Film Review: 'पूर्णा' के बिना बॉलीवुड पूर्ण नहीं हो सकता था

आजकल बायोपिक का चलन है. एक्टर डायरेक्टर और प्रोड्यूसर राहुल बोस ने भी एक रियल लाइफ पर बायोपिक फिल्म बनाई है. जानें, क्यों ये फिल्म है खास...

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फिल्म 'पूर्णा' फिल्म 'पूर्णा'

वन्‍दना यादव

  • मुंबई,
  • 30 मार्च 2017,
  • अपडेटेड 7:57 AM IST

फिल्म का नाम: पूर्णा
डायरेक्टर: राहुल बोस
स्टार कास्ट: राहुल बोस, अदिति इनामदार, मीना गुप्ता, प्रिया, आनंद
अवधि: 1 घंटा 45 मिनट
सर्टिफिकेट: U
रेटिंग: 3.5 स्टार

आजकल बायोपिक का चलन है. कोई क्रिकेटर की बना रहा है तो कोई फिल्मकारों की तो कोई कवियों की जीवनी को रुपहले परदे पर दर्शाने की कोशिश में व्यस्त है. ऐसा ही कुछ प्रयास किया है एक्टर डायरेक्टर और प्रोड्यूसर राहुल बोस ने. राहुल ने 25 मई 2014 को माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाली सबसे छोटी उम्र की भारतीय लड़की 'पूर्णा मालावत' की जिंदगी पर आधारित यह फिल्म 'पूर्णा' बनाई है. 

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कहानी
यह कहानी पूर्णा मालावत (अदिति इनामदार) की है जो तेलंगाना के एक छोटे से गांव की रहने वाली लड़की है और उसके घर की माली हालात ठीक ना होने की वजह से वो स्कूल की फीस भी नहीं दे पाती है. पूर्णा अपने चाचा की बेटी प्रिया के साथ स्कूल जाया करती है और फिर एक दिन प्रिया के कहने पर सरकारी स्कूल से भागने की कोशिश भी करती है क्योंकि सरकारी स्कूल में खाने-पीने के लिए कई चीजें फ्री मिलती थी.

फिर छोटी उम्र में ही प्रिया की शादी हो जाने से पूर्णा के पिता उसके कहने पर सरकारी स्कूल में दाखिला करा देते हैं. स्कूल में निरीक्षण करने आये अधिकारी प्रवीण कुमार (राहुल बोस) को जब पता चलता है कि सही ढंग से खाना ना मिलने के कारण पूर्णा स्कूल छोड़कर भाग गई है तो वो सबकी क्लास लेते हैं. पूर्णा को वापस ले आते हैं फिर पूर्णा जब स्कूल के बच्चों के साथ पहाड़ चढ़ने के ट्रिप पर जाती है तो उसके रुझान को देखकर कोच खुश होते हैं.

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धीरे-धीरे वो पर्वतारोहण सीखने लगती है और उसका नाम माउंट एवेरेस्ट पर चढ़ाई के लिए दे दिया जाता है. 25 मई 2014 को पूर्णा एवेरेस्ट पर चढ़ाई करने वाली सबसे कम उम्र की लड़की बन जाती है.

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क्यों देख सकते हैं
- फिल्म में आपको हर तरह के इमोशन मिलते हैं, चाहे वो जज्बे के साथ आगे बढ़ने का हो या फिर कभी उम्मीद टूटते हुए नम आंखों का.
- टाइटल रोल को निभाते हुए अदिति इनामदार ने बेहतरीन परफॉर्मन्स दी है, वहीँ बाकी सह कलाकारों के साथ राहुल बोस का काम भी सहज है.
- फिल्म का स्क्रीनप्ले और सिनेमेटोग्राफी भी सटीक है जिसकी वजह से ठहराव बना रहता है और आप भी फिल्म के साथ कनेक्ट कर पाते हैं.
- फिल्म के गाने कमाल के हैं जो कहानी के साथ-साथ चलते हैं और बैकग्राउंड स्कोर भी बढ़िया है.
- फिल्म में 'पूर्णा' की कहानी के साथ-साथ सरकारी स्कूल में खाने के वितरण के साथ साथ बाल विवाह जैसे मुद्दों की तरफ भी प्रकाश डाला गया है.
- फिल्म के आखिरी के 15 मिनट बेहद खास है और थिएटर में तालियों की गूंज भी सुनाई पड़ती है.

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कमजोर कड़ियां
इका दुक्का बातों को नजरअंदाज कर दें तो कुछ भी ऐसा नहीं था जो फिल्म में आपको निराश करे.

बॉक्स ऑफिस
फिल्म का बजट कम ही है क्योंकि प्रोडक्शन लेवल पर ही राहुल बोस ने कॉस्टिंग करेक्ट रखी थी, जिसकी वजह से डिजिटल और म्यूजिक राइट्स के साथ-साथ मार्केटिंग और प्रोमोशन का कॉस्ट निकालना मेकर्स के लिए आसान ही रहा होगा.

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