दौरान सरकारी वेबसाइटें, संसद, मंत्रालय, बैंक और मीडिया पोर्टल्स बार-बार ठप हो रहे थे. लोगों को ऑनलाइन बैंकिंग, टैक्स भरने और सरकारी सेवाएं लेने में दिक्कतें आईं.

समय रहते डेटा का बैकअप बचा लिया था, इसलिए स्थायी नुकसान नहीं हुआ. लेकिन इस हमले ने यह जरूर दिखा दिया कि अगर साइबर हमला लंबा चले या ज्यादा ताकतवर हो, तो देश का पूरा सिस्टम ठहर सकता है. इसी डर से एस्टोनिया ने बाद में डिजिटल एंबेसी और ऑफ-शोर डेटा स्टोरेज जैसी योजनाओं पर काम शुरू किया. 

Advertisement

इसके अलावा दुनिया के कई देश युद्ध कर रहे हैं. अमेरिका अलग आक्रामक रुख लिए हुए हैं. ऐसे में डर है कि कहीं हर कोई इसकी चपेट में न आ जाए. तब क्या होगा? या फिर कोई बड़ी कुदरती आपदा या राजनीतिक अस्थिरता आ जाए, जैसे नेपाल या श्रीलंका में हुआ, तब क्या होगा? कई देश आशंकित रहने लगे हैं कि इस दौरान उनके जरूरी रिकॉर्ड खत्म हो सकते हैं. 

भरोसेमंद देशों में डिजिटल डेटा सुरक्षित रखा जा सकता है. ये बैकअप होगा, जो इमरजेंसी में काम आएगा. इसी सोच के साथ डिजिटल एंबेसी का कंसेप्ट आया. 

डिजिटल एंबेसी में डेटा को मेजबान देश की तरफ से कानूनी सुरक्षा मिलती है. (Photo- Unsplash)

जिस तरह किसी देश की असली एंबेसी को कानूनी सुरक्षा और सम्मान मिलता है, उसी तरह डिजिटल एंबेसी में रखे डेटा को भी खास सुरक्षा दी जाती है. यह डेटा उस देश की अनुमति के बिना इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. 

हमले के लगभग दशकभर के भीतर एस्टोनिया ने पहली डिजिटल एंबेसी बनाई. उसने लक्ज़मबर्ग के साथ समझौता किया. यह दुनिया का पहला औपचारिक करार था, जो डेटा सुरक्षित रखने के लिए था. इसके बाद मोनाको ने भी ई-एंबेसी की शुरुआत की, जिसे लक्ज़मबर्ग में ही रखा गया. 

डेटा एंबेसी के लिए आम तौर पर दूसरे देश में कोई पारंपरिक दूतावास जैसी इमारत नहीं खोली जाती, जहां झंडा लगे और कर्मचारी बैठें. इसके बजाय उस देश में मौजूद किसी बेहद सुरक्षित डेटा सेंटर या सर्वर फैसिलिटी में जगह ली जाती है. कई मामलों में यह जगह किराए पर होती है, लेकिन कानूनी तौर पर इसे कमर्शियल किराए की तरह नहीं देखा जाता. यह जगह एक खास सरकारी और तकनीकी समझौते के तहत दी जाती है.

Advertisement

जहां तक डिप्लोमेटिक इम्यूनिटी का सवाल है, डेटा एंबेसी को पारंपरिक एंबेसी जैसी राजनयिक छूट नहीं मिलती. यानी वहां पर कोई डिप्लोमेट तैनात नहीं होता. लेकिन डेटा को कानूनी प्रोटेक्शन मिलता है. गेस्ट देश की इजाजत के बिना होस्ट देश के अधिकारी वहां जा भी नहीं सकते, डेटा तक पहुंचने की बात तो दूर है. 

डेटा को जब्त नहीं किया जा सकता, उसमें छेड़छाड़ नहीं की जा सकती और न ही उसे एक्सेस किया जा सकता है. 

भारत ने अपने दो साल पहले बजट में भी डेटा एंबेसी का जिक्र किया था. अब UAE के साथ इसी पर करार हो चुका. दोनों ही देश एक-दूसरे के यहां इंफो एंबेसी बना सकते हैं. इससे किसी साइबर हमले की स्थिति में भी जरूरी चीजें सेफ रहेंगी. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल गुजरात में एक लोकेशन प्रस्तावित हैं, जहां यूएई अपना डिजिटल रिकॉर्ड रख सकता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement