कहते हैं कि फिल्मों में वही दिखाया जाता है, जो हमारे समाज में कहीं ना कहीं मौजूद रहता है. फिल्में लोगों की सोच को बदलने में बहुत अहम रोल भूमिका निभाती हैं. ऐसे में क्या होगा अगर एक ऐसी फिल्म आए, जो मर्दों को अपनी मर्दानगी पर शर्मिंदा महसूस करने पर मजबूर कर दे. शायद ऐसी ही एक फिल्म अब अनुभव सिन्हा लेकर आए हैं, जिसका नाम 'अस्सी' है.
फिल्म 'अस्सी' हर रोज न्यूज चैनल पर आने वाली रेप की खबरों पर आधारित है, जिसे अनुभव सिन्हा ने अपनी बोल्ड फिल्ममेकिंग स्टाइल से जानदार बना डाला है. कैसी है ये फिल्म 'अस्सी' और ये क्यों आपको एक बार नहीं बल्कि हजार बार सोचने पर करेगी मजबूर? आइए, आपको विस्तार से बताते हैं.
क्या है 'अस्सी' शब्द का मतलब?
फिल्म 'अस्सी' टाइटल इंडिया में हर रोज 80 औरतों के साथ हो रहे रेप पर लिया गया है. इसकी कहानी उन 80 रेप पीड़िता में से एक परिमा (कनी कुश्रुति) की है, जो स्कूल में टीचर का काम करती है और अपने पति विनय (जीशान अयूब) और बच्चे के साथ हंसी-खुशी दिल्ली में रहती है. एक रात वो अपने काम से लौट रही होती है, तभी उसे कुछ लड़के गाड़ी में उठाकर ले जाते हैं और उसका रेप करते हैं.
गैंगरेप के बाद, वो लड़की को मरने के लिए रेल की पटरी पर छोड़ देते हैं मगर फिर उसे बचा लिया जाता है. गैंगरेप करने वाले लड़कों में से एक अमीर घराने का होता है, जो अपने बाप की मदद से अपने अपराध को धोने की कोशिश करता है. जब लड़की को बचाया जाता है और अपराधियों को पकड़ा जाता है, तो उनके खिलाफ कोर्ट केस होता है.
रावी (तापसी पन्नू) परिमा का केस लड़ती है, लेकिन उसे अपराधियों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिलता. वो सारा सच जानती है, लेकिन तब भी रेप करने वालों को सजा दिलाने में कमजोर होती है. अब क्या रावी, परिमा को न्याय दिला पाएगी? यही अनुभव सिन्हा की फिल्म का पूरा सार है.
जानदार राइटिंग-एक्टिंग, बोल्ड स्टोरीटेलिंग छोड़ेगी छाप
अनुभव सिन्हा ने 'मुल्क', 'थप्पड़', 'आर्टिकल 15', 'भीड़' जैसी फिल्में बनाई हैं, जिसमें उन्होंने समाज में जो कुछ भी होता है उसे सीधे तौर पर बेबाकी से पेश किया है. फिल्म 'अस्सी' में भी उन्होंने वही पैंतरा आजमाया. फिल्म में दिखाए गए रेप सीन्स से लेकर कोर्ट में होने वाली ट्रायल तक, हर चीज को हूबहू वैसे ही पेश किया गया जैसे असलियत में होता है.
रेप वाले सीन्स को उन्होंने जिस तरह से बड़े पर्दे पर पेश किया है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. शायद वो सीन देखकर आपको बाद में मर्दों से घिन भी आए. हालांकि फिल्म में ये भी पॉइंट सामने रखा गया है कि हर मर्द रेपिस्ट नहीं होता. उनमें से कुछ ऐसे अपराधियों को मरते हुए भी देखना चाहते हैं. अनुभव सिन्हा ने एक सोच को सामने रखा है, जो इस समाज में आज भी कहीं ना कहीं मौजूद है. इसमें सभी एक्टर्स का योगदान है, जिन्होंने हर सीन में अपनी एक्टिंग से जान डाली. फिल्म की खासियत यही है कि इसमें हर कोई अपने आप में हीरो है.
अनुभव सिन्हा की इस फिल्म की जान इसकी राइटिंग है. गौरव सोलंकी द्वारा लिखा गया स्क्रीनप्ले और स्टोरी वाकई तारीफ के काबिल है. उन्होंने एक रूटीन स्टोरी को जिस तरह का ट्रीटमेंट दिया है, जो आपको अपनी सीट से बांधे रखती है. इस फिल्म के लिए गौरव सोलंकी को सभी एक्टर और डायरेक्टर के मुकाबले सबसे ज्यादा पैसे मिले हैं. फिल्म देखने के बाद, आपको समझ आएगा कि उन्हें इतना पैसा क्यों दिया गया.
कोर्ट रूम ड्रामा से कई गुना ज्यादा अलग है 'अस्सी'
'अस्सी' एक रूटीन कोर्ट रूम ड्रामा फिल्म नहीं है. ये हमारे समाज में होने वाली एक ऐसी घटना की कहानी है, जिसमें कोर्ट रूम ड्रामा सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा है. इसका फोकस ज्यादा महिला सुरक्षा पर रहता है, जो आपके मन में कई सवाल खड़े करता है. फिल्म में हर कुछ देर में एक लाइन लिखी आती कि हमारे देश में हर 20 मिनट के अंदर एक महिला का रेप होता है.
ये लाइन आपके दिमाग पर सीधा असर करती है और आपको सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारा देश महिलाएं कहीं भी सुरक्षित है या नहीं. क्या हमारा सिस्टम इतना कमजोर है कि एक महिला के साथ रेप हुआ है, तो उसे न्याय मिलने के लिए इतनी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा. आप खुद सवाल उठाएंगे कि क्या हमारे देश में कोई ऐसा कानून नहीं, जिसके लागू होने के बाद अपराधी रेप करने से पहले हजार बार सोचे.
फिल्म 'अस्सी' बड़े दिनों के बाद थिएटर्स में आई एक ऐसी सोशल-ड्रामा फिल्म है, जिसे हर किसी को एक ना एक बार जरूर देखना चाहिए. खासतौर पर सभी मर्दों को इसे एक बार जरूर देखना चाहिए, भले ही आपकी सोच अच्छी ही क्यों ना हो. ये फिल्म आपके अंदर औरतों के लिए एक अलग सम्मान और सुरक्षा की भावना को जगाएगी. इस फिल्म को कोई स्टार नहीं, बस एक्सपीरियंस ही किया जा सकता है.
पर्व जैन