प्रकाश राज भारत के उन गिने-चुने एक्टर्स में से हैं जिन्होंने पिछले 38 वर्षों से लगातार भारत की पांच फिल्म इंडस्ट्री- तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और हिंदी में काम किया है. उन्हें सभी जगह अच्छी सफलता मिली है. लेकिन अब उनका मानना है कि तमिल और मलयालम फिल्में, हिंदी सिनेमा से कहीं बेहतर हैं. उनके अनुसार, 2000 के दशक के मध्य में मल्टीप्लेक्स का दौर शुरू होने के बाद हिंदी सिनेमा अपनी जड़ों से दूर हो गया है.
क्यों हिंदी फिल्मों से नाराज़ हैं प्रकाश राज?
कोझिकोड में शनिवार को केरल लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान प्रकाश राज ने कहा- आज के समय में मुझे लगता है कि मलयालम और तमिल सिनेमा बहुत मजबूत फिल्में बना रहे हैं. दूसरी ओर, हिंदी सिनेमा ने अपनी जड़ें खो दी हैं. सब कुछ बहुत सुंदर और चमकदार दिखता है, लेकिन प्लास्टिक जैसा लगता है, जैसे मैडम तुसाद म्यूजियम में मोम की मूर्तियां. हमारे यहां (दक्षिण में) अब भी कहानियां हैं. तमिल के नए युवा निर्देशक दलित मुद्दों पर फिल्में बना रहे हैं, और यह बहुत उम्मीद देता है.
उन्होंने आगे कहा- मल्टीप्लेक्स आने के बाद मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री सिर्फ मल्टीप्लेक्स के लिए फिल्में बनाने लगी. प्यारी-सी, हल्की-फुल्की फिल्में, क्योंकि वे चल रही थीं. वे ‘पेज 3 कल्चर’ में चले गए और राजस्थान और बिहार के ग्रामीण इलाकों से जुड़ाव खत्म हो गया.
तमिल-मलयालम सिनेमा की तारीफ, हिंदी फिल्मों पर वार
प्रकाश राज ने याद दिलाया कि आजादी के बाद हिंदी सिनेमा अपने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के करीब था. उन्होंने 1977 की मशहूर फिल्म अमर अकबर एंथनी का उदाहरण दिया, जिसमें अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर और विनोद खन्ना अलग-अलग धर्मों से होते हुए भी एक साथ आकर किसी की जान बचाने के लिए खून दान करते हैं.
उन्होंने कहा- आज ऐसा नहीं रहा. अब सब कुछ पैसे और दिखावे का खेल बन गया है- रील्स, पेज 3 कवरेज और जोरदार आत्म-प्रचार. इस प्रक्रिया में मुझे लगता है कि इंडस्ट्री का दर्शकों से जुड़ाव टूट गया है.
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